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धर्म और शिक्षा के बीच का अंतर |
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अशोक रहाटगांवकर |
धर्म
हमारी सनातन
संपत्ति है। धर्म का स्थान भारतीय
संस्कृति में हमेशा से अग्रणी रहा है। यही कारण है कि
पाश्चात्य संस्कृति के लोग हम भारतीयों को धर्म-भीरू कहने से
भी नहीं चुकते । वैसे तो धर्म और शिक्षा का सीधा-सीधा कोई
संबंध नहीं है। धार्मिक
व्यक्ति का शिक्षित होना आवश्यक नहीं है । वह बगैर शिक्षित
हुए भी धर्म को अपना सकता है।
उसके आध्यात्मिक स्वरूप को जान सकता है। परंतु शिक्षा
ग्रहण करने बाद मनुष्य उस धर्म की व्याख्या अपने तरीके से
करने लगता है।
शिक्षित व्यक्ति धर्म के
आध्यात्मिक स्वरूप को अपने शिक्षा की
कसौटी पर परख कर देखता है। उसके तत्वों की गहनता को
जानने का प्रयास करते है। वह हमेशा श्रद्धा और विश्वास के
आधार को प्रमाण के साथ प्रस्तुत करने की चेष्टा करता है।
हमारे यहाँ धर्म का भय चाहे वह शिक्षित हो या
अशिक्षित
प्रत्येक व्यक्ति के मन में रहता है। शिक्षित उसे ठोक-बजा
कर देखता है तो धार्मिक व्यक्ति शिक्षा के
अभाव में महज
अंधश्रद्धा में डूबने लगता है। फिर उसे उबारना बहुत कठिन
हो जाता है। इस देश में धर्म को चलाने वाले दो श्रेणी के
होते हैं । एक तो वे
जो धर्म की शिक्षा देते हैं उसमें
वे मानव कल्याण की कल्पना करते हैं
- धर्मगुरू कहलाते हैं ।
दूसरे वे जो धर्म को अपने स्वार्थ के लिये अंधश्रद्धा
फैलाकर चलाना चाहते हैं
- धर्म के ठेकेदार कहलाते हैं ।
अभी हाल ही में मीडिया ने एक सर्वे रिपोर्ट जारी की थी
जिसके आँकड़े चौकाने वाले थे
। उस सर्वे का निचोड़ बताता है कि पूरे भारत वर्ष में मंदिरों की संख्या 25 लाख है और
स्कूलों की संख्या महज छह लाख । यानी धर्म और शिक्षा के
बीच का जो अंतर है वह सीधे-सीधे दस लाख का है जिसे सहज
नहीं कह सकते । मंदिरों की ये संख्या निश्चिचत रूप से हमें
यह बताती है कि धर्म के ठेकेदारों ने अपने स्वार्थ पूर्ति
के लिये मंदिर बनाकर और शिक्षा को पीछे
धकेलने का जो
दुःसाहस किया है वह सिर्फ लोंगों को धर्म-भीरु बनाकर अपना
उल्लू सीधा करने के लिये ।
यदि व्यक्ति शिक्षित होगा तो वह निश्चित ही धर्म को अपनी
कसौटी पर कस कर देखेगा । यदि
परीक्षण में उसे ऐसा लगेगा कि वह पारस पत्थर है जो लोहे को
भी सोना बनाने का सामर्थ्य रखता है तो वह उसे अपनाने में
आना-कानी नहीं करेगा। यदि उसे लगता है कि इससे सिर्फ
अंधश्रद्धा ही बढ़ेगी तो वह उसे रोकने का प्रयास करेगा ।
आज इक्कीसवीं सदी और विज्ञान के इस युग में भी भारत में
अंधश्रद्धा का ग्रॉफ बढ़ता ही नज़र आता है। जबकि धर्म
अंधश्रद्धा का मोहताज नहीं होता । परंतु जो धर्म-भीरु है
या ठेकेदारों के मार्गदर्शन में जीता है वह किसी भी घटना
पर सहजता से विश्वास कर लेता है। ऐसा लगता है मानों सभी
धर्मों में तथाकथित चमत्कार प्रदर्शन को लेकर प्रतिस्पर्धा
सी शुरू हो गई है। कोई भी धर्म या उसके मानने वाले इस होड़
में पीछे नहीं रहना चाहते ।
धर्म आत्मिक श्रद्धा का विषय है अंधश्रद्धा का नहीं । यदि
चमत्कार ही सब कुछ होता तो जादूगरों और बाजीगरों को उनकी
विद्या के बल
पर संत महात्मा का दर्जा
प्राप्त हो जाता । लेकिन ऐसा कहीं भी देखने में नहीं आता ।
इस वर्ष भारत में जो धर्म की, अंधश्रद्धा की सरिता ऐसी बही
कि उसे रोक पाना मुश्किल हो गया । कई घटनायें ऐसी हुई
जिसने सैलाब ला दिया जैसे मुंबई में समुद्र का पानी मीठा
हो जाना, देवी देवताओं की मूर्तियों का दुग्धपान, जैन
मूर्ति के नीचे से पानी बहना, दीवार पर साई बाबा का चित्र
उभर आना और लखनऊ में एक कान्वेंट स्कूल में ईसा मसीह के
अवतरित होने का चमत्कार ।
धर्म के तथाकथित ठेकेदार यदि लोगों की भावना के साथ इस
प्रकार का खिलवाड़ कर धर्म का प्रचार कर रहें हैं तो ये
सरासर पाखंड है। कोई भी धर्म लंगड़ा नहीं है जिसे
अंधश्रद्धा या अंधविश्वास की बैसाखी के सहारे चलना पड़े ।
इसीलिए शिक्षा के साथ-साथ व्यवहारिकता और
तर्क-शक्ति का
विकास होना अत्यंत आवश्यक है। सदियों पूर्व मध्ययुग के
अंधकार मय वातावरण के कारण ही पोप के आदेश पर
गैलेलियो जैसे महान वैज्ञानिक को फाँसी दे दी गई थी। उसका
अपराध सिर्फ इतना ही था कि उसका निष्कर्ष वायनिल कि तत्वों
से मेल नहीं खाता था। परंतु उसका सच मरा, नहीं आज भी जिंदा
है। सारी दुनियाँ उसे मान रही है।
इसीलिये यह आवश्यक है कि धर्म और शिक्षा के बीच यह
असामान्य अंतर घटाना होगा । लोगों के शिक्षित होने के साथ-साथ वैज्ञानिक दृष्टि को भी आत्मसात करना होगा। तभी वे इस
अंधश्रद्धा की दलदल में से बाहर निकल पायेंगे अन्यथा
चमत्कारों की एक लंबी फेहरिश्त ऐसे धर्म भीरूओं को समाहित
करती चली जायेगी जिन्होंनें धर्म की दुकानदारी बढ़ाने में
ही अपना अविस्मरणीय योगदान दिया हो । शिक्षा मनुष्य को
ज्ञान प्रदान करने के साथ-साथ उसकी तर्क-शक्ति को भी
बढ़ाती है। गुण दोनों को परखने का हुनर भी सिखाती है।
मीडिया सर्वे यदि थोड़ा बहुत उँचा-नीचा होगा भी तो भी हमें
इस बात की ख़बर लेनी होगी कि ऐसे अंधश्रद्धा से
पीड़ित प्रत्येक व्यक्ति को सच्चा और सतर्क ज्ञान प्रदान करें ।
प्रत्येक बुद्धजीवी का यह नैतिक दायित्व बनता है कि धर्म
के नाम पर गलत
आचरण को रोके । मनुष्य की भावना से यदि कोई
खिलवाड़ करता है तो तुरंत ऐसे पाखंडी को बेनकाब करें ।
अन्यथा यह फासला हमें ले डूबेगा । उस
दिन ईश्वर भी हमारी
मदद करने में लाचारी दिखायेगा । समय
रहते यदि उचित कदम नहीं उठाया गया तो हम अंधश्रद्धा के सागर में डूबते ही
चले जायेंगे
।