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अनाविल प्राण महाकवि सुमित्रानन्दन पंत के दर्शन |
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डॉ. बलदेव |
प्रकृति
के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पंत के दर्शन उन्हीं के निवास में
दिनाँक 22. 05. 1968 को हुए थे
। सभी दृष्टि से वे महान थे, उनकी छवि
आज भी मेरे मन प्राणों में अंकित है।
मई का महिना, पूज्यपाद राम कुमार वर्मा के यहाँ (साकेत भवन)
जलपान
के बाद उनके बताए गए शार्ट कट रास्ते से मैं इस्टर्नली रोड
स्थित पंत जी के निवास स्थान पहुँचा । उस समय दिन के एक बज रहे
थे, इलाहाबाद की चिलचिलाती धूप ...मैं चलते-चलते पसीने से तर-बतर
हो रहा था.....मैं ठहरा ठेठ देहाती, बमुश्किल पच्चीस-छब्बीस साल का
अधकचरा ज्ञान वाला युवक “उत्सुकता
दबाए न दबती थी, भूल गया कहाँ किसके पास जा रहा हूँ । हेज की घनी
दूरी बाऊन्ट्री है, फाटक की कमानी पर गुच्छेदार फूलों से लदी बेला
चढ़ी हुई है। उसके सामने थोड़ी दूर पर राजा काला कांकर (दिनेश सिंह
जी का ) लम्बे चौड़े दालान वाला बंगला। बरांडे पर खूंखार अलसेसियन
। वह बार-बार सिर उठाकर मुझे देख लेता था, चोर नज़रों से मैं भी, पर
जब आश्वस्त हो गया, दौड़ाएगा नहीं
?
तो फाटक खोलकर दरवाजे का सांकल हिम्मत करके मैंने खटखटा दी। तुरन्त
आवाज़ आई...
कौन ?
छत्तीसगढ़ से आपका एक भक्त
।
उन्होंने पर्दा हटाकर आगन्तुक को देखा - आइए-आइए, भीतर आइए,
आइए, भीतर आइए ...मेरा दिल धड़कने सा लगा
। थैले से जलकणों से सिंचित
गुलाबों के फूलों का हार निकाला और उन्हें पहनाते हुए अपना छोटा सा
परिचय दिया । और मैं चकित हो उन्हें देखने लगा - सामान्य
कद काठी के
पंत जी उस समय पट्टेदार पाजामा और ओपन शर्ट पहने हुए थे, कंधे तक
लहराते घुंघराले रेशमी बाल, हल्का ताम्रवर्णी रंग, सौम्य मुखमंडल
तीखे नाक-नक्श सुनहले फ्रेम के चश्मे से झांकते राजीव नयन, पतले
होंठ, होंठों पर खेलती मन्द मृदु स्मिति....देखता ही रह गया
। कल्पना नहीं थीं महाकवि पंत इतने सरल और सहज होंगे । अन्यथा इस
भीषण दुपहरी में किसी अपरिचित के लिए वे दरवाजा क्यों खोलते
?
मेरे अप्रत्याशित आगमन से उन्हें भी आश्चर्य
हुआ था, आखिर
उंन्होंने पूछ ही लिया - इतनी भयानक दोपहरी में
?
मैंने बतलाया, कुछ
रास्ते के कारण बिलम्ब हुआ और कुछ अल्ससियन के डर से, घंटे भर बाहर
खड़ा रहा । इतना सुनते ही और हाल बेहाल देखkर उनकी आँखे नम हो
गयी....पंत जी इतने संवेदनशील थे। उन्होंने अपने छोटे से ड्रांईँग
रूम में ले जाकर बैठाया, बोले मैं अभी आया....जाते वक्त उन्होंने
पंखा चला दिया । उनका ड्रांईँग रूम एकदम सामान्य
। दीवार पर उनके
पिताश्री पंडित गंगादत्त पंत का फ्रेम चढ़ा एक चित्र टंगा
था और दीवार की ही आलमारी में मात्र तीन-चार पुस्तकें, एक टी टेबिल
आस पास तीन चार कुर्सियाँ, “महानता”
प्रदर्शित करने वाली चीजों का सर्वथा अभाव (असल में पंत जी से
संबंधित अलंकरण, प्रशस्ति पत्र, लेखन सामग्री आदि आनंद भवन के
म्यूजियम के एक कमरे में रख दिया गया था, ) पंत जी के यहाँ शायद उस
समय कोई नौकर चाकर नहीं था, वे ट्रे में खुद दो गिलास जल ले कर
आए.... सामने बढ़ाकर बोले - चाय पियोगे की शरबत, मैंने कहा -
कुछ नहीं लगेगा, दर्शन हो गए इतना ही काफी है, जल ग्रहण कर मैं
उठने ही वाला था कि पंत जी ने वात्सल्यभाव से कहा, ऐसे कैसे चलेगा,
इतनी धूप में आए हो, ऐसे में चाय ही ठीक रहेगी..... पंत जी फिर
अंदर गए और कुछ सामान लाकर टेबिल में रख दिए । उन्होंने बत्ती वाली
स्टोव जलाया कड़ाह में घी डाला, गरम होने पर सूजी फिर शक्कर काजू-किसमिस और
उसके ऊपर गिलास भर पानी उड़ेल दिया, बोले नाश्ता तैयार हो गया, अब
तुम भीतर जाओ और हाथ मुँह धोलो, मैं। संकोच और कृतज्ञता से भर गया
था, और यथावत उनके कहे का पालन करता गया, हम दोनों नाश्ता करते
रहे, इतने में चाय भी बन गई । चाय की चुस्की लेते हुए पंतजी मेरी
ओर सही ढंग से मुखातिब हुए
–
बख्शी जी कैसे हैं ?
बिल्कुल स्वस्थ हैं और दिग्विजय महाविद्यालय राजनान्दगाँव में पढ़ा
रहे हैं ।
इस उम्र में
?
हाँ
।
पंत जी ने बड़ी कृतज्ञता पूर्वक याद करते हुए कहा - बख्शी जी ने मुझे
सरस्वती में खूब छापा था, मुझ पर उनका बड़ा ही स्नेह था
। वे सरस्वती
के स्तर बनाए रखने के लिए बड़ा परिश्रम करते थे, अक्सर मैं उनके
यहाँ जाता था, पंडित देवीदत्त शुक्ल भी उनके साथ रहते थे, लेकिन
दोनों का चूल्हा अलग-अलग
था। बख्शी जी मेरी आलोचना भी किया करते
थे, और रचनाओं का संशोधन भी करते थे। उनके लिए मेरे हृदय में बहुत
आदर भाव हैं । मैं मंत्रमुग्ध पंत जी के हाव-भाव पूर्वक बातें
सुनता रहा । इसके बाद उन्होंने पाण्डेय बंधुओं की खबर ली, मैंने
संक्षिप्त में उनका कुशल क्षेम बतलाया
। पंत जी ध्यान से मेरी एक एक
बातें सुनते रहे, फिर बोले, कुछ लिखते भी हो थोड़ा बहुत
?
गीत, और
कविताएँ दोनों लिखता हूँ, वैसे मैं आपकी रचनाओं से खासकर प्रभावित
हूँ, आपके मौन निमंत्रण, परिवर्तन, चाँदनीरात में नौका बिहार, पावस
ऋतु में पर्वत प्रदेश मेरी प्रिय रचनाएँ हैं। पंत जी
प्रसन्न हुए जा रहे थे, मेरा उत्साह बढ़ता जा रहा था। पंत जी के
आग्रह पर मैंने दो छोटी-छोटी रचनाएं सुना दी - उसमें पहली थी-
एक लाश बहती है
गंगा की धार में
एक लाश बहती है
यमुना की धार में
जाने दोनों कब टकराएँ
मर्त्यों का संगम हो जाए
पंत जी ने छूटते हुए कहा-तुम्हारा पूर्व और पश्चिम की सभ्यता से है
?
मैने लिखते समय अपनी रचना का इतना अर्थ विस्तार की कल्पना ही नहीं
की थी, जो देखा था, नाव में ही उतार दिया था। इसे कब लिखे थे?
कल ही यह दृश्य मैंने संगम में देखा था, नाव में मन ही मन इन
पंक्तियों कीकल्पना कर ली थी, उनके आग्रह
पर मैंने दूसरी रचना सुनाई
-
कितना जाना है
पथ यह अनजाना है
जंगलों के पार जंगल
लहराता नीला समंदर
हरीतिमा की वादियों में
खो गया दिन का कलेंडर
चाँद लटका ठूठ पर है
जुगनुओं का क्या भरोसा
फिर भी तो जाना
पथ यह अनजाना है।
पंत जी ने दोनों रचनाओं पर काफी शाबाशी दी, मैंने सकुचाते
से कहा, पंडित जी, ये तो आप जैसे महान कवियों की जूठन है। किन-किन
कवियों की रचनाएँ आपने पढ़ी है। मैंने एक ही साँस में प्रसाद, पंत,
निराल, महादेवी वर्मा, भवभूति, कालिदास, शैल,
वर्डस्, कीट्स, बायरन आदि
के नाम गिना दिये । और उनके सामने ही उन्हीं की कई रचनाओं की कुछ
पंक्तियाँ सुना दी, अब तो पंत जी के सामने मैं खुल सा गया था, वे
बड़े प्रसन्न मुद्रा में दिखाई दे रहे
थे । उन्होंने पूछा, मेरी ईधऱ की
रचनाएँ पढ़ी हैं । मैंने कहा, पिछले माह मैंने यों ही पौ फटने के
पहले की सारी रचनाएँ पढ़ डाली हैं । ये तो अभी प्रकाशित हुई हैं,
कैसे मिल गयी
?
मैंने कहा,
बिलासपुर में साहित्य की किताबें आती रहती
हैं, मैं प्रायः वहाँ जाता रहता हूँ । वह किताब मिश्रा पुस्तकालय
में दिखी, और मैने खरीद ली।
कैसे लगी ?
पंडित जी अन्यथा न लो तो रचनाएँ मुझे आपकी बीणा, पल्लव, ग्रंथि,
गुंजन आदि की रचनाओं के सामने फीकी लगी।
लगा पंत जी थोड़ा मर्माहत हो रहे हैं, सम्हलते हुए मैंने
कहा, हो सकता यह मेरी समझ की कमी हो, पर युगान्त तक तो डूबकर पढ़ता
रहा हूँ। आपके अरविन्द दर्शन और सौंदर्य से प्रभावित काव्य नाटिका
भी मुझे बहुत प्रभावित करती हैं, परन्तु
मर्यादा पुरूषोत्तम राम और
अब की रचनाएँ उनकी तुलना में ज्यादा बौद्धिक लगी ।
हाँ मैं भी महसूस करता हूँ लेकिन युगानुरूप कुछ न कुछ तो लिखना ही
पड़ता है। मैंने कहा -
पंडित जी आप छायावाद के शीर्ष कवियों में से हैं और प्रगतिवादी विचारधारा के सूत्रधार भी हैं। ताजमहल जैसी
रचनाएँ मुझे अब भी प्रभावित करती हैं किंतु तुलना में आज की रचनाओं
पर मैं ज्यादा केन्द्रित नहीं हो पाता। महाकवि पंत के सामने मेरी
इतना कहना बडबोलापन ही कहलायेगा, पर पंतजी मुझे बराबर प्रोत्साहित
करते रहे....और मैं यह सब कैसे बोल गया आज भी आश्चर्य होता है। पंत
जी ने समझाया –आज
की प्रगतिवादी धारा ज्यादा मानवीय धरातल पर है। पता नहीं आपको कैसे
अच्छी नहीं लगी, आपको इन रचनाओं को ठीक से पढ़ना चाहिए। मैं सिर
हिलाता रहा । लम्बी बातचीत में समय का ध्यान ही नहीं रहा। मध्यान्ह
ढल रहा था लेकिन मेरी एक इच्छा बलवती हो रही थी और मैने उनके मुख
से नौकाविहार नामक कविता सुनना चाहा। पंत जी मेरा आग्रह टाल न सके
। उन्होंने उसकी कुछ पंक्तियो का पूरे हाव-भाव के साथ पाठ किया ।
शांत, स्निग्ध ज्योत्स्ना उज्ज्वल
अपलक अनंत, नीरव भूतल
सैकत शय्या पर दुग्ध धवल, तन्वंगी गंगा ग्रीष्म
विरल ।
लेटी है श्रांत, क्लांत निश्चल
तापस बाला गंगा निर्मल, शशिमुख से दीपित मृदु करतल ।
इसके बाद वे अटक से गये, सम्हलते हुए बोले,
“हार्ट
का प्राप्बलम है। रुस में ईलाज चल रहा है बीच-बीच में वहाँ जाना
पड़ता है ।” पंडित जी मैंने आपको बहुत कष्ट दिया, एक कष्ट और....
“निःसंकोच
कहो”
“आदरणीया
महादेवी जी से भी मिलने की प्रबल इच्छा है।”
“यह
कौन सी बड़ी बात है।”
उन्होंने नम्बर डायल
किया, उनकी बातचीत हुई और मुझे संदेश भी मिल
गया, कुर्सी से उठकर फिर मैंने उनके पैर छुए
। उन्होंने आशीषते हुए
पूछा–कब
लौटोगे ?
कल ।
कल ही ?
हाँ
अरे.....
पंतजी गेट तक छोड़ने आए और बोले
– जब
भी कभी इलाहाबाद, आओ
। जरूर आना ।
आज पंतजी नहीं हैं लेकिन उनकी सौम्य मूर्ति यदा-कदा मन मंदिर में
प्रज्वलित सी हो जाती है
।
सन् 1978 की एक शाम मै अपना शोध-प्रबंध का एक
चैप्टर पाण्डेय जी को
जँचाने गया, पहले ही पैरे में पंत जी के नाम के आगे स्वर्गीय लिखा
था, पाण्डेय जी ने पूछा क्या पंतजी जी नही रहे
?
मैंने कहा नहीं अभी हाल ही में वे दिवंगत हुए हैं । मुकुटधर
पाण्डेय जी के नेत्रों से अश्रु ढुलक-ढुलक पड़े ।