चेक
दोपहर के अलसाये पल
तुम्हारी समंदर-सी गहरी आँखों में,
फेंकता पतवार मैं,
उनींदी दोपहरी में
-
उन जलते क्षणों में,
मेरा एकाकीपन
और घना होकर,
जल उठता है - डूबते माँझी
की तरह -
लाल दहकती निशानियाँ,
तुम्हारी खोई आँखों में,
जैसे "दीप-स्तंभ"
के समीप,
मँडराता जल !
मेरे दूर के सजन,
तुम ने अँधेरा ही रखा
तुम्हारे हावभावों में उभरा यातनाओं का किनारा ---
अलसाई दोपहरी मेँ,
मैं,
फिर उदास जाल फेंकता हूँ --
उस दरिया
मेँ,
जो तुम्हारे नैया से नयनों में कैद है !
रात के पंछी,
पहले उगे तारों को,
चोंच मारते हैं -
और वे,
मेरी आत्मा की ही
तरह,
और दहक उठते हैं !
रात,
अपनी परछाई की घोडी पर सवार दौडती है
,
अपनी नीली फुनगी के रेशम-सी लकीरों को छोडती हुई !
मूलः पाब्लो नेरूदा
अनुवादः लावण्या शाह

तमिल
रेखा
एक रेखा
शिशु ने
पालने से
रिसते मूत्र से बनाई
एक रेखा
बचपन में
स्लेट पर
नन्हीं
ऊँगलियों ने खींचीं
एक रेखा
खेल में
धरती के आँगन में बिछी
एक
रेखा
जवानी ने
सुहाग रात में
तेरे सीने पर लिखी
हर रेखा
समय
के साथ-साथ
हल्की होती हुई मिट गई
पर दोस्त मेरे
!
कहो
एक रेखा
चालीस ग्राम सोना
चालीस हज़ार नकदी
हीरो होंडा और चाँदी
घर बँगले के
साथ
देने पर
भी
दहेज के लिए
जल मरने की
जिसे मिटाया न जा सके
ऐसी सीमा रेखा
कब खींचोगे
इसके लिए
मूल
रचना:
अमृत गणेशन
अनुवादः स्वर्ण ज्योति

तमिल
सार्थक मरना
मिट्टी में दफ़ना कर
संगमरमर की कब्र पर
नाम खुदवाना नहीं है
मेरा सार्थक मरना
मुझको
तो
मन में है बसना
न
कि चित्कार से
आँसूओं में है बहना
मेरे
अपनों के
डबडबाई आँखों में
बस एक बूँद
बन कर है तिरना
यही है मेरा
सार्थक मरना
घर,
भूमि,
पैसे,
गहने
में
नहीं है बँटना
सुख-दुखः,हवा,
पानी,
चाँदनी में
खुशबू बनकर है घुलना
यही है मेरा सार्थक मरना
हरेक
दिन कैलेंडर में
तारीख बदलने के मानिंद नहीं
मुझको तो अनुभवों की
तरह
चट्टान की मानिंद
युगों-युगों तक है जीना
यही है मेरा सार्थक
मरना
तुम्हारी दिनचर्या में
एक भी क्षण
मेरा याद आना
यही है
मेरा सार्थक मरना
मेरे रहने के समान ही
मेरे न रहने के बाद
भी
तुम्हारे साथ ही जीना
यही है मेरा सार्थक मरना
मूल
रचना:
अमृत गणेशन
अनुवादः स्वर्ण ज्योति

भोजपुरी
दीप जलाया
जाये
अबकी
दीपों
का पर्व
ऐसे
मनाया
जाये
मन के आँगन में भी एक दीप जलाया जाये
रोशनी गाँव में,
दिल्ली से ले
आया जाये
कैद सूरज को अब आजाद कराया जाये
हिन्दू,
मुसलिम न
ईसाई न
सिक्ख
,
ऐ
भाई
अपने औलाद को इंसान बनाया जाये
जिसमें भगवान,
खुदा,
गौड सभी साथ रहें
इस तरह का कोई
देवास बनाया
जाये
रोज़ दियरी है कहीं,
रोज़ कहीं
भूखमरी
काश दुनिया से विषमता को मिटाया जाये
सूप,चलनी
को पटकने से भला क्या होगा
श्रम की लाठी से दरिद्दर को भगाया जाये
लाख रस्ता हो कठिन
,लाख
दूर मंजिल हो,
आस का
फूल हीं आँखों में उगाया जाये
जिनकी यादों में जले दिल के दिये की बाती
ए
सखी
,
अब उसी
'भावुक'
को बुलाया जाये
मूल रचनाः मनोज भावुक
अनुवादः स्वयं

छत्तीसगढी
शुभ-लाभ
शुभ-लाभ सिर्फ़ तुम्हारे पास
अशुभ-हानि हमारे
लिए
घाम जाड़ा हो जाता है और जाड़ा घाम
फिर भी चलाते हैं जांगर
बिजली-पंखे सिर्फ़ तुम्हारे हो गये
हवा का रत्ती-भर झोंका हमारा
पक्का मकान में एयरकुल तुम्हारे पास
पेड़ की छाँव हमारे लिए
फ़क्क सुफेद फ़बता है तुम्हें
पर
हमें वही फ़बता जो है बिलकुल काला
मूल रचनाः समरथ गँवइहा
अनुवादः जयप्रकाश मानस