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बेताल कथा |
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बेताल कथा |
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राजा की खुशहाली का राज गिरीश पंकज
विक्रमार्क ने बेताल को कंधे पर लाद कर मजबूती से पकड़ लिया । उसकी इस शैली पर बेताल हँस पड़ा और बोला- “राराजन्, मनुष्य अपनाधन-वैभव, नाते-रिश्तेदार किसी को भी कस कर पकड़ ले, लेकिन जिसे जाना है, वो तो चला ही जाता है। आज नहीं तो कल। जैसे मैं अभी हूँ, बाद में नहीं रहूँगा हा...हा...हा...।” बेताल ने जबर्दस्त ठहाका लगाया। विक्रमार्क खामोशी के साथ चलता रहा।
बेताल से रहा न गया । वह बोल पड़ा- “राजन्, चलो, एक कहानी शुरू करता हूँ। कहानी सुनने का बड़ा शौक है। इसीलिए तो तुम राजमहल का सारा काम छोड़ कर मेरे पीछे पड़े हुए हो। मैं सब समझता हूँ। आजकल तुम्हारा मन कामधाम में बिल्कुल नहीं लग रहा । खैर, मुझे क्या। मेरी बोरियत दूर करने के लिए तुम आ गए हो । मुझे तो लटकना ही है। चाहे बरगद की डाल पर लटकूँ, चाहे तुम्हारे मजबूत कंधे पर । चलो, अब बिना किसी विलंब के शूरू करता हूँ कहानी-
राजन्, किसी राज्य में एक राजा रहा करता था। महेंन्द्र सिंह । वह बड़ा गरीब था। उसकी रानी रूपकला बड़ी गरीब थी। उसके नौकर-चाकर बड़े गरीब थे। उसका सारथी भी गरीब था। प्रजा तो बेचारी बिल्कुल ही गरीब थी। लेकिन राजा तो राजा होता है। वह राजा था। वह हर घड़ी अपने राजा होने को महसूस करता । पानी पीता तो सोचता, कि शरबत पी रहा हूँ। रूखी-सूखी रोटी खाता तो यही समझ कर, कि मालपुआ उड़ा रहा हूँ। दरअसल राजा वर्षों तक खतरनाक राजा चंडूदास का गुलाम था। चंडूदास ने जब राजा महेंद्र को आजाद किया, तो उसे फूटी कौड़ी नहीं दी।
एक बार की बात है। होली का त्यौहार आया । पूरा नगर हर्ष में डूब गया। लेकिन राजा के चेहरे पर खुशी की चिड़िया नज़र नहीं आ रही थी। रानी रूपकला बोली- “महाराज, होली पर तो आप हमेशा मदमस्त हो जाया करते थे। भाँग खाते थे । ठंडाई पीते थे। फाग गाते थे। नगर वासियों के साथ मस्ती में डूब जाया करते थे। इस बार आप उदास क्यों हैं ?”
राजा ने कहा- “हे सुमुखी, उदासी का कारण अपनी गरीबी है। अरे, राजा को राजा की तरह रहना चाहिए । लेकिन यहाँ तो ख़जाना ही खाली है। कदम-कदम पर कंगाली है। खूब माल-टाल आ जाए, तो होली भी होली जैसी लगे। होली का हर रंग फीका उस वक्त तक है जब तक तिजोरी खाली है।” “लेकिन गरीब लोग तो अभावों में भी मस्त रहते हैं ?” रानी बोली। ‘इसीलिए तो वे गरीब रहते हैं।” राजा ने चिढ़ते हुए कहा, “अरे, संतोषी सदा सुखी का नारा हम जैसे राजा-महाराजाओं ने तो ही चलाया था। ताकि जनता संतोषी रहे। खामोश रहे । हमारी अय्याशी देखर कर विचलित न हो। वह धन के पीछे ना भागे। बस, हम लोग अपना महल भरते रहें, लेकिन क्या करें, गुलामी ने हमें तोड़ दिया, वरना तुम देखती कि हम कैसी मस्त होली खेलते । तब तो हर त्यौहार मस्ती का दूसरा नाम होता रानी।”
रानी राजा की बात से सहमत थी। अचानक उसके चेहरे पर मुसकान तैर गई। उसने राजा के कान में कुछ कहा तो राजा भी मुसकरा पड़े। दरअसल रानी ने राजा को धनवान बनने के कुछ टिप्स दिए और आग्रह किया था, कि उस पर अमल करेंगे तो एक साल के भीतर ही मालामाल हो जायेंगे । देखते- ही देखते लाल हो जायेंगे । खुशहाल हो जायेंगे। सचमुच, ऐसा ही हआ है। राजन्, कुछ ही दिनों बाद राजा के नौकर-चाकर भी पहले की तरह राजमहल के ख़जाने से अपने हिस्से का माल छानने लगे। सारे पिचके गाल लाल हो गए। जिन शरीरों में केवल हड्डियाँ नज़र आती थीं, वहाँ माँस नज़र आने लगे। राजा की मनचाही मुराद पूरी भई। साल भर के बाद जब होली आई तो राजा का अंदाज़ देखने लायक था। वह अपनी पुरानी मस्ती में डूब गया। दीवाली पर भी जोरदार रौशनी की। पूरा महल रौशनी से नहा उठा।
इतना बोल कर बेताल रुक गया। राजा ने सोचा बेताल कुछ और कहेगा। लेकिन बेताल खामोश रहा। फिर बोला- “राजन्, तुमने कहानी सुन ली न ? अब घड़ी है मेरे सवालों की । तुम मुझे यह बताओं कि रानी ने आखिर ऐसा कौन-सा फार्मूला दे दिया, कि राजा एक साल के भीतर ही धनवान हो गया। कल का कंगला राजा मालामाल हो गया? राजन्, बिल्कुल सोच-समझ कर उत्तर देना, वह भी बिल्कुस सच्ची-सच्ची, वरना तुम को तो पता ही है, कि तुम्हारी खोपडियाँ के कितने टुकड़े हो सकते हैं।”
राजा विक्रमार्क फिर फँसा । उसका मौन भंग होना ही था। वह चेतावनी भी थी, कि उत्तर गलत न हो। राजा कुछ देर सोचता रहा। फिर उसने आत्मविश्वास के साथ मुसकान बिखेरी । फिर कहना शुरू किया- “रानी रूपकला समय के साथ चलने वाली रानी थी। वह जानती थी, कि बिना झूठ और पाखंड के पैसे नहीं कमाए जा सकते । सो, उसने राजा से कहा कि वह जनता पर करों का बोझ लाद दे। तरह-तरह के टैक्स । और जनता से भी आग्रह करे, कि राज्य की आय बढ़ाने के लिए दो साल तक करों के बोझ को सहना पड़ेगा । इससे विकास कार्य होंगे। यद्यपि सारा पैसा राजमहल की तिजोरी में ही जाएगा, जनता के हिस्से में फूटी कौड़ी नहीं आएगी । लेकिन जनता को ऐसा ही बताना पड़ता है। यही राजनीति है। बस, राजा ने राज्य के विकास के नाम पर कर ही करों की झड़ी लगा दी। हँसने पर कर। रोने पर कर । बाजार में जो माल खरीदा, उस पर कर । किसी कर्मचारी ने किसी का काम किया तो उसका कर। डाकखाने में टिकट खरीदी तो उस पर कर। दूध-चाय पीने पर कर। चलने-फिरने पर कर। प्रातः भ्रमण पर भी कर क्योंकि जनता शुद्ध हवा खा रही है। पेड़ों का रख रखाव करना पड़ता है न ! मतलब यह कि जिन करों की कभी कल्पना नहीं, की गई थी, ऐसे-ऐसे कर थोप दिए गए। जनता बेचारी क्या करती । खामोशी के साथ कर पटाती रही। पहले कंगाल थी, अब नंगी हो गई। लेकिन राजा मालमाल हो गया। और एक साल भीतर उसका वज़न पच्चीस किलो बढ़ गया । कुछ महीने बाद वह तो हर त्योहार में मस्ती मारने लगा। होली तो बाद में आई। पहले उसने दीवाली मनाई। पूरे नगर को न्योता दिया । जनता बोली, देखो कितना महान है राजा। फिर होली आई। राजा ने पूरे नगर को बुलाया । उसके साथ नाचता–गाता रहा। जनता बोली- ‘देखो, कितना सरल है उनका राजा।’ जनता यह भूल गई कि शोषक उदारता के साथ गला काटने की कला में पारंगत होता।”
इतना बोल कर राजा विक्रमार्क चुप हो गया। अब बेताल के हँसने की बारी थी। उसने कहा- “धन्यवाद राजन्। तुम्हारा मौन भंग हो गया, तुमने उत्तर भी बिल्कुल सही दिया। अब मैं चला डाल पर। कम सून । मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ।”
बेताल कंधे से खिसक कर उड़ चला। राजन् हमेशा की तरह उसके पीछे दौड़ पड़ा।
संपादक, सद्भावना दर्पण 31, न्यू पंचशील नगर, रायपुर
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