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संसार को आजादी का संदेश दे
सकती है
हिंदी
इंदिरा गाँधी
मेरे
सम्माननीय साथियो,
तृतीय
विश्व हिन्दी सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए मुझे अत्यंत
प्रसन्नता है। मेरा जन्म ऐसी नगरी में हुआ है,
जो
भारतीय संस्कृति की केन्द्र है और
ऐसे
समय जब राष्ट्रीयता की हवा जोरों से उठी थी। तब काम अधिकतर उर्दू में
होता था
और
पढ़े-लिखे लोग अक्सर फारसी के आलिम होते थे। उसका असर मेरे दादा और
परिवार पर भी
था।
लेकिन साथ ही उन्होंने हिन्दी के महत्व को उस समय समझा और मोतीलालजी ने
अहिन्दी
भाषियों के लिए हिन्दी पढ़ाने की पाठशाला का शिलान्यास नासिक में बहुत
वर्षों पहले
किया
था। मेरे पिता जवाहरलाल नेहरू ने आजादी के पहले भी हिन्दी के लिए बहुत
काम
किया
और देश के स्वतंत्र होने पर हिन्दी के विकास के लिए विद्वानों के
परामर्श से
अनेक
योजनाएं चलाई,
जिससे
हिन्दी में विश्वकोश,
शब्दसागर तथा सैकड़ों ज्ञान-विज्ञान
के
ग्रन्थ लिखे जा सके।
विश्व
हिन्दी सम्मेलन का अपना विशेष महत्व है। यह किसी सामाजिक या राजनीतिक
प्रश्न अथवा
संकट
को लेकर नहीं,
बल्कि
हिन्दी भाषा तथा साहित्य की प्रगति और प्रसार से उत्पन्न
प्रश्नों पर विचार के लिए आयोजित किया गया है।
मुझे
खेद है कि इतने वर्ष बीच
में
बीत गए जब हम मिल नहीं सके। आप सब हिन्दी के प्रेमी और विद्वान् हैं।
अपने
सामने
मुझे बड़े-बड़े कवि,
लेखक
और दूसरे ऐसे लोग दिखाई पड़ रहे हैं। आप में से
बहुत
से ऐसे भी होंगे जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं है। भारत से ही नहीं,
संसार
के
सभी
अंचलों से हिन्दी प्रेमी यहां एकत्रित हुए हैं और आप देख रहे हैं कि यह
हाल
कैसे
भरा हुआ है। मैं आप सबका हार्दिक स्वागत करती हूं। हिन्दी हमारी
राजभाषा और
विश्व-भाषा है। सबके मन में लालसा है कि हिन्दी एक महान भाषा बने।
विदेशों
में
हिन्दी अधिकतर हमारे मजदूर भाइयों-बहनों के साथ गई। उनकी यह सांस्कृतिक
धरोहर
रही
और अपने सत्व से वहां कायम रही। हिन्दी का जन्म संस्कृत और जनता की आम
भाषा के
मिलने
से हुआ। इस भाषा को अहिन्दी भाषा-भाषियों ने संवारा और बढ़ाया।
केशवचंद्र
सेन,
राजा
राममोहन राय,
स्वामी दयानन्द सरस्वती,
बाल
गंगाधर तिलक,
महात्मा गांधी
जैसे
अहिन्दी भाषा-भाषी महान पुरुषों ने इसका प्रचार किया और इसे बल दिया।
विदेशी
विद्वानों ने भी इसकी सेवा की और ग्रियर्सन जैसे व्यक्तियों ने हिन्दी
में ज्ञान का
खजाना
बढ़ाया। महात्मा गांधी ने कहा है कि यदि भारत को एक राष्ट्र बनना है तो
चाहे
कोई
माने या न माने,
राष्ट्र भाषा तो हिन्दी ही बन सकती है। तमिल के महाकवि
सुब्रह्मण्य भारती ने भी राष्ट्र की एकता के लिए राष्ट्रभाषा हिन्दी पर
जोर
दिया।
हमारे
स्वतंत्रता संग्राम में हिन्दी,
उर्दू
तथा भारत की दूसरी भाषाओं
की
महत्वपूर्ण भूमिका रही है। देश के निर्माण के लिए इस भूमिका को और
बढ़ाना है।
विदेशों के लिए इसे प्रेम और सद्भाव की वाहिका बनाना है। हमारे कवियों
और
साहित्यकारों ने जेलों में भारतीय भाषाओं और हिन्दी-उर्दू के गीत गा और
सुनकर
प्रेरणा ली और दी तथा कभी न बुझनेवाले स्वतंत्रता के दीप में स्नेह-दान
किया।
भारत
में अनेक भाषाएं हैं। हिन्दी के प्रेमी यह जानते हैं कि ये सब
आपस
में बहनें हैं। जितना ही इनमें स्नेह और समझ बढ़ेगी उतना ही हिन्दी को
बल
मिलेगा और दूसरी भाषाओं को भी।
गांधीजी ने कहा था कि 'हिन्दी
के जरिए
प्रांतीय भाषाओं को दबाना नहीं चाहता ताकि एक प्रांत दूसरे से सजीव
संबंध जोड़
सके।'
गांधीजी ने हिन्दी का उपयोग स्वाधीनता संघर्ष की वाणी के रूप में किया।
परिणाम यह हुआ कि हिन्दी भाषा में एक नई जान पड़ी,
एक
नया तेवर और स्वर पैदा
हुआ।
हिन्दी को सभी भारतीय भाषाओं के बीच संपर्क का काम करना है। हिन्दी
इसलिए
मान्य नहीं हुई कि वह सबसे संपन्न भाषा है बल्कि इसलिए कि अहिन्दी
भाषाभाषियों ने इसे अपनाया। उस पर उनका भी स्वत्व और अधिकार है।
गुरुदेव रवींद्रनाथ
ठाकुर
ने लिखा कि भारतीय भाषाएं नदियां हैं,
हिन्दी महा नदी। हिन्दी में यदि और
नदियों का पानी आना बन्द हो जाए तो हिन्दी स्वयं सूख जाएगी और ये
नदियां भी
भरी-पूरी नहीं रह सकेंगी।
आधुनिक युग विज्ञान और तकनीकी का है। इसकी मानव की
प्रगति के लिए बहुत आवश्यकता है। ज्ञान दिन-प्रति-दिन तीव्र गति से बढ़
रहा है।
हिन्दी में विज्ञान और तकनीकी के साहित्य को बहुत बड़े पैमाने पर
बढ़ाना चाहिए।
विश्व
का अन्य संपन्न भाषाओं से जितना ज्यादा ज्ञान आएगा उतनी ही जल्दी
हिन्दीवाले
उसकी
जानकारी से लाभ उठा उन्नति कर सकेंगे। इसी कारण आवश्यक है कि हमारे
बड़े-बड़े
वैज्ञानिक हिन्दी के माध्यम से सोचना और सीखना शुरू करें। मुझे खुशी है
कि अब
बच्चों के जो कार्यक्रम हैं उनमें इसका अधिक उपयोग हो रहा है। हिन्दी
तब बढ़ेगी जब
उसमें
विज्ञान और ज्ञान का ऐसा साहित्य रचा जाए जिसे विश्व की अन्य भाषाएं
ग्रहण
करने
के लिए लालायित रहें। हिन्दी को गुणों से भरना है और ऐसे विचारों से
भरना है
कि यह
जनता के हित में अधिक से अधिक ज्ञान दे सके।
शब्द
को भारत में ब्रह्म
कहते
हैं। ऐसे ही हिन्दी को व्यापक होना चाहिए। शब्दों का तो बहुत बड़ा
खजाना है,
किन्तु यह खजाना उपयोगी तभी होगा जब शब्दकोशों में बंद न रहे और उसका
प्रयोग हो,
हमारे
प्रतिदिन के जीवन में। अब हिन्दी में लाखों नए शब्द हैं। इससे हिन्दी
का
विस्तार स्पष्ट है। हिन्दी का प्रचार-प्रसार तभी संभव है जब इसे सभी
लोगों का
विश्वास प्राप्त हो और साथ ही हिन्दीभाषी दूसरी भाषाओं को मान दें।
भाषा
आदान-प्रदान का माध्यम है। राजनीतिक भेदभाव लाने से उसका महत्व घटता
है। इसी प्रकार
धर्म
के नाम को राजनीति में लाना धर्म को संकीर्ण करता है।
हिन्दी में नवीन
विचार,
ज्ञान
एवं मनुष्य के दु:ख-दर्द का साहित्य बढ़ाना चाहिए ताकि लोगों को उससे
संतुष्टि हो और अपनापन दिखे। हमारे देश में त्रिभाषा सूत्र है।
मातृभाषा तो आवश्यक
है ही,
राष्ट्रभाषा अन्य भाषाओं के बीच की कड़ी है और एक बाहरी भाषा
अंतरराष्ट्रीय
कड़ी
के रूप में चाहिए। इससे राष्ट्र की एकता को बल मिलेगा,
अंतरराष्ट्रीय मैत्री
बढ़ेगी और संसार से ज्ञान लेने और देने के लिए दरवाजे खुले रहेंगे।
भारत
सरकार
ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए यथाशक्ति प्रयास किए और कर रही है।
हजारों
पुस्तकें सरकारी सहायता से लिखी गई और छपीं। पांच-छह लाख पृष्ठों का
अनुवाद हुआ।
भारत
सरकार ने सभी राज्य सरकारों को एक-एक करोड़ रुपये अपनी-अपनी भाषाओं में
ज्ञान
और
विज्ञान के उच्च साहित्य प्रकाशन के लिए दिए जिनसे कई हजार अच्छी
किताबें छपीं।
सरकार
ने वैज्ञानिकों और तकनीशियनों के सहयोग से पांच लाख पारिभाषिक शब्दों
का
निर्माण कराया,
जिनका
पुस्तकों में प्रयोग हो रहा है। अहिन्दी भाषा-भाषियों को
हिन्दी सीखने के लिए पूरे अवसर दिए जाते हैं। संसार की बहुत-सी भाषाओं
और हिन्दी के
शब्दकोश विद्वानों द्वारा बनाए जा रहे हैं। इन सब प्रयत्नों से हिन्दी
ने प्रगति की
है,
यद्यपि हमें अभी बहुत कुछ करना है।
भाषा
को अपने विकास के लिए केवल
सरकार
पर निर्भर नहीं रहना है। सभी समर्थ लोगों एवं संस्थाओं को भारत तथा
विदेश में
प्रचार के लिए सद्भावनापूर्वक प्रयास करते रहना चाहिए। इस समय जैसे कि
हमारे
शिक्षामंत्री ने कहा है कि संसार के अनेक देशों में और बहुत से
विश्वविद्यालयों और
संस्थानों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है और हिन्दी पर शोध हो रहा है। अब
विश्व में
हिन्दी और भारतीय भाषाओं के प्रति रुचि बढ़ी है। कल ही मैं एक सभा में
जा रही हूं
जिन्हें 'रोमा
लोग कहते हैं'
वे
लोग समझते हैं कि बहुत वर्ष पहले,
सदियों पहले वे
भारत
से ही निकले और दुनिया के हर भाग में फैले। आज भी उनकी भाषा में बहुत
से शब्द
हिन्दी,
पंजाबी और कुछ दूसरी भारतीय भाषाओं के हैं। लोग भारत और उसके बारे में
अधिक
जानना
चाहते हैं। हिन्दी के पठन-पाठन की कुछ व्यवस्था विदेशों में पहले से ही
थी।
सैंकड़ों वर्षों से थोड़े से विदेशी साहित्यकार हिन्दी के साहित्य को
रच रहे हैं।
उन्होंने हिन्दी की पुस्तकों का अनुवाद भी अपने देशों में किया है।
अब
चर्चा
है कि
संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी भी मानी जाए। संयुक्त राष्ट्र संघ में
हिन्दी
के
लिए यह वास्तव में बड़ी बात होगी,
किन्तु उससे बड़ी बात यह होगी कि भारत में
मौलिक
साहित्य इतना आगे बढ़े कि शोध तथा अन्वेषण का वह माध्यम बने और हिन्दी
का
साहित्य इतनी उच्च-कोटि का हो कि संसार के लोगों को हिन्दी न जानने से
अभाव
लगे।
भाषा
की टेक्नालाजी तेजी से बढ़ रही है। अनुवाद के लिए कप्यूटर आदि का
प्रयोग हो रहा है। हिन्दी के वैज्ञानिकों और तकनीशियनों को इस दिशा में
समय के साथ
ही
नहीं,
दूर
का सोचना चाहिए जिससे हिन्दी और हमारी दूसरी भाषाएं पिछड़ न
जाएं।
हिन्दी में पत्रिकाएं और उनके पढ़ने वालों की संख्या बढ़ी है। सिनेमा
और
फिल्म-संगीत ने भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार में बड़ी सहायता की है। जो
पत्र-पत्रिकाएं और फिल्में जनता तक पहुंचती हैं,
उन्हें रचनात्मक और गुणात्मक होना
चाहिए
ताकि भारत जैसे महान देश की सांस्कृतिक चेतना वे प्रकट कर सकें।
हमारी
सरकार
ने एक हिन्दी विश्व-विद्यालय की स्थापना पर विचार करने के लिए कुछ समय
पहले
ही
कमेटी नियुक्त की थी और मेरी आशा है कि उसका काम तेजी से आगे बढ़ा
है।
हिन्दी सारे विश्व में मैत्री और सद्भाव की ध्वजा फहराए। हमारे अमूल्य
संदेश-सह-अस्तित्व,
शांति
और अहिंसा- को दुनिया के दूर से दूर स्थान में फैलाए। यह
हम
सबकी कामना होगी चाहिए। यही इसकी सार्थकता होगी।
काका
साहब कालेलकर कहा
करते
थे कि 'अहिंसात्मक
लड़ाई लड़नेवाली यह भाषा सारे संसार को आजादी का संदेश दे
सकती
है और दमन के खिलाफ आवाज उठा सकती है।'
मैं
यह कहूंगी कि विश्व-शांति और दलित
मानव
के उत्थान में इसकी भूमिका प्रेरणात्मक होनी चाहिए तभी सब मानव जाति की
सेवा
यह
भाषा कर सकेगी।
मैं
आशा करती हूँ कि इस सम्मेलन से हिन्दी का अधिक प्रचार
होगा
और सही मायने में विश्वभाषा हिन्दी बन सकेगी। आप सबका मैं फिर से
स्वागत करती
हूँ
और इस शुभ अवसर पर अपनी शुभकामनाएं देती हूँ।
धन्यवाद!
(तीसरे
विश्व
हिंदी सम्मेलन में दिया गया
अभिभाषण)
  
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संपादकः
जयप्रकाश मानस
संपादक मंडलः
डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा,
डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति
तकनीकः
प्रशांत रथ |