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संस्मरण |
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संस्कारों से प्रतिबंबित्व व्यक्तित्व डॉ. विनयमोहन शर्मा
(छायावाद के जनक पं.मुकुटधर पांडेय को याद करते हुए) मेरे संस्मरणों को आज पाण्डेय-परिवार ने आँखों के सम्मुख प्रस्तुत कर दिया । एक संस्करण नागपुर का है, दूसरा रायगढ़ का है । बहुत पुरानी बात है । नागपुर के विज्ञान महाविद्यालय की हिन्दी-साहित्य समिति के वार्षिकोत्सव में कवि सम्मेलन आयोजित किया गया था । स्थानीय कवि कविता-पाठ कर रहे थे, श्रोता कभी हंसते, कभी ही-ही....हू-हू की आवाजें कसते । जिस समय आयोजक महाशय माइक पर आकर बोले, उपस्थित देवियों और सज्जनों । आपको यह जानकर प्रसन्नता होगी कि आज हमारे बीच हिन्दी के लब्धप्रतिष्ठ कवि पण्डित मुकुटधर जी पाण्डेय विराजमान हैं । अब आप स्वस्थ होकर शांत होकर उनकी कविता का रसास्वादन कीजिए । घोषणा के पश्चात धोती-कुर्ता पहने वे सहमते-सकुचाते हुए से धीरे-धीरे खड़े हुए और बोले-सज्जनों, मैं कोई रससिद्ध कवि नहीं, किंकर मात्र हूँ । ग्रामवासी हूँ । इतना कहकर एक छोटी-सी रचना सहज भाव से सुना गये । मेरे मन में उन्हीं की एक पंक्ति गहराई-ऋत्विज हो तुम महायज्ञ के रहते हो अनजान और मुझे, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के हिन्दी साहित्य के इतिहास की यह पंक्तियाँ स्मरण हो आयीं जिसमें उन्होंने पाण्डेय जी को छायावादी कवियों का प्रेरणा-स्त्रोत कहा था । उन्होंने लिखा है – छायावाद के पहले मान्य विषयों की ओर हिन्दी कविता अग्रसर हो रही थी, उसमें गुप्त जी किसी निर्दिष्ट पद्धति पर न रहकर कई पद्धतियों पर चलते रहे लेकिन मुकुटधर जी बराबर अपनी नई पद्धति पर ही लिखते जा रहे हैं । उन्होंने एक शब्द का प्रयोग किया था कि पुराने ढर्रे हैं लेकिन आपके सम्बन्ध में शुक्ल जी ने लिखा कि आपने जिस ढंग की जिस धारा को अपनाया, उसी धार को निरंतर अग्रसर करते जा रहे हैं और वे उसके प्रेरणास्त्रोत बने हुए हैं। यह उनके प्रथम दर्शन थे मेरे लिए और जब 1958 में उनके ही निवास स्थान रायगढ़ के शासकीय कला महाविद्यालय में प्राचार्य पद पर मेरी नियुक्ति हुई तो उनके और उनके परिवार के साथ मेरा आत्मीय संबंध बन गया । मैं जब रायगढ़ गया तो गेस्ट हाऊस में ठहरा । सबसे पहले लोचन प्रसादजी पांडेय के दर्शन हुए और उन्होंने कहा कि तुम्हें तो आज मेरे साथ ही भोजन करना होगा । तो यह मेरा पाण्डेय परिवार के प्रथम आत्मीय परिचय था । पांडेय जी की विशेषता यह रही कि वे अपने संबंध में प्रायः नहीं के बराबर ही बोलते थे पर दूसरों के विषय में उनके ह्रदय का जो भावोन्मेष था, वह मुखर हो उठता था, काफी प्रशंसा करते थे । कभी किसी के संबंध में उन्होंने एक शब्द भी निंदा का नहीं कहा ।
दूसरा प्रसंग यह है कि एक बार यह विचार आया कि आपके जन्म स्थान बालपुर का दर्शन करें । तब आपने कहा कि मैं वहाँ ले चलूँगा और एक दिन जीप लेकर आ गये और उसमें यहाँ के प्रसिद्ध डॉक्टर गोविंद प्रसाद शर्मा और एक-दो सज्जन थे । जब हम वहाँ पहुँचे तो देखा कि गाँव के बाहर बहुत से व्यक्ति वहाँ बैठे हुए हैं-गाजे-बाजे के साथ बैठे हुए हैं । संध्या हो गई थी । वे गाजे-बाजे के साथ हमें अपने घर ले गये । कल्पना कीजिये कि ऐसा स्वागत न कभी मेरा हुआ है और न होने वाला है । एक श्रेष्ठ कवि मुझे ले जा रहा है अपने घर-गाजे बाजे के साथ । वहाँ हम लोग बैठे, कुछ कवितायें पढ़ी गयीं, रात भीगती गई, हमारा मन भी भीगता गया । उसके बाद महानदी के तट पर जाकर हम लोगों ने महानदी के दर्शन किये । नाव वहाँ तैयार थी । धीरे-धीरे नाव महानदी में संतरण करने लगी । मेरा ह्रदय कृतज्ञता से इतना भर गया कि मैं कुछ नहीं कह पाया । केवल पांडेय जी की आँखों से अपनी आँखें मिलाता रहा और मूक कृतज्ञता व्यक्त करता रहा । पांडेय परिवार केवल साहित्य लिखता ही नही, साहित्य जीता है । उसमें सह्रदयता है और अपनी भावनाओं को किस तरह से कहाँ प्रस्तुत किया जाय- यह सब वह जानता है । यह मेरा दूसरा अनुभव है जो अपूर्व है और मैं समझता हूँ मेरी ज़िंदगी में इस तरह का अनुभव पहले कभी नहीं था ।
जब मैंने उनके विषय में, साहित्यिक जीवन के विषय में कुछ जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि मैं अपनी 12 वर्ष की उम्र से ही कुछ तुकबंदी करने लगा था । आपके अग्रज श्री लोचन प्रसाद जी पांडेय “सरस्वती” के बहुत पुराने कवि और लेखक थे । स्वाभाविक था कि आपकी रचनाओं को वह संशोधित कर देते थे । और वह “सरस्वती” में छपती थी। सन् 1915 में उनके पद्यों का संग्रह “पूजा-फूल” के नाम से प्रकाशित हुआ लेकिन उसके साथ उन्होंने अपने ज्येष्ठ भ्राता मुरलीधर जी का नाम जोड़ दिया । वह मुरलीधर-मुकुटधर युग्म नाम से छपा था । इसे किसने प्रकाशित किया था, मुझे याद नहीं आ रहा है । उन्होंने बताया था कि पूजा-फूल में मेरे प्रारंभिक वर्णनात्मक पद्य हैं । सन् 1915 में प्रयाग विश्वविद्यालय की प्रवेशिका परीक्षा उत्तीर्ण होकर मैं एक महाविद्यालय में भर्ती हुआ पर मेरी पढ़ाई आगे नहीं बढ़ पायी । मैंने हिन्दी, अरबी, बंगला, उड़िया साहित्य का अध्ययन किसी विद्यालय या महाविद्यालय में नहीं किया । घर पर ही मैंने उनका अनुशीलन किया और उसमें थोड़ी-बहुत गति प्राप्त की । पांडेय जी ने मुझे बताया कि अंतःकरण का जो सौंदर्य है, वह मुझे धीरे-धीरे अपने चाहों और के वातावरण से प्राप्त होने लगा था । रायगढ़ में किसानों को हल चलाते देखकर उन्होंने “हलिया” शीर्षक से किसानों पर कुछ कवितायें लिखीं । “छायावाद” पर कल से आप लोग सुनते आ रहे हैं । “छायावाद” के नामकरण का रहस्य क्या है ? आप कहते हैं कि बहुत दिनों बाद जब कुछ लोग मेरी रचना छायावाद के अंतर्गत पढ़ने लगे और कुररी को गिनाने लगे तब मुझे आश्चर्य हुआ और तब मैंने अनुभव किया कि छायावाद लिखा नहीं जाता, लिख जाता है । 1920 के लगभग जबलपुर, की “शारदा” में मैंने एक लेखमाला लिखी । उसमें प्रसाद जी के “झरना” का उल्लेख किया । प्रायः लोग कहते हैं कि छायावाद बंगला से आया लेकिन उस समय बंगला साहित्य में छायावाद का नाम भी नहीं आया था । यह शब्द मेरा गढ़ा हुआ है और मैंने परोक्ष सत्ता के प्रति जिस भाव का अनुभव किया उसे “छायावाद” का नाम दिया । मैंने मुकुटधर जी से कहा कि परोक्ष सत्ता के प्रति भावों की रचना तो “रहस्तवाद” की अभिव्यक्ति की जा रही है तो उन्होंने कहा कि ऐसी रचनाओं का “रहस्यवाद” नाम हरिऔध जी ने दिया है । यह पहली बार मैंने सुना । उन्होंने इसे स्वीकार किया कि अंतर्मुखी रचना की जो अभिव्यक्ति है, वह छायावाद के अंतर्गत ही आ सकती है । जब मैंने नई कविता का छायावाद नाम रखा था, उस समय कविता में कोई रहस्यवाद होने का प्रश्न नहीं पैदा हुआ था । अतः मैं भी स्पष्ट संकेतात्मक रचना को छायावादी रचना कहता था। उसका अवलंबन चाहे लौकिक हो, चाहे अलौकिक ।
रायगढ़ सचमुच में एक साहित्यिक तीर्थ था । बहुतों को शायद स्मरण न हो कि 1957-58 में अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य परिषद् का अधिवेशन आपने यहाँ कराया था और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी उसके उद्घाटन के लिये आये थे और तब इस प्रकार की अनेक गोष्ठियों को देखते हुए ऐसा लगता था कि यह साहित्यिक तीर्थ है । उसके कुछ दिनों बाद यहाँ प्रोफेसर रामेश्वर शुक्ल अंचल जी आये और वे प्राचार्य रहे । इन दोनों के प्राचार्यत्व-काल में सचमुच रायगढ़ का साहित्यिक दृष्टि से अपना एक विशेष महत्व रहा है । (स्व. विनयमोहन जी अपने समय के प्रख्यात आलोचक और शिक्षाविद् रहे हैं । यह संस्मरण उन्होंने बहुत पहले लिखी थी । - संपादक)
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