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पत्रावली |
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महावीरप्रसाद द्विवेदी के पत्र गुप्त जी के नाम
श्री मैथिलीशरण गुप्तजी का जन्म झाँसी जिले के चिरगाँव नामक क़सबे में संवत् 1943 में हुआ । इनके पिता का नाम लाला रामशरण गुप्त था । गुप्तजी ने सम्पन्न घर में जन्म लिया । यही नहीं, इनका परिवार संस्कृत रुचि का भी था । इनके पिता वैष्णव भक्त और कवि भी थे ।
श्री मैथिलीशरण गुप्तजी आज राष्ट्रकवि के रुप में प्रख्यात हैं । राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसादजी ने उन्हें राज्य परिषद का सदस्य भी बनाया है । ‘भारतभारती’, ‘साकेत’, ‘यशोधरा’ आदि अनेक उनके प्रसिद्ध काव्य ग्रन्थ है ।
श्री मैथिलीशरण गुप्तजी का पं. महावीरप्रसाद द्विवेदीजी से बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध था । द्विवेदीजी उनके गुरु थे । गुरु-शिष्य का पत्र-व्यवहार भी बहुत हुआ था । इन पत्रों का साहित्यिक महत्व भी बहुत है । गुप्तजी के पास द्विवेदीजी के कुछ पत्रों का संग्रह भी था, जिसे उन्होंने ‘भारत-कलाभवन’, काशी, को दे दिया । इन्ही पत्रों में से छाँटकर महत्वपूर्ण पत्र यहाँ दिये जा रहे हैं ।
मैथिलीशरण गुप्त के नाम
(1) जुही, कानपुर 1-1-09 प्रियवर बाबू मैथिलीशरण, कृपा-पत्र मिला । कविता-कलाप की कापी हम 3-4 दिनों में इंडियन प्रेस को भेज देंगे । आपकी शेष कविताएँ जब हो चुकेगा, तब उन्हें भी पीछे से भेज देंगे । रविवर्मा के ‘गंगावतरण’(1) और ‘रामचन्द्र’ और ‘गंगावतरण’(2) पर भी 10-11 पद्य आप लिख दें तो इन चित्रों का उद्धार हो जाय । हम अपना एक चित्र यहाँ बनवाकर छपने भेजेंगे । अभी निश्चय नहीं है । ‘द्रौपदी-दुकूल’ फ़रवरी में निकलेगा । भवदीय म.प्र.
(2) दौलतपुर डाकघर भोजपुर, रायबरेली 18-1-09 प्रियवर बाबू मै.श., हमारे बहनोई का 6 फरवरी को शरीर छूट गया। वही हमारे घर पर रहते थे। अब उसे हम उजाड़ समझते हैं। इसी से यहाँ आना पड़ा । 8-10 दिन में कानपुर लौटेंगे। ‘गर्विता’ नाम बुरा नहीं। ‘सगर्वा’ से अच्छा है । कविता भी मज़े की है। ज़रा सरलता का ध्यान रक्खा कीजिए जिसमें बढ़ते ही मतलब समझ में आ जाय। ‘कविता-प्रलाप’ छपने गया। अवशिष्ट कविताएं यथासम्भव शीघ्र भेजिए । आपकी कविताओं के प्रूफ़ हम आपको भेजेंगे। उन्हीं में जो संशोधन चाहिए कर दीजिएगा। केशों की कथा की समालोचना पं. श्यामनाथ ने भेजी है। अच्छी है, छपेगी। भवदीय म.प्र.
(3) प्रियवर बाबू मैथिलीशरण, जूही, कानपुर25-1-09 मा. कृष्ण 7 का पत्र मिला। ‘गर्विता’ में स्वामी मेरे बचन कर दिया। जिन 25 कविताओं के नाम आपने लिखे वे सब ‘कविता-कलाप’ में छपेंगी। ‘सीता का पृथ्वी- प्रवेश’ और ‘रामचन्द्र का गंगावतरण’ भेज दीजिए । औरों पर (गंगावतरण और महानन्दा पर) जी चाहे लिखिए जी चाहे न लिखिए । चित्रों के नीचे के पद्य अलग-अलग काग़ज के टुकड़ों पर लिखकर भेज दीजिए । महानन्दा कल्पित नाम है। जो भाव चित्र से निकलता हो वही ठीक है। चित्र-चर्चा उत्तम विषय है। उस पर लिखिएगा। एप्रिल में एक रंगीन चित्र निकलेगा (कर्ण-कुन्ती), कविता के लिए उसे अगले महीने भेजेंगे। भवदीय म.प्र.
(4) दौलतपुर 11-3-09 प्रियवर बाबू मैथिलीशरण, कार्ड मिला। ‘कुमारसम्भवसार’ का अनुवाद उर्वू में नहीं हुआ; जहाँ तक हम जानते हैं, किसी को अनुमति भी हमने नहीं दी और न देने की इच्छा है। कल या परसों आपको एक पत्र भेज चुके हैं। भवदीय महावीरप्रसाद
(महावीरप्रसाद द्विवेदी रचनावली से साभार। हम महत्वपूर्ण पत्रों को लगातार यहाँ प्रकाशित करेंगे । संपादक)
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