रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 12, मई, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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मीडिया विमर्श

सृजनगाथा का एक साल

सहभागी लेखकों को बधाई

मीडिया विमर्श

 

 

इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रिंस


संजय द्विवेदी

 

लेक्ट्रानिक मीडिया के हिस्से आलोचनाएं भले ज्यादा हों पर उसकी ताकत को नकारा नहीं जा सकता । कुरूक्षेत्र के प्रिंस प्रकरण ने जहाँ मीडिया की संवेदनशीलता, प्रभाव और सरोकारों को साबित किया वहीं यह भी संदेश दिया कि मीडिया चाहे तो अपने सकारात्मक संचार से पूरे देश को एक सूत्र में बांध सकता है। संचार की यह सकारात्मकता बहुत कम इसलिए महसूस की जाती है क्योंकि इसका इस्तेमाल बहुधा नहीं होता। सेक्स, अपराध, स्कैंडल, सिनेमा या पापुलर कल्चर के आजमाए व ताकतवर फार्मूले मीडिया का मूल स्वर हैं। शायद ऐसा इसलिए भी क्योंकि इलेक्ट्रानिक मीडिया के सरंजाम जमाने में लगी पूँजी भी उसे बहुत सरोकारी और संवेदनशील होने से रोकती है क्योंकि सरोकार यदि बाजार में हिट हो तो ठीक वरना यह पूँजी कोई रिस्क लेने लो तैयार नहीं है। बिके तो देशभक्ति भी चलेगी, प्रिंस भी, बुधिया भी, ऐश और अभिषेक भी और तीन युवाओं से प्रधानमंत्री सुरक्षा में हुआ छेद भी । नहीं तो कुछ भी नहीं ।

 

बाजार अगर बाबा रामदेव भी दिलाएं तो स्वीकार, यह बाजार अगर इंडियन आइडल के रोते-बिलखते असफल प्रतिभागी बनाएं तो भी स्वीकार। दरअसल मीडिया इसी पापुलर का पीछा करता है। वह रोज नई कथाओं, नए नायकों की तलाश में रहता है। उसका शिकार हर वह कथा है जो उसे छोटे पर्दे पर स्वीकार्य और दर्शकों को खींच सकने लायक बनाए। कथाओं में कथाएं तलाशता मीडिया इसीलिए कभी नैतिक पुलिस तो कोर्ट की फटकार लगती है और अदालत उसे माफ करने से इंकार कर देती है वही नृत्य दिखाते हुए इलेक्ट्रानिक मीडिया इस समाचार को प्रस्तुत करता है। सही अर्थों में मीडिया अपना आनंद लोक रचता है और दर्शकों को उसमें शामिल कर लेता है। भविष्यवक्ता कुंजीलाल की मौत के दावे हों या प्रिंस की जान का सांसत में पड़ना - सब कुछ इसी आनंदलोक का हिस्सा है। किसी भी मौत का इंतजार करते हुए पूरा दिन गुजार देना और मौत का न आना - यही तो कुंजीलाल कथा है। पर कथा कही गयी, कई अर्थों में रची गयी और उससे ज्यादा देखी गयी। कुंजीलाल उस दिन मीडिया का प्रिंस बना रहा। फिर बुधिया की दौड़ उसे प्रिंस बनाती है। कथाएं तलाशता खबरिया चैनल पटना के प्रोफेसर और उनकी शिष्या के प्रेम को राष्ट्रीय विमर्श में तब्दील कर देता है। प्रोफेसर की पत्नी की पीड़ा उपहार में बदलती दिखती है। उसकी शिष्या अचानक नायिका में तब्दील हो जाती है - बस चलता तो मीडिया प्रोफेसर को हिंदुस्तानी सेंट वेंलटाइन में बदल देता । किंतु यह प्रिंस की तलाश दृश्य माध्यम की मजबूरी है । उसे नायक चाहिए - उससे जूड़ी कथाएं बताता मीडिया - इस वाचिक परंपरा के देश को सूट करता है । नायक अपने साथ नए विमर्श खड़े करता है या मीडिया उसे गढ़ता है । प्रधानमंत्री आवास पर नशे में धुत तो लड़कियों व एक लड़के की घुसपैठ भी मीडिया की ही तलाश है । प्रिंस के मामले में नायक बना मीडिया बदल जाता है एसपीजी में । ले लेता है प्रधानमंत्री की सुरक्षा की जिम्मेदारी । वह खबर के पीछे दौड़ता है। पुलिस से बचे नौजवान मीडिया की गिरफ़्त में आते ही बन जाते हैं आरोपी । फिर सक्रिय होती है सरोजनी नगर पुलिस। यह है मीडिया का नया चेहरा जो पुलिसिंग भी कर रहा है । अब आज फिर एक प्रिंस- तीन युवा बदल जाते हैं एक झकास स्टोरी में । फिर वही लाइट, एक्शन और लाइव का तमाशा ।

 

सरोकारों की कथाएं सुनाता खबरिया चैनल कहता हैः भेजिए एसएमएस, कीजिए प्रिंस के लिए दुआ । एसएमएस से झोली भर जाती है - हम भूल जाते हैं कि एसएमएस का अर्थ होता है पैसा जिससे चैनल वाले अपनी झोली भरते हैं। अचानक खबर आती है कि प्रिंस गाँव से गायब है । उसके माता-पिता के साथ एक खबरिया चैनल 5 लाख का सौदा कर इस परिवार को मुंबई  ले जाता है । यह बाजार पर बाजार की जीत है । मीडिया का कैमरा पापुलर के पीछे भागता है । वह पापुलर की गालियाँ खाता है फिर भी उसके पीछे जाता है । कई बार सौदे भी करता है । सौदे में निकली कथा बदल जाती है, एक लाइव हाहाकार में । यह मीडिया कभी इस्तेमाल होता है, कभी लोग इसका इस्तेमाल कर लेते हैं । राखी सांवत- मीका प्रकरण में दोनों के लक्ष्य सधते हैं । एक की टीआरपी बढ़ती है, दूसरे के शो के रेट बढ़ जाते हैं

 

कुल मिलाकर बहुत साफ चीज़ें कहने व स्थितियों की अतिसरलीकृत व्याख्या संभव नहीं है । इलेक्ट्रनिक मीडिया पापुलर विमर्श का ही वाहक है । उसे दिखना है, बिकना है और इसी में उसकी मुक्ति है । ऐश्वर्या और अभिषेक की शादी पर पंडितों सरीखे मंत्र पढ़ते चैनल, बिकनी के 60 साल पूरे होने पर कथाएं सुनाते चैनल, कारगिल पर देशभक्ति गीत गाते चैनल, राखी सांवत के आनंद लोक में भटकते चैनल, राखी सांवत के आनंद लोक में भटकते चैनल, कुंजीलाल की मौत का इंतजार करते चैनल, एक ऐसा इंद्रधनुष रचते हैं, जहाँ विवेक अपह्रत हो जाता है ।  दिखता है उनका लक्ष्य पथ ! संधान ! बाजार और टीआरपी !!! आप इन चैनलों को बचकाना कह रहे हैं, मत कहिए ! वे अब व्यस्क हो चुके हैं !!

संजय द्विवेदी

स्थानीय संपादक, हरिभूमि

ए-2, अनमोल फ्लैट्स,

अवंति विहार कालोनी,

रायपुर (छ.ग). फोनः 0771-2444107

 

 

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