रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 12, मई, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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ललित निबंध

सृजनगाथा का एक साल

सहभागी लेखकों को बधाई

 ललित निबंध

 

चली फगुनहट बौरे आम


 डॉ. विवेकी राय

 

    ह बेकारी-बेरोजगारी से नहीं डरी, भ्रष्टाचार-महँगाई से नहीं मरी । वह नयी जनचेतना की भांति फिर उमड़ आयी और छा गई - कलिन में, कलून में, केलिन में और पद्माकर के कछारन में ! जैसे कोई फर्क नहीं पड़ा । वातावरण ऐसा कि बिहारी की नायिका के नयन की नयी रुखाई बनकर और चित चीकने का सन्देश लेकर पत्ते खड़खड़ाकर उड़ने लगे। दिल धक्-धक् कर धड़कने लगा । वह हाहा... हूहू करती खड़जंग पछिमा आखिर ऐसी बगटुट होकर काहे धवाठी मार रही है ? कौन-सी आँखें देख ली है ? एक बांस ऊपर पतंग टंगते-टंगते कमल वनों से लौटी सुरभि-सेना उखड़ गई । सनकी-से नये-नये शरीक बवंडर पता नही, धूल उड़ाते किधर चले ?

 

जब भी बदलता है, तगड़े में बदलता है यह मौसम भीतरवाला । नशा चढ़ता है तो फागुन में बुढ़वा..... । यही क्रान्ति है । संक्रान्ति कितनी पीछे छूट गई, जिस दिन लोगों ने बैठकर ताल ठोक समहुत किया - हारी खेलत रंग बनाय..... !’ फिर धीरे-धीरे जकड़न छूटी । दुबके लोगों ने अंगड़ाई ली । फूल खिले, सोने की बाल हिली, वन चहके, बाग महके । नये सूरज ने नयी सेंक दी, तो क्या हुआ कि उमड़े मधु अंध भोंर झौर !' वह  ऊखम देन की अजीब सुनहट, चली सनसनाहट, चली फगुनहट, बौरे आम ! (खास ही क्यों ?)

 

आपने ठीक कहा, ऋतुएं तो और-और भी बदलती हैं, पर बाहर-भीतर ऐसा-ऐसा कहाँ बदलता है ? कहाँ कब आँगन में काग बोलकर पिय-आवन का शुभ सगुन उचारता है ?  किसी की अंगिया कब, कौन सोने में बोर देता है ? कैसे अनजाने स्वर खिंचकर द्रुत विलंबित हो गया ? बारंबार गायन-इच्छा जोर मारती है, कितनी अच्छी वह खारे की मिठास- ‘होरी पिया बिन लागी रे खारी!’ पिया ! कंठ-करठ में पिया-पिया, पपीहा झूठ । सच है, ऋतु फागुन नियरानी, कोई पिया से मिलावे । तो, कौन मिलावे ? रंग न चीन्हें मूरख लोई । यह लोई भी खूब आयी ! ..... हमको डांड़ो-वोंड़ो मति कोई, हम खूंटा चीरबि लोई ! लोगों, मुझे  दंड मत दो, मैं खूटा चीर दूंगा । उस गौरैये, की दाल तो मिल गई, पर कबीर का रंग ?  मुझे मेरा फागुनी रंग दो । मेरी की झोरी दो, मेरी होरी दो, ब्रज में हरि होरी मचायी !’ एक दिन का ब्रज, एक रात की राधा, एक क्षण का मुट्ठी-भर गुलाल,छुटत झुठी ह्वै जाय तो कितना अच्छा ! उस पुरानी झकझोरी- झकझोरी-बरझोरी की फागुन-देसी भाषा का भी जवाब नहीं । सौ खून माफ़वाले केस में मुद्दई एक अदद गुलाब-गंध । मत कहो किगंवई गाहक गाहक कौन ?’ ‘आवृत सरसी उर सरसिज कहाँ खिलते हैं ?’ केशर के केश कली के, कहाँ छूटते हैं ? स्वर्ण शस्य अंचल पृथ्वी का कहाँ लहराता है ? भाई साहब,  गाँव-गाँव दुल्हा, चलो बकुलहा !

 

देखो, बरात निकली । घरों से,   घौंसलों से, मड़इयों से, माँद से, चलो खेत की ओर । हाथ में लाठी-रस्सी, मुँह में मीठी हँसी और अंग-अंग ? - फागुन के रंग उमगाने सब अंग-अंग !’ बनिहार नहीं, फागुनी रसिया, जिनके हाथों के झण्डे पर बिन हथौडे़  का हँसिया, सुबह की गुलाब-गर्द पीते, हेमन्त अन्त की अंजुरी भर धूप में जीते, वे कीड़े-मकोड़े क्यों ? धरती के सुनहरे पन्ने उलटकर अपने पट्ठेदार, खुरदरे और हरमुठ हाथों से अथवा काँच की कुछ खनकती चुड़ियोंवाली मटिही कलाइयों की भंगिमा से वे ऋद्धि-सिद्धि के इतिहास के लिखनहार, अ-वनिहार । नागहानी किसानी और सुलतानी खलिहानी से जुड़ी, जिनके हाथों की रचना में हँसिया के अविरल  चोटों से, बज रहे चने हैं घनर-घनर । वाह कविरवि जी, बना दिया फागुन मस्त महीना । चमका दिया चने को । मगर चने का दर्द भी कोई समझे ! -चुटहंसिया न मारो, लागत करेजवा में चोट !’

 

 भैरवी का खेत में साक्षात्कार कुछ अर्थ रखता है, जहाँ अगणित काल भैरवियां रंग-बिरंगी तितलियों के पंखों पर उतरती है, मटर-सरसों के फूलों पर रंगरेलियां करती हैं, कोमल स्पर्शी श्यामली अरहर के फूलों से फगुआ माँगती है, वहाँ फागुन खड़ा जायेगा लेता है, क्या वह निरा खाक फाँकने उतरा गाँव की गलियाँ में ? बड़ा ढीठ है- गलिया में ठाढ़ अकेले हो लला !’  उधर मांझ-सकारे ही क्यों रात-बिरात निरन्तर ढोल-मृदंग के धा-धा-धिन्ना में कोई समय का सभापति जैसे डोंडी पीट-पीटकर ऐलान करता है, भाईो,फागुन की दूधिया चांदनी में सोना मना है, अकेले गाना मना है और जो शख्स हुक्मउधूली करता है उसके लिए झ-र-र-र-झ-र-र-र, सुन लो भइया मोर कबीर.....!’

 

सीवान बहार रही फगुनहट क्या-क्या नहीं बहार लायी गाँव में ? अलसाये अल्बड़पन की साया में, उमर-उमर के पोर-पोर में भी गाढ़े मधिया रस की टनटनाकर चिटकती तृप्ति क्या छिपनेवाली है ? मन-मन में मणिपुर मनसायन-ता-ता थेई..... दृगति....थेई.....नाचत नागर नागरी संग । रस में नहा जाता है मन, और महीनों का खाना न फागुन का नहाना। फागुन उठि के प्रात नहाय, आकाशगंगा में, गुलाल घुली ज्योति धारा में ! प्राची तट पर फागुनी विहास का वह उजास जैसे विराट मुख कांति, जैसे उषा-अंगराग, जैसे व्योमकेश की विभूति, जैसे तारक घोल अथवा प्रकाश का पराग..... लेकिन दुख-भूख भरी दुनिया में इस सौन्दर्य का दर्शन क्या ? आंखें खुली होकर भी बन्द । धन्यवाद फागुन को । हर स्तर पर चार दिन के लिए आंखें खोल दीं ।

 

उज्जर दिन की श्य्या पर सरसराती पछिमा समधइन रंग और हुड़दंग लिये करवट बदलती है । चेलिकों की पूरी फौज तैयारस सेनापति कोकिल । गौरैया कंठों की चुनमुन-चुनमुन । लोौटा गगनबिहारी, पांख पर नीम की पत्तियां झड़ पड़ीं, आँखों में महुए का कोंचा गड़ गया । पथ में पके गेहूं की बालियों के स्वर्णिम प्रसार के पांवड़े । हाथों में प्रेम-प्रीति की पिचकारी....लोग बारंबार पूछते हैं, क्या अब भी ?

 

मैं सोचता हूँ, मामला जरा टेढ़ा है । सालोसाल देखता हूं, फगुनहट के रंग में डूब जाते सूखा-अकाल, घेराव-पथराव, नारे-चलूस, आन्दोलन-हड़ताल और विरोध-वोद्रोह ! सब कुछ भूलकर हड़बड़ाये लोग चिल्ला उठते-पलाश-अमलतास की जय, चंदा-चमेली की जय ! गुलाब-गुलसब्बो जिन्दाबाद, मल्लिका-कचनार जिन्दाबाद ! हेमन्त के हिप्पी की जोगनी में रात मशाल लिए खुद खड़ी रहती है....जोगी जी, चुप्पे रहि जास सुन लो मेरी बानी । यदि नहीं तो भरो जोगिन का पानी । ढम ढमाढम ढम !..... अब बजाओ नागड़धिन्ना, अब मजा है डेढ़ घरी का ! जोगी जी, सारा-रा-रा-रा-रा-रा-रा-रा-रा ! अब भी सन्देह है ? .... बौरों की भीड़  लेकर फगुनहट का तूफान मेल अपनी गति से जाता है । एक्सीडेंट मना है..... सौ-पचास गंजेड़ी-भंगेड़ी न एक  ‘जोगिड़ा !’ फट पड़ा मजमे में-

कैसे-कैसे धरती डोले,

       कैसे डौले आसमान ?

कैसे-कैसे लंका डोले,

       कैसे जिये इंसान ?

जवाब नहीं मस्ती का ।

 

  डॉ. विवेकी राय

विवेकी राय मार्ग, गाजीपुर

उत्तरप्रदेश

 

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