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ललित निबंध |
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ललित निबंध |
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बस में चांद ब्रदीश सुखदेवे
बस में चांद आपका अपना साथी हो सकता है जैसा कि मेरा हो गया, किन्तु वो आपके “बस” में रहे, यह आपने अपने ऊपर निर्भर करता है कि आप उसका कितना ध्यान रखते हैं । हाँ मैं तो बस में चाँद का विशेष ध्यान रखता हूँ और इसीलिए “खास तौर से बैठते समय .....ध्यान रखता हूँ।” कोशिश मेरी होती है कि खिड़की के किनारे में बैठकर बाहर की चांद और बस की चांद के नज़ारे का आनंद लिया जाये। ऐसा हो सकता है मगर अक्सर कभी कभी ही ये जबर्दस्त अवसर प्राप्त होता है।” आज कल 36 मिनट में बस विभिन्न ट्रेवल एजेंसिंयों की उपलब्ध हो जाती है पर यह आनंद का अवसर आपको अक्सर समय, काल की परिस्थितियों पर नज़र रखते हुए ही मिलेगा। कभी आपके सहीं सीट न मिले । कभी आप दिन में यात्रा कर लें तो रात के चांद का आनंद कैसे ले सकेंगे, कभी रात में यात्रा करें और पक्ष आपके पक्ष में नहीं हुआ । जैसे शुक्ल न होकर कृष्णपक्ष में आप चांद का नज़ारा लेना चाहें तो भाई बात ज़रा मुश्किन होगी।
मैं तो बस ये बताना चाहता हूँ कि भाई मैं अधंविश्वासी नहीं हूँ फिर भी ऐसे मामलों में कह देता हूँ कि सबका अपना-अपना नसीब होता है। चाँद दर्शन के मुद्दे पर नसीब एक शुद्ध भारतीय होने के नाते बड़ी मतलब की चीज होती है। आप कैलेंडर्स में देख लें चंद्रदर्शन मूहूर्त भी लिखा रहता है, सारा क्रियाकर्म, कर्मकांड संस्कार इस चाँद के लुका-छूपी खेला-खेली पर निर्भर करता है । कभी कोई नदी में स्नानदान की तिथि तय करना है, यात्रा में शुभ-अशुभ पता देखना है, सब कुछ चाँद पर टिका है और हमारे देश में तो खुशियाँ, पर्व उत्सव त्यौहार भी चाँद के पृथ्वी पर घूमने के कारण ही तय होते हैं। मैं तो केवल छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में घूमते रहता हूँ और अचानक रायपुर से जगदलपुर, जगदलपुर से रायुपर और कभी-कभी कोरिया, सरगुजा, डोंगरगढ़, रायपुर कोरबा की यात्रा कर लिया करता हूँ । हाँ, एक बात और बाकी जगह तो रेल में भी जा सकते हैं पर कोटा, बीजापुर, जगदलपुर के लिए अभी यह सुविधा इन्तजार के असीम सागर में मूँगा-मोती ढूंढ़ कर लाने जैसा है, इसीलिए मजबूरी में ही सही अभी तो बस, मुझे बस में ही चाँद की यात्रा का लुत्फ़ उठाना पड़ता है ।
कभी चाँद मिले न मिले, दिखे न दिखे परन्तु अब जबकि मैं यह लेख लिख रहा हूँ मुझे चाँद न केवल मिला अपितु दिखा भी । मैंने खिड़की के काँच के पास उसे छुआ, महसूस किया । रात्रि में केशकाल की घाटी के उपर चाँद, सबकी नज़र बचाते-बचाते वह आ गया है मेरी खिड़की के काँच के पास । उसकी छवि कितनी प्यारी लगती है, गोल सा चाँद की गोलाई । गोल मुँह वाला मैं । गोल-गोल पृथ्वी । गोल घूमता चाँद, गोल-गोल घूमती पृथ्वी और बगल में बैठी गोल-गोल बात करती युवती । मैंने सोंचा - अमां यार, पूरा भूगोल, पूरा विज्ञान, नागार्जून का शून्य का सिद्धांत, शून्यता की अनुभूतियाँ, शांति, साधना पूरा दर्शन आज जैसे स्मृति पर केन्द्रित हो गया है। मैं टिक गया हूँ गोल-गोल चेहरे पर । लाल-लाल गोल बिंदी, जैसे सौन्दर्य में चार चांद लगता है, वैसे ही चाँद पर धब्बा है। मुझपर भी धब्बा लग जाता है, क्योंकि मैं भी अपने माथे पर कुछ नहीं लगाना चाहता । कुछ लोग बड़े संगीन-गोल आड़े तिरछे सौंदर्यवर्धक, शांति वर्धक तत्व लगा लेते हैं पर मैं पूजा के बाद भी अगरबत्ती के राख को ही कभी-कभी लगा लेता हूँ जो कि जल्दी ही मेरे चेहरे के रंग में विलीन हो जाता है और ऐसा नहीं लगता कि मैंने कुछ विशेष लगाया हैं इसी कारण मेरे गोल चेहरे पर भी कभी धब्बा लग जाया करता है, चाहे वो अपनों के द्वारा लगाया गया हो, या परायों के द्वारा । पर रही बात ये धब्बे ही मेरी सुन्दरता बढ़ाते हैं । जैसे गोरे-गोरे गोल चेहरे वाली महिला के माथे की गोल-गोल बिंदी गोल-गोल चँदा के छवि की भांति बसंत की रात्रि में बस के पास खिड़की की काँच में आते जाते हैं । धीरे उगता चाँद पहाड़ी घाटियों से ऊपर पेड़ों के पार । खिड़की तक मेरे सीट के पास आने में कितने रोकने वाले हैं उसको । पहाड़, बादल, पेड़, बड़े महल, घरों की दीवारें सब के सब रोकते हैं चांद को मेरे पास तक आने में । क्योंकि मैं बस में बैठा हूँ और बस चल रही है, कांकेर से केशकाल घाटी को पार करके आगे बढ़ती जाती है और चाँद बीच-बीच में झपकी ले लेती है, मुझे नहीं देखती और मैं चाँद को नहीं देख पाता । कभी-कभी भयंकर टुकडियाँ भी रोक लेता है बिचारे चांद को मुझ तक आने से पहले ही। और फिर मैं भी तो ठहरा यात्री बस का । अरे कभी जहाज में बैठा नहीं । दूर से ही जहाज जब हमारे गाँव के आसमान के ऊपर से उड़ता तो तब सब काम-धाम, स्कूल छोड़कर जहाज को देखने वाले हम लोग तो बस, बस के लायक ही तो हैं, और चाँद के नजदीक तो जहाज में जाने से भले ही पहुँचा जा सकता है ।
मैंने पढ़ा था कि नील आर्मस्ट्राग और एडविन आल्ड्रीन ने चाँद पर सबसे पहले पाँव रखे थे । मैं तो बस में अपना माथा, सिर रखना चाहता हूँ उसमें भी चाँद के नखरे । उसके लोग, चाहने वाले लोग और मैं कहाँ केशकाल की घाटी में जन्मा एकदम बस्तरिहा आदमी । मैं तो चाँद को केवल आँख बंद करके ही देख सकता हूँ। या फिर खिड़की के काँच में उसकी झिलमिलाती छवि से परम सन्तुष्टि, चरम आनंद की प्राप्ति कर सकता हूँ । चाँद कितना साथ देता है अगर कोई न भी हो आपके पास तो भी खिड़की के चाँद का दर्शन । चाँद का चिंतन का मनन । चाँद का अध्य्यन। चाँद का लेखन और चांद का पठन-पाठन आपको भी अच्छा लगता होगा । आपको लगे चाहे न लगे, भाई मुझे तो अच्छा लगता है जब कभी भी बस में यात्रा करता हूँ चाँद की याद जरूर करते हुए चाँद दर्शन के सुअवसर को खोना नहीं चाहता । सफ़र में ठंडी हवाओं के झोंकों से सोना नहीं चाहता । बस देखते रहना चाहता हूँ - शांत भाव से आम्रपाली को, जैसे रावण ने देखा था सीता को, जैसे कृष्ण ने देखा था गोपियों को मैं, भी शीतल रात्रि में बस से गुजरते हुए उसी पावन दृष्टि से चाँद को देखता हूँ जो कभी-कभी खिड़की के काँच से अपनी छवि दिखा कर मेरे जीवन के प्रति मुझ सतत जागरूक रहने के लिए अभिप्रेरित करता है।
मेरी इस जनम की लालसा गोल-गोल है । चाँद में जाने की, उसे पाने की, कुछ दिन उसके साथ रह जाने की । लगता है बस के दिन उसके साथ ही ठहर जाएगी, फिर नई दुनिया में पूर्नजन्म होगा मेरा “फिर नया जन्म नया जीवन तब तक हो सके चांद में जीवन प्रारंभ हो जायेगा।” वहीं पर पुनः जन्म ले सकूँगा । अभी तो उसके बाप के समान पृथ्वी पर बने सड़कों पर जो कि काफी उटपटाँग ढंग से कहीं-कहीं पर बने हैं । उस पर चलने वाली बस में बैठकर ही चाँद का नजारा चांद का चिंतन, चांद का दर्शन कर सकता हूँ। कभी डर लगता है तो खिड़की बंद करलेता हूँ। पेड़ों के पत्ते और शाखाओं के मुझसे टकराने का खतरा हो सकता है चलती हुई बस में । क्योंकि मैं जानता हूँ कि ये ही वो पेड़ हैं जो रोकते हैं चाँद दर्शन से मुझको और जब ये पेड़ दूर होते जाते महसूस होते हैं मैं झटपट खिड़की खोल लेता हूँ। काँच से फिर आती-जाती गोल चाँद की प्यारी प्यारी छवि । रात्रि बढ़ती जाती और बस चलता जाता । चांद मेरे साथ साथ रायुपर से जगदलपुर तक घर आते तक साथ रहता । घर पहुँच कर मैं दरवाजा खटखटाता । सुबह हो जाती और मेरा घर आया हुआ बस का चाँद चला जाता । सुबह के होते ही उसकी बस बात उसकी याद बस बनी रह जाती । कितना प्यारा होता है चाँद । उस प्यारे चांद के साथ और देर तक रहने का मन होता है पर मैं तो बस में यात्रा करता हूँ न ।
काश ! कभी राकेट में जाता ? राकेट में यात्रा करके अवश्य ही चाँद को छूने, साथ रहने और कुछ दिन तक साथ-साथ जीने का सपना पूर्ण हो सकता है पर बस की यात्रा से तो दूर-दर्शन या स्वाप्निल चिंतन ही खिड़की के पास से संभव है। न जाने कितने बसों में कितने-कितने लोगों के साथ मेरा इक नन्हा चाँद यात्रा करता है । कितने लोग देखते हैं बस के साथ-साथ चलते हुए चांद को । कभी सिर उठाकर, सिर घूमाकर, आगे बढ़कर, आँखे खोल कर, आँखों को बंद कर चांद का दर्शन समस्त प्रकार के अनेकार्थी रुप में चांद का आनंद लिया जा सरता है। मैदानों में साथ-साथ दौंड़ता, पहाड़ियों, झाड़ियों के झुरमुट में छूपते हुए चाँद का नजारा बस में बैठे-बैठे लिया जा सकता है। बस धरती में, धरती की सड़कों में चलती बस में बैठा हुआ मैं छत्तीसगढ म.प्र. उड़ीसा आँध्रा, महाराष्ट्र की यात्रा करते रहता हूँ । यात्री बदलते जाते, बस बदलते जाते, पर चाँद सर्वत्र समभाव वसुधैव कुटुम्बकम के भाव से साथ ही साथ चलती जाती है ।
कभी कभी सोंचता हूँ जापान अमेरिका, यूरोप में चाद कैसी दिखता होगा ? या कभी मंगल ग्रह का भी कोई चांद होगा शनि तो खुद हो सुंदर दिखता है उसके पास उसका उपग्रह चाँद जैसा न भी हो तो कोई बात नहीं, मौसम तो हमारे धरती के बदलते हैं । वो भी घूमने के कारण चाँद भी घूमता, धरती भी घूमती । बस भी घूमता और मैं भी घूम जाता । घूमते रहता बसों में प्रसन्नता के साथ क्योंकि मैं जानता हूँ कि मेरे सिर के चाँद को कोई आँच नहीं आएगा, और सिर के ऊपर का मेरा चाँदनी सदियों से की पीढ़ियों को बस से ऊपर की यात्रा करते हुए बस चुप-चाप देखते रहता है । शांति के साथ मुस्कुराते हुए आसमान में आजादी के साथ कभी घूमते, बढ़ते बिना कुछ कहे - वाह रे चाँद बस का।
सहायक संचालक, आयुक्त कार्यालय, आदिम जाति कल्याण विभाग छत्तीसगढ़, रायपुर
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