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प्रवासी कविता -
अमेरिका से उमेश ताम्बी
मर्म ऒर वेदना
एक
अश्रू बह जो
निकला,
जब
ह्र्दय का हाल सून !
अश्रूओं कि धार से तु वेदना का सार बुन !!
वेदना
किस बात की..किस बात से है यह घुटन
?
पुछ्ने
पर कह उठा ..विचलीत सा
रो रो
कर ये मन !!
गगन
मे है तारे जितने,
उतनी
है मन मे भावना
!
काल
चक्र और कुचक्र से,
खो रही
संवेदना !!
गर्व
और अभिमान से
जो
विवश है दिशाहीन !
नेत्र
के होते हुये
भी, बन
गये है द्ष्टीहीन
!!
था
सुना हमने,
ना
रिश्ते पनपते खलिहान मे !
किन्तु संबन्धो का क्रम
है,
बीज,
जल और
खाद्यान मे !!
धूप
के पड्ते ही,
मुरझा
गये सब पेड-पौधे !
अब
जरुरत
है,
उन्ही
को पालने और सिंचने की !!
नाप
पाओगे आंजूली भर के सागर
को
कभी ?
घांव
ऐसे है,
कि
पिडा भांप ना सकते सभी !
रितुऐं बदलती रही,
कितने
है
गुजरें कांरवां !
फुल
तो झड हि चुके,
सुखी
पडी सब साखीयां !!
सीखने
को है
बहुत जीवन के मार्मिक दौर मे !
सीख
वो सकते नहिं,
जो
भ्रमीत है अबतक शोर मे !!
र्दुदशा तो देखीये ! द्शक बना ये कलयुग समय !
प्रेम
की
भाषा ना समझे पा नहि सकते विजय !!
नम्रता का भाव है सबसे बडा संसार मे
!
जैसे
लालिमा रवि की खिलती गगन के पार मे !!
युं तो
हमने
पायी
है प्रत्येक पथ पर प्रेम शिक्षा !
शांन्ति कि ही राह में
मन दे रहा अग्नी
परिक्षा.......
उमेश ताम्बी
फिलाडेल्फिआ (यु.एस.ए)
  
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संपादकः
जयप्रकाश मानस
संपादक मंडलः
डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा,
डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति
तकनीकः
प्रशांत रथ |