रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 12, मई, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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कविता

सृजनगाथा का एक साल

सहभागी लेखकों को बधाई

कविता

 

आँगन के भीतर बाहर

आँगन के भीतर वसंत है

आंगन के बाहर पतझड आ बैठा है

मैं नहीं चाहती कि देखें पतझड

मेरे बच्चे या कि पूछें सवाल

झडे पत्तों की ढेरी को देख

जिसे बनाया है अभी अभी किसी

सड्क बुहारती मजदूरिन ने

मैं नहीं चाहती कि उठे मेरे भीतर दर्द

और मैं उठा लूं लपककर उसका

दुधमुंहा बालक तपती जमीन से

मैं नहीं चाहती देखना उस ओर के पतझड को

मेरे लिए मेरा आंगन ही मेरा सत्य़ है

पर क्या करूंगी उन सवालों का

उठे हैं जो मेरे नन्हों के भीतर

 हैरान हैं वे एकसाथ दो रितुएं देख

अभी वे नहीं जानते कि सत्य क्या है

आंगन के भीतर का वसंत या कि

बाहर पसरा पडा पतझड

नीलिमा चौहान

 

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