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कविता |
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तलाश एक कृष्ण की लगता है महाभारत फिर होगा क्योंकि व्यवस्था के घृतराष्ट्रो को देख युग ने एबी गाँधारी बन अपनी आँखों पर बान्ध ली है पट्टी और न जाने कितने दूर्योधन है जिनका साथ देने को विवश हैं उनके ऋणी कर्ण आज दूःशासनों के चँगुल में फंसी हर दौपदी को अपने रथ पर सारथी की रहा देख रहे हर अर्जुन को अपनी अपनी प्रतिज्ञा में बंधे हर भीष्म को और कर्म भूमि पर धर्म की रक्षा कर रहे हर पाँडव को तलाश है तो बस केवल एक कृष्ण की।
कब लौटेगे बनवासी ? महाभारत टाला लाख यत्न से पर फिर भीतर हुई रामायण जब आशा कैकयी पर सिर चढ़ कर बोला मंथरा इच्छा का जादू फिर ऐसा खेल हुआ कि तड़पते हीरह गए दशरथ विवेक बुद्धि कौशल्य और इसी बीच सोच ने ले लिया बनवास तब मन लक्ष्मण भी साथ हो लिया और संग संग हो ली अनुभूति सीता मगर ये कैसा हुआ बनवास जिसकी निश्चिचत नहीं कोई भी सीमा पीड़ा के इस कोलाहल में दशरथ विवेक ने तो दे दिए प्राण और मरणासन्न हैं शेष सभी है द्वार पर चिपकी सभी की आँखे रूकी हुई है सब की सांसे कब जायेगी इनकी गहरी उदासी कब लौटेगी वह बनवासी ?
27. मजीठिया एन्कलेव फेज़-11, 2 नं0 फाटक रोड, पटियाला (पंजाब)
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