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कविता |
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दो प्रयोगवादी कविताएः अज्ञेय
उलाहना नहीं, नहीं, नहीं !
मैंने तुम्हें आँखों की ओट किया पर क्या भुलाने को ? मैंने अपने दर्द को सहलाया पर क्या उसे सुलाने को ?
मेरा हर मर्माहत उलाहना साक्षी हुआ कि मैंने अंत तक तुम्हें पुकारा !
ओ मेरे प्यार ! मैंने तुम्हें बार-बार, बार-बार असीसा तो यों नहीं कि मैने बिछोह को कभी भी स्वीकारा ।
नहीं, नहीं नहीं !
मन बहुत सोचता है मन बहुत सोचता है कि उदास न हो पर उदासी के बिना रहा कैसे जाय ?
शहर के दूर के तनाव-दबाव कोई सह भी ले, पर यह अपने ही रचे एकांत का दबाब सहा कैसे जाय !
नील आकाश, तैरते-से मेघ के टुकड़े, खुली घासों में दौड़ती मेघ-छायाएँ, पहाड़ी नदीः पारदर्श पानी, धूप-धुले तल के रंगारग पत्थर, सब देख बहुत गहरे कहीं जो उठे, वह कहूँ भी तो सुनने को कोई पास न हो - - इसी पर जो जी में उठे वह कहा कैसे जाय !
मन बहुत सोचता है कि उदास न हो पर उदासी के बिना रहा कैसे जाय ?
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