रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 12, मई, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलविशेषांकसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

कविता

सृजनगाथा का एक साल

सहभागी लेखकों को बधाई

कविता

 

दो प्रयोगवादी कविताएः अज्ञेय

 

उलाहना

नहीं, नहीं, नहीं !

 

मैंने तुम्हें आँखों की ओट किया

पर क्या भुलाने को ?

मैंने अपने दर्द को सहलाया

पर क्या उसे सुलाने को ?

 

मेरा हर मर्माहत उलाहना

साक्षी हुआ कि मैंने अंत तक तुम्हें पुकारा !

 

ओ मेरे प्यार ! मैंने तुम्हें बार-बार, बार-बार असीसा

तो यों नहीं कि मैने बिछोह को कभी भी स्वीकारा ।

 

नहीं, नहीं नहीं !

 

मन बहुत सोचता है

मन बहुत सोचता है कि उदास न हो

पर उदासी के बिना रहा कैसे जाय ?

 

शहर के दूर के तनाव-दबाव कोई सह भी ले,

पर यह अपने ही रचे एकांत का दबाब सहा कैसे जाय !

 

नील आकाश, तैरते-से मेघ के टुकड़े,

खुली घासों में दौड़ती मेघ-छायाएँ,

पहाड़ी नदीः पारदर्श पानी,

धूप-धुले तल के रंगारग पत्थर,

सब देख बहुत गहरे कहीं जो उठे,

वह कहूँ भी तो सुनने को कोई पास न हो - -

इसी पर जो जी में उठे वह कहा कैसे जाय !

 

मन बहुत सोचता है कि उदास न हो

पर उदासी के बिना रहा कैसे जाय ?

 

 

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलविशेषांकसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

 

Google
WWW http://www.srijangatha.com