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भाषांतर |
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भाषांतर |
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बंद कमरा अँधेरे बंद कमरे में बहुत दिन हुए यंत्रणा झेलकर भी बहुत दिन रुके रहे कोई आकर चुनौती भी दे गया
लेकिन हमें पता ही नहीं चला और फिर बाहर से किसी ने आकर दरवाज़े खटखटाए
लेकिन हम खिड़कियाँ भी खोले बिना बैठे रहे । मूलः सिद्धार्थ राई अनुवादः पद्म क्षेत्री
प्यार के पंख इनकार नहीं मुझे ये पंख तुम्हारे हैं कहा था, जब माँगोगे दे दूँगा इन्हें तुझे
इनकार नहीं करता मेरे मित्र, लेकिन अभी-अभी, थोड़ा-सा पंख फैला कर फड़फड़ाता उड़ने-फिरने लगा हूँ मैं यह तो चिरकाल का सपना है मेरा अभी हठ मत पकड़ो इसे छीन लेने का
शिकायत भरी नज़रों से मत देखना मेरी तरफ़ प्यार के पंखों के बारे में सोच-विचार कर देखो न
उस के असीम विस्तार को उस की स्निग्धता को उस की कोमलता को उस की मादकता भरी मस्ती को
हाँ - अब उतरने का समय आ गया है मेरी तरफ़ कड़ी नज़र से मत देखना दे दूँगा, ज़रा सब्र करना मानता हूँ ये पंख तुम्हारे हैं दे दूँगा - मुझे इनकार नहीं है मूलः बसवय्या अनुवादः सरस्वती रामनाथ
अब नहीं उगते कैक्टस में हाथ बचपन में मना करती थी कहा करती थी माँ - 'मत मार बहन को पाप लगेगा रे, पाप देख, वह देख वो काँटों वाला कैक्टस उगा करत हैं उस में पापी हाथ' बच्चे डरते थे तब लेकिन अब? अब तो डरता नहीं कोई भी हाँ, उगते थे कभी, लेकिन अब नहीं उगते कैक्टस में हाथ मूलः जुगल परिहार अनुवादः नीरज दइया
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