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बचपन |
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बचपन |
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मैं ना बोली, मैना बोली मन्जु महिमा मैं चुप बैठी थी, पेड़ के नीचे, मैं ना बोली, मैना बोली। मैं चौंकी, देखा ऊपर, मैना बैठी कहती पुकर-पुकर, ‘देखो कैसा बरसा पानी?' मेहनत से जो नीड़ बना था, कैसे उस पर फिर गया पानी। नहीं रही हूँ अब मैं रानी।’ मैं बोली, ‘क्यों हो घबराती? मेहनत से जब जुट जाओगी, सुन्दर नीड़ बना पाओगी, फिर से रानी बन जाओगी।’ हाँ॓,यह तो सच कहा तुमने, जो डरते नहीं मेहनत से, वे घबराते नहीं मुसीबत से।’ मैं ना बोली, मैना बोली, कहकर उड़ गई फ़ुर्र से।
संवेदन, ८, अंजन अपार्टमेंट, भाईकाका नगर,थलतेज, अहमदाबाद-५९
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