भरना
भरना
यानी किसी खाली स्थान या वस्तु को भरना, खाली बर्तन को
भरना, ड्रम भरना, गड्ढा भरना आदि। यह सब तो सरल है लेकिन
यदि कोई इस संसार से प#याण करता है तो उसके खाली स्थान को
भरना सर्वथा असंभव ही होता है। लोग
आंहे भरकर रह जाते हैं।
आंहें भी कई प्रकार की होती हैं। एक आंहें
वह हैं जो शोक के समय भरी जाती हैं और दूसरी आहें वह वह हैं जो प्रेमी-प्रेमिका
वियोग की दशा में भरते हैं और तीसरी आहें वह हैं जो कोई
हानि या दुर्घटना होने पर कोई व्यक्ति भरता है।
ईष्यालु व्यक्ति भी आहें भरते हैं।
दुख में आदमी आहें भरता है और उल्लास के समय चौकड़ी भरता
है लेकिन जब गृहस्थी का बोझ सिर पर आता है तो अच्छे-अच्छे चौकड़ी भरना भूल जाते हैं तभी तो
कहावत चल पड़ी- ‘भूल
गये दूध भात, भूल गये चौकड़ी। तीन चीज़ याद रही नोन तेल
लकड़ी।’
कुआ, तालाब, खेत, बर्तन तो पानी या सामान से भरे जा सकते
हैं पर मन केवल मनचाही वस्तु से ही भरता है और किसी से
नहीं। वह बार-बार यही कहता है-अभी तो मन भरा नहीं। यह मन
बड़ा विचित्र है। जब मन भर जाता है तब किसी और चीज की
इच्छा नहीं रहती।
घाव तो कष्टदायी होता ही है। कई बार घाव
बड़ी मुश्किल से भरता है। शरीर का घाव तो दवा से भर जाता
है लेकिन मन के घाव की कोई दवा नहीं होती । उसकी पीड़ा अलग
प्रकार की होती है। वह शरीर के रोम-रोम में कसकती है। तभी
तो पीड़ित कवि ने लिखा
‘एक
जागा होय तो औषधि लगाऊँ
वीर, रोम-रोम पीर कहाँ औषधि
लगाइये ।’
मन भरना अर्थात संतोष होना, इच्छा की पूर्ति होना। पानी
भरने का आशय किसी बर्तन या स्थान को पानी से भरना या कुयें
या तालाब से पानी खींच कर लाना मात्र नहीं है
। पानी कई
प्रकार से भरा जाता है - कभी दबाव में और कभी तुलना में।
रावण के राज्य में अच्छे-अच्छों को पानी भरना पड़ा था। कोई
प्रतिकार नहीं कर सकता था। रानी पद्मिनी के सामने अच्छी से
अच्छी सुन्दर स्त्रियाँ पानी भरती थीं । अर्थात उनकी
बराबरी नहीं कर सकती थी।
एक में गुलामी है और दूसरे में
बराबरी न करने की बात ।
पेट सारी समस्याओं की जड़ है इसलिये पेट भरना बहुत
जरूरी है। मन भरने से पेट नहीं भरता । खाली पेट भजन भी नहीं
करता । बातों और
वायदों से भी पेट नहीं भरा जा सकता । पेट
भरने के लिए आदमी को न जाने क्या-क्या कर्म करने पड़ते
हैं। किसी कारुणिक दृश्य को देखकर दिल भर जाता है। दुख,
वात्सल्य, प्रेम और वियोग आदि की दशामें आँखें भी भर आई।
आँखें भीतर का दर्पण हैं। रहीम ने लिखा-‘रहिमन
अंसुवा नैन ढरि जिय दुख प्रगट करोई।’
ज्यादा पैदल चलने से थकान के कारण पाँव भी भरते हैं, तेज
चलने से श्वास भरती है। चुनाव होने पर पर्चा भरा जाता है।
पढ़ाई के लिए प्रवेश लेने के समय, नौकरी आदि के लिये
जानकारी देने के लिये फार्म भरे जाते हैं। पर्चा भरना और
कर्जा भरना एक ही नहीं है। पर्चा में जानकारी दी जाती है।
पर्चा कोई खाली बर्तन नहीं है।
इसी प्रकार कर्जा भरने का अर्थ है चुकाना । जो कर्ज
लिया था उसे कर्ज देने
वाले को चुकाना। कभी-कभी किसी आदमी को पूजा-पाठ के समय
देवस्थान में भाव भरने लगते हैं। वह उछलने-कूदने-अभुवाने
लगता है। इसे भाव भरना कहा जाता है। कोई देवी-देवता का भाव
उसके शरीर में आ जाता है
। वैसे कविताओं में भी इसका प्रयोग
किया जाता है। लोग कहते हैं इस कविता में कवि ने अच्छे भाव
भरे हैं।
कान भरना, घर भरना, रंग भरना, जुर्माना भरना आदि
मुहावरे भी ‘भरना’
से जुड़े हैं । कान भरने का आशय किसी को किसी के विरुद्ध
बातें बतलाना, बुराई कराना।
मंथरा ने कैकेयी के कान न भरे
होते तो शायद राम को वनवास न जाना पड़ता । किसी के विरुद्ध
उल्टी-सीधी बातें बतलाकर उत्तेजित करना । घर भरना का मतलब
है किसी को मूर्ख बनाकर लाभ उठाना। शकुनी ने दुर्योधन को
मूर्ख बनाकर अपना घर भर लिया लेकिन रंग भरने की दुनिया अलग
है। रंग रेखाओं वाली डिजाइनो में भरा जाता है। बच्चों से
इसी प्रकार अभ्यास कराया जाता हैं । रंग भरने में
बुद्धि, विवेक, ज्ञान, कल्पना सभी की जरूरत होती है।
पिचकारी में भी रंग भरा जाता है लेकिन कभी-कभी आदमियों में
भी रंग भरा जाता है। लोग दो विरोधियों को एक-दूसरे के
विरुद्ध बातें बताकर उत्तेजित करते हैं इसे भी रंग भरना
कहा जाता है। उसने ऐसा रंग भरा कि आखिर लड़ाई हो ही गई
। जुर्माना किसी अपराध का दंड होता है जो न्यायालय या पंचों
द्वारा किया जाता है। इस जुर्माना को अदा करना ही जुर्माना
भरना या दंड भरना कहा जाता है। नशैड़ी लोग चिलम या
हुक्का भरते हैं। चिलम भरने में भी कौशल की आवश्यकता होती
है। अब चिलम का चलन कम
हो गया है। पहले बड़े लोग चिलम या हुक्का भरने के लिये
नौकर रखते थे। गड्ढा भरना का आशय
नुकसान का गड्ढा जल्दी भरना मुश्किल है। इसी प्रकार पेट को
इंगित करके लोग कहते हैं इस गड्ढे को भरने के लिये कुछ न
कुछ उद्यम तो करना ही पडे़गा। भरना से ही
भरभराना जैसे शब्द बने हैं पर वहाँ भी अंतर हो जाता है -
बस यो गाड़ी के स्टार्ट होने
पर जो आवाज़ होती है उसे भी भर्राना या भरभराना कहते हैं और
कोई दीवाल अचानक गिर जाये तो उसे भी भरभराना कहते हैं ।
यहाँ ध्वनि प्रमुख है। जी भरना और तालाब भरना एक कही नहीं
है। हमें इन बातों का ध्यान रखना होगा।
oडॉ.गंगाप्रसाद
बरसैया
एमआईजी -
12, चौबे कॉलोनी
छतरपुर,
मध्यप्रदेश
