रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 10, मार्च, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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व्यक्तित्व

बहुत  कठिन है

(व्यंग्यकार गिरीश पंकज के पचास वसंत पर विशेष)

 

        दि आप अपने को भीड़ में भी अकेला अनुभव कर रहे हों, यदि आपको अवसाद ने घेर लिया हो, यदि आपको' ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है' जैसा निरर्थकता - बोध हो रहा हो, यदि आप अपने रिश्तेदारों और तथाकथित मित्रों के छल-छंद से उक्ता गए हों और आपको किसी पर विश्वास नहीं रहा हो और यदि आप असीम अत्मीयता की अनुभूति करना चाहते हों तो आपकी इन सारी अपेक्षाओं पर खरा उतरने वाला तथा आपके अभाव को भरने वाला एक जीव हो सकता है जिसका नाम गिरीश पंकज है । (ये केवल मेरे सद्विचार नहीं हैं अपितु मेरे जैसे अनेक गिरीशप्रेमियों के विचार हैं । )

 

        मैं साहित्य का इन अर्थों में अत्यधिक ही आभारी हूँ कि उसने प्रिय  सम्माननीय शुभचिंतकों का कारवां मेरे साथ कर दिया है । इस कारवां में गिरीश जैसे मित्र हैं जिनके बिना इस कारवां के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लग सकता है । गिरीश इस सादगी के साथ आपके जीवन में रहते हैं कि आपको कभी भी कुछ लदने के अहसास नहीं होता है । गिरीश आपके पास नहीं हैं पर जब आपको आवश्यकता है, वह सदा आपके पास है । किसी अनुज से आप जिन मूल्यों की अपेक्षा कर सकते हैं वे लगभग सभी गिरीश में मिल जाएंगे । वह अकेले में, कोई देख तो नहीं रहा, कि शैली में रस्मी पैर छुआवन की क्रिया करने वाला जीव नहीं है ।

 

        गिरीश से मेरी पहली मुलाकात कब हुई याद नहीं, क्योंकि उसकी एंट्री धमाकेदार नहीं थी । वह सहज ही मेरे जीवन में आया और आज भी उसी सहजता को वैसे ही बनाए रखा है जैसे अपनी काया को । बरसों पहले के गिरीश और आज के गिरीश काया-परिवर्तन के किसी अंतर ने सोचने को मुझे कभी विवश नहीं किया क्योंकि गिरीश ने कभी इसका सुअवसर ही नहीं दिया । वह जब भी मिला एक भावात्मक सोच के साथ मिला । या यह भी कह सकते हैं कि मेरी दृष्टि में ही कुछ गड़बड़ है जो व्यक्ति की आंतरिक सुंदरता को ही देखकर प्रसन्न हो जाती है और जहाँ कहीं गड़बड़ लगती है, उसे भी अभिव्यक्त कर संतुष्ट होती है कि सौंदर्य में से असौंदर्य को चिह्नित किया । उसके बाल, उसके कपड़े,उसकी अदा, उसकी आँखें आदि, किसी भी तरफ तो मेरी दृष्टि गई ही नहीं। मैंनें उसे कभी ,'हाय यंग मैंन' या फिर आज तो तुम डैशिंग लग रहे हो जैसे अलंकारों से अलंकृत नहीं किया । और न ही अनावश्यक तो क्या आवश्यक प्रशंसा के पुलों का निर्माण किया हो। साहित्य के जिस संसार में अपने मुँह मियां मिटठुओं का बोलबाला हो और आपनी प्रशंसा सुनने के लिए हजारों खर्च कर गोष्ठियां आयोजित की जाती हों, सही सलाह को तथाकथित कटु आलोचना मान कर्ता से जन्मभर की दुश्मनी पाल ली जाती हो, अपने-अपने गढ़ों का निर्माण कर उसमें प्रवेश करने वालों को धृतराष्ट्र बना दिया जाता हो तथा साहित्य के जिस संसार में न्यायालीय, संसदीय एवं मंदिरीय सत्य बोला जाता हो - ऐसे संसार में अपनी हर गलत-सही आलोचना को अपनी मधुर मुस्कान से झेल जाने वाला गिरीश ही आपके साथ और अधिक आत्मीय हो सकता है । बहुत कठिन है आज की दुनिया में बिना किसी अपेक्षा के संबंधों को लम्बा निभाना और निरंतर उन्हें प्रगाढ़ करते चले जाना ।

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        वैसे तो गिरीश से जुड़े अनेक प्रसंग मेरी वृद्ध होती स्मृति में युवा हैं पर गिरीश की त्रिनिदाद यात्रा का प्रसंग बेहद ही युवा है । इस प्रसंग का गिरीश के जीवन में भी विशेष महत्व है । वैसे भी जब आपके पास अंतरराष्ट्रीय किस्म के प्रसंग हों तो राष्ट्रीय किस्म के प्रसंगों का वर्णन कर क्यों अपना अवमूल्यन किया जाए । आजकल तो वैसे भी प्रवासी साहित्य और हिंदी के अंतरराष्ट्रीय पर चिंता करने का समय है । अब हिंदी ऐसी गरीब नहीं रही कि आपको बस या दूसरे दर्जे की रेल यात्र करवाए, अब तो वे विदेशों की थोक में यात्राएं करवाने लगी है । त्रिनिदाद यात्रा से ही गिरीश 'अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकारों की श्रेणी में आ गया है । वे अंतरराष्टीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार इसलिए नहीं हुआ है कि अचानक श्रेष्ठ साहित्य की उसने रचना कर दी है या फिर फ्रेंच, जर्मन आदि भाषाओं में अनुदित होकर उसका साहित्य करोड़ों पाठकों के पास पहुंच गया है अपितु इसलिए कि वह  त्रिनिदाद, कैनेडा,यू0के0 और मारिशस के प्रवासी साहित्यकारों से परिचित हो गया है और वे भी उसे जानने लग गए हैं । उसने त्रानिदाद,यू0के0 और मारिशस देशों की यात्राएं कर ली हैं और कुछ की करने वाला है । ऐसी यात्राएं कई बार आपका दिमाग खराब करने और आपके अह्म का अनावश्यक विस्तार करने के लिए पर्याप्त होती हैं। यही कारण है कि जब मैं उसे अपने स्थानीय लक्ष्य से भटकता पाता हूँ तो उसे 'अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार' कहकर संबोधित करने लगता हूँ

 

           बात सन् 2002 की गर्मियों की है जब भारत में जितनी गर्मी थी त्रिनिदाद में भी उतनी ही गर्मी थी और इस गर्मी के बीच त्रिनिदाद में गर्मागर्म अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन करवाया जा रहा था । मैंने सभी मित्रों को और साहित्य के अपने परिचितों को निमंत्रण भेजे थे । इनमें गिरीश पंकज को भी एक निमंत्रण गया था और गिरीश को मैंनें यह सोचकर निमंत्राण भेजा था  कि वह आ तो नहीं पाएगा क्योंकि हम आधा किराया भी देने की स्थिति में नहीं थे, पर उसे सूचना मिल जाएगी और वह अपनी पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' में इस सूचना को प्रकाशित कर देगा । यह एक औपचारिक निमंत्रण मात्र था पर गिरीश ने इस बड़ी गंभीरता से लिया और जुट गया । उसके जुटने का मुझे आभास तो होता रहा पर इस  सबके बावजूद यह कभी नहीं लगा  कि वह त्रिनिदाद आ पाएगा, क्योकि मैं जानता था  कि वह जुगाड़ नहीं जानता है और हिंदी की 'सेवा' के लिए की जाने वाली विश्व यात्राओं के संदर्भ में अभी उसके दूध के दांत भी नहीं टूटे हैं ।

 

        17 मई की शाम कार्यक्रम के उद्घाट्न के लिए हम प्रधानमंत्री पैट्रिक मैनिंग की प्रतीक्षा कर रहे थे । मेरा सारा ध्यान मुख्य आयोजक होने के नाते मुख्य अतिथि पर केंद्रित था । विदेशों से जिन प्रतिनिधियों का आना था, वे सब आ चुके थे और वेस्ट इंडीज विश्वविद्यालय के सभागार में  अपनी-अपनी  कुर्सियों पर विराजमान थे । अचानक मैंनें देखा, एक टैक्सी उतरी गहरे रंग का कुर्ता और पेंट पहने गिरीश पंकज टैक्सी से उतर रहे हैं । सामान के नाम पर उनके हाथ में एक बैग हैं । मुझे सुखद आश्चर्य हुआ । मैंनें टैक्सी वाले को भाड़ा दिया और यहाँ ये बता दूँ कि त्रिनिदाद के टैक्सीवाले मुम्बई वालों की तरह शरीफ नहीं हैं अपितु दिल्लीवालों की तरह हैं । गिरीश तो आ गया था पर लंदन में फलाईट बदलने के कारण उसका सामान नहीं आया था । पहली बार लगभग 20 घंटे की यात्रा करने और सामान न मिलने के बावजूद उसके चेहरे पर कहीं निराशा या थकान नहीं थी । जीवन में ऐसे आश्चर्य मिलें और मित्र आपके निमंत्राण का सम्मान करें तो आनंद आ ही जाता है । गिरीश के साथ त्रिनिदाद में व्यतीत समय में मैंनें उसे बहुत निकट से और साफ-साफ देखा जो बहुत बड़े लेख या छोटे से उपन्यास की विषय वस्तु बन सकती है पर यहाँ इतना कह सकता हूँ कि उसने अपने व्यवहार से न केवल मुझे अपने वश में कर लिया अपितु अनेक त्रिनिदाद वासियों को भी अपना मित्रा बना लिया ।

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       गिरीश बहुत ही पिछड़ा हुआ युवामन का व्यक्ति है । पत्रकार होते हुए वह 'सच्चे पत्रकार' के गुणों से वंचित है, संपादक होते हुए वह संपादक के अतिरिक्त महत्व से अपिरिचित है और राजनतिज्ञों से परिचित होते हुए भी जीवन मूल्यों की बात करता है । सबसे बड़ी बात है  कि वह 'नाशुक्रा' नहीं है । जिस जमाने में काम के समय मुस्कान बिखेरने वाले और काम निकलने पर पीठ फेरने वाले एक ढूंढो हजार मिलते हों, ऐसे में गिरीश जैसे शुक्रगुजारों की फसल कम हो रही है ।

 

         जीवन और साहित्य के बारे में आप यदि उसके दृष्टिकोण को जानते हैं तो आप भी उसके प्रशसंक होंगे ही । वह कितना ही विनम्र हो पर उसकी विनम्रता को आप उसकी कमजोरी समझने की भूल न करें । वह ललित विनोद का व्यंग्यकार नहीं है और नही ही व्यंग्य की कुनैन गोली को हास्य की चाश्नी में लपेट कर खिलाने का पक्षधर है अपितु जब वे लपेटने में आता है तो अच्छे-अच्छों को लपेट देता है । व्यक्ति के प्रति यदि उसके मन में सम्मान है तो उसकी विसंगतियों के विरुद्ध आक्रोश भी है । वह व्यक्तिगत प्रहार नहीं करता है अपितु प्रवृत्ति पर प्रहार करता है और उसका यह गुण उसके उपन्यास 'माफिया' में देखने को मिलता है । 'व्यंग्य यात्रा' में प्रकाशित अपनी रचना प्रक्रिया को रेखांकित करते हुए उसने लिखा था - माफिया लिखते वक्त मुझे यह चिंता भी लगातार सताती रही कि जिन विद्रूपों या चेहरों पर मैं प्रहार करने का दुस्साहस कर रहा हूँ उनमें से कुछ लोग तो मेरे भी आदरणीय रहे हैं। (आज भी हैं और कल भी रहेंगे) लेकिन जब मैंने उनके जीवन में भी विसंगतियाँ देखीं तो खुद को रोक नहीं पाया। फिर यह भी सोचता रहा कि उपन्यास पढ़कर ये लोग क्या सोचेंगे। लेकिन ऐसे ही वैचारिक संक्रमण काल में भगवद्गीता के श्लोकों ने मुझे सहारा दिया। धर्मयुद्ध अपने लोगों के खिलाफ ही लड़े जाते हैं। लड़े भी जाने चाहिए। यही कर्तव्य है। बस, इसी बात ने मुझे संबल प्रदान किया। और जब कहीं कलम डगमगाई, भगवद्गीता ने हिचक को खत्म करने का काम किया। मन ने कहा, जो होगा देखा जाएगा। अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा हूँ तो मार रहा हूँ। लेकिन जो कुछ देख रहा हूँ, भोग रहा हूँ, उसे ईमानदारी और साहस के साथ लिख नहीं पाया तो मेरा व्यंग्यकार होना ही बेकार है। मेरा संकल्प मुझे हिम्मत देता रहा और एक दिन 'माफिया' पूर्ण हो गया।''

          

        मेरी कामना है कि गिरीश जैसे साहित्यकार और जन्म लें और दीर्घायु हों । उसके पचास के होने पर मैं उसके संघर्षपूर्ण, रचनात्मक, सृजनशील एवं दिशायुक्त साहित्यिक दीर्घ जीवन की कामना करता हूँ

                                                                                                                                          0प्रेम जनमेजय

संपादक, व्यग्यं-यात्रा

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