प्रशासनिक
संस्कृति-स्मरणीय संस्मरण
(उत्तरप्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक एवं
साहित्यकार
डॉ.महेश
चंद्र
द्विवेदी
इधर लगातार अपनी रचनात्कमकता से साहित्य जगत्
को आकृष्ट करते रहे हैं । हिंदी और अंगरेंज़ी दोनों में
समानांतर लेखन रत श्री द्विवेदी की कहानियों एवं व्यंग्य
में समकालीन दुनिया की विद्रुपताओं का धुमिल चेहरा साफ-साफ
देखा जा सकता है । सृजनगाथा के विशेष आग्रह पर पुलिस
प्रशासन की अंदरूनी हिस्सों को परत-परत खोलता आत्मकथात्मक
संस्मरण का पहला भाग प्रस्तुत है । हमारे पाठकगण इसे आगामी
अंकों में लगातार पढ़ सकेंगे । आपकी प्रतिक्रिया की
प्रतीक्षा रहेगी - संपादक )
1चूज़
योर टाइम ऐण्ड प्लेस
''
आई डोंट मीन दैट यू शुड बिकम
ब्रह्मचारीज़, बट चूज़ योर टाइम
एंड प्लेस''
नेशनल एकेडेमी आफ़ एडमिनिस्ट्रेशन,
मसूरी के डाइरेक्टर श्री दत्त वर्ष
1963
के
फाउंडेशनल कोर्स के समापन भाषण मे प्रोबेशनसर को अंतिम
उपदेश देते हुए बोल रहे थे। केन्द्रीय
सरकार की सभी प्रथम श्रेणी की सेवाओं के नवचयनित
अधिकारियों को ओ एल क्यू एण्ड के
ऑफीसर
लाइक क्वालिटीज़ ऐण्ड नौलिज सिखाने हेतु यह कोर्स आईएएस
अधिकारियों के प्रशिक्षण हेतु स्थापित इस एकेडेमी मे
प्रतिवर्ष की भांति आयोजित हुआ था- मै आई पी एस सेवा का
अधिकारी भी इन्हीं प्रोबेशनर्स मे एक था। फ़ाउंडेशनल कोर्स
पांच माह का था जिसे पूरा करने के बाद आई ए एस प्रोबेशनर
वहीं अपना वर्ष भर का प्रशिक्षण पूरा करते थे और अन्य
सेवाओं के प्रोबेशनर्स
अपनी अपनी एकेडेमी मे चले जाते थे। इस कोर्स का पाठयक्रम
हमे भारतीय संविधान,
विधान,
नागरिकता, इतिहास,
तथा भारत की सामाजिक,
राजनैतिक,
प्रशासनिक एवं आर्थिक परिस्थितियों से अवगत कराने एवं उनके
प्रति सम्वेदनशील बनाने के श्लाघनीय उद्येश्य से तैयार
किया गया था परंतु इस एकेडेमी का प्रशासनिक नियंत्रण
पूर्णत: आईएएस अधिकारियों के हाथ मे था और एकेडेमी का
वातावरण पूर्णत: आईएएस-मय था,
जिसके कारण हम संविधान और समाज के प्रति कम और जीवन जीने
की साहिबी कला के प्रति अघिक संवेदनशील हो रहे थे। श्री
दत्त की उपर्युक्त अंतिम शिक्षा फाउंडशनल कोर्स मे हमे
प्राप्त शिक्षा का निचोड़ थी। अत: उनकी ब्रह्मचारी न बन
जाने की बात से मेरे जवां-दिल मे गुदगुदी तो हुई,
परंतु कोई आश्चर्य नहीं हुआ।
11जुलाई,
1963
की भीगी सी शाम को जब मै एकेडेमी
ज्वाइन करने गया था,
तो अंगरेज़ी
ज़माने के भव्य शार्लविल भवन,
जिसमें
आजकल एकेडेमी चल रही है,
के गेट पर अंगरेज़ी
शराब की एक बडी सी दूकान देखकर मुझ जैसे ग्रामीण
अंचल से आये नौजवान
को कुछ अजीब सा लगा था - विशेषत: इसलिये कि वहाँ
वही एकमात्र दूकान थी अन्य किसी वस्तु की दूकान नहीं थी।
बाद मे ज्ञात हुआ कि चूंकि एकेडेमी से मसूरी का बाज़ार
दो किलोमीटर दूर था,
अत: आईएएस प्रोबेशनरों
के समुचित प्रशिक्षण मे सुविधा हेतु मधुशाला का प्रबंध
एकेडेमी के गेट पर ही करा दिया गया था। चाहे अप्रत्यक्ष
रूप से ही हो,
मद्यपान की कला मे वांछनीय प्रशिक्षण
एवं प्रोत्साहन एकेडेमी के प्रशासनिक अधिकारी आईएएस
प्रोबेशनरों
को देते रहते थे,
उदाहरणार्थ एक दिन एक आई ए एस प्रोबेशनर
इस मधुशाला पर ब्लैक-नाइट की बोतल खरीद रहा था कि तभी एक
डिप्टी डाइरेक्टर महोदय ने वहाँ
प्रवेश किया। चूंकि यह प्रोबेशनर
बिहार के एक गाँव
का मूल निवासी था,
अत: डिप्टी डाइरेक्टर महोदय को देखकर
वह कुछ झिझका। यह भांपकर डिप्टी डाइरेक्टर महोदय अवलिम्ब
उसे आश्वस्त करते हुये बोल पडे.,''
ओह कम आन,
आई ऐम आल्सो गोइंग टु बाई वन''।
मैने आईएएस एकेडेमी के प्रशासकों मे आईएएस प्रोबेशनरों
को ब्रह्मचारी न बनने देने एवं इस विषय मे उनके प्रति
दिलखोल दरियादिली दिखाने मे कभी कोई कमी नहीं पाई। रेलवे
एकांट्स सेवा की एक महिला प्रोबेशनर काफी बिंदास थी। एक
शाम चार आईएएस प्रोबेशनरों
ने उसे डिनर पर निमंत्रित कर खूब पी और पिलाई। फिर सहारा
देकर एक के कमरे मे ले जाकर उसकी ऐसी दशा कर दी कि वह कुछ
दिन तक अपने कमरे मे पडी रही और लगभग एक माह तक तकिया के
सहारे ही कक्षा मे बैठ पाती थी। उन्हीं आईएएस प्रोबेशनरों
मे से एक उस महिला प्रोबेशनर
का तकिया उसके कमरे से क्लासरूम तक उसके साथ-साथ
लाता था और वापस ले जाता था। घटना के तथ्य एकेडेमी मे सबको
ज्ञात हो गये थे,
परंतु प्रशासनिक अधिकारियों ने
सम्बंधित प्रोबेशनरों को मात्र यह सलाह देकर मामला रफा दफ़ा
कर दिया था, ''चूज़ बियरेबुल
नम्बर''।
इस घटना के पहले भी हम लोगों ने सुन रखा था कि मेरे बैच के
पूर्वगामी बैच के एक आईएएस प्रोबेशनर
ने शार्लविल भवन के पीछे की पहाडी पर रहने वाले एक पहाडी
व्यक्ति की
13-14 वर्ष की कन्या के साथ ज़बरदस्ती
कर दी थी, तो तत्कालीन
डाइरेक्टर महोदय ने एकेडेमी की,
अपनी एवं कन्या की इज्ज़त का 'ख़याल'
कर उस प्रोबेशनर
को
'चूज़ प्रौपर एज'
की सलाह देकर मामले को ठंडा कर दिया था।
इस एकेडेमी की एक अन्य विषय मे भी विशेष प्रशंसा करनी होगी
कि यह भारत के भविष्य के शासकों मे देश के नागरिकों एवं
शासन की अन्य सेवाओं के प्रति
'सही'
दृष्टिकोण उत्पन्न करने मे बिल्कुल नहीं
चूकती है। मै इस एकेडेमी के स्टेपुल्टन नामक हौस्टल के
कमरा नम्बर आठ मे रहता था और उसी कमरे मे आडिट एंड
एकाउंट्स सर्विस का बागची नामक प्रोबेशनर
मेरा रूम पार्टनर था। चूंकि इस होस्टल की बिल्डिंग
पुरानी थी और रखरखाव निम्नस्तरीय था अत: इसके सभी कमरे
आईएएस क़े अलावा अन्य सेवाओं के प्रोबेशनरों
को ही आवंटित किये गये थे। लगभग दो माह के प्रशिक्षण के
बाद मेरा रूम-पार्टनर बागची आईएएस में
ले लिया गया क्योंकि आईएएस में
चयनित एक अभ्यर्थी ने सर्विस ज्वाइन नहीं की थी।
उसे तुरंत हैपीवैली,
जो सर्वोत्तम होस्टल था,
में
कमरा आवंटित कर दिया गया। इस प्रोबेशनर
ने बाद मे एक दिन मुझे बताया
,'' महेश! यू नो व्हाट दे
प्रशासक
टेल दी आईएएस प्रोबेशनर्स
प्रायवेट्ली
' रिमेम्बर,
यू आर देयर टु रूल दी कंट्री
व्हाइल औल अदर्स आर टु सर्व'।''
मुझे अपनी इस सेवक की स्थिति का सही
ज्ञान फांउंडेशनल कोर्स के मस्ती भरे दिनों के समाप्त होने
पर सेंट्रल
पुलिस
ट्रेनिंग
कालिज,
माउंट आबू आने पर ज्ञात हुआ,
जहाँ
कालिज तथा मेस मे शराब और लड़की का मेंशन करना तक
मना था तथा आबू पहाड़
की हाड़तोड़ सर्दी मे प्रात: साढे पाँच
बजे परेड पर प्रस्थान करना पड़ता था और रात्रि मे डिनर के
समय तक एक अधिकारी हमे उचित व्यवहार सिखाने एवं हमारे आचरण
पर निगाह रखने हेतु हमारे साथ रहता था।
परंतु यह न बताकर कि नेशनल एकेडेमी आफ़ एडमिनिस्ट्रेशन,
मसूरी मे गुज़रे मेरे दिन मेरे जीवन के
कतिपय सबसे मजेदार दिनों मे से थे,
एकेडेमी के प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन
के सुअवसर से मै चूकना नहीं चाहता हूँ।
2-
बेटर रिजाइन फ्राम पुलिस
''साहब!
गाली खाना चाहता है?''
उस्ताद हवलदार रैंक के परेड इंस्ट्क्टर ने हमारे प्लाटून
के दास नामक आईपीएस
प्रोबेशनर
से कड़क कर कहा,
और हममें से कुछ का खून गुस्से से उबलने लगा और कुछ का भय
से जमने लगा।
हम
57 आईपीएस प्रोबेशनर
मसूरी की हसीनवादियों मे ज़िदगी के सबसे हसीन लमहे बडे
पुरलुत्फ़ ढंग से गुजारकर
12 जनवरी,1964
को सेंट्रल
पुलिस ट्रेनिंग कालेज,
माउंट आबू मे पुलिस की ट्रेनिंग
लेने पहुँचे
थे।
आबू की आबोहवा मसूरी से कम उत्फुल्लकारी नहीं थी परंतु हम
उसको खुले दिल से आत्मसात नहीं कर पा रहे थे क्योंकि हमने
पुलिस ट्रेनिंग
की दुर्व्यवहारमय
दुरूहता के किस्से खूब सुन रखे थे। पर हमने यह नहीं सोचा
था कि
13 जनवरी को ही सुबह पौने पाँच
बजे बेरा चाय की ट्रे
लेकर मेस मे हमारा दरवाज़ा
खटखटा रहा होगा और साढे पाँच
बजे उस्ताद हमारे प्लाटून को परेड गाउंड पर ले जाने के
लिये ऐसा बेताब खडा होगा कि दास के कमरे से दो मिनट देर से
निकलने पर गाली देने की धमकी देने लगेगा। दास के साथ दो
व्यक्तिगत कठिनाइयाँ
भी थीं - प्रथम यह कि कमोड पर देर तक बैठना उसकी आदत भी थी
और मजबूरी भी और द्वितीय यह कि दास
मोशाय
काफी ग़र्म मिजाज़
के थे। इस कारण शीघ्र ही वह दिन आ गया जब उस्ताद ने दास
मोशाय को न केवल सचमुच गरिया दिया वरन् लम्बे चौडे परेड ग्राउंड
का चक्कर भी लगवाया। परेड ग्राउंड
से वापस आते समय दास लगातार बमकता रहा और आफ़िस मे कमांडेंट
साहब के आते ही उस्ताद की शिकायत करने पहुँच
गया। कमांडेंट साहब श्री मिश्र क़ा उत्तर न केवल दास के
गुस्से के गुब्बारे को फोड़ने हेतु पर्याप्त था वरन् हम
सबको पुलिस विभाग मे अनुशासन का व्यवहारिक अर्थ भलीभांति
समझ लेने के लिये भी पर्याप्त था। दास को कुछ देर तक घूरने
के बाद वह गम्भीर मुद्रा मे बोले थे,
'' दास, दिस
इज़ पुलिस व्हेयर यू विल हैव टु लर्न टु लिव विद सच
सिचुएशंस। इफ़ यू कांट, बेटर
रिजाइन फ्राम पुलिस।''
यद्यपि सेंट्ल पुलिस
ट्रेनिंग
कालेज का हमारा प्रशिक्षण कार्यक्रम हमें उठने-बैठने,
चलने-फिरने,
खाने-पीने आदि के साहिबी तरीके सिखाने,
शारीरिक रूप से स्वस्थ एवं मज़बूत बनाने
तथा मानसिक रूप से अनुशासित,
चरित्रवान और ज्ञानवान बनाने के उद्येश्य से बनाया गया था
और हमारे प्रशिक्षकगण भी इस हेतु सख्ती से लगे रहते थे,
परंतु मेरा विचार है कि
प्रशिक्षकों
की कार्य-संस्कृति मे कहीं
कुछ ऐसा था कि उन्हें इस उद्येश्य की प्राप्ति मे पूर्ण
सफलता नहीं
मिलती थी। कालेज मे व्याप्त भय का वातावरण मुझ जैसे
व्यक्ति मे रोष एवं उसके शमन की असम्भाविता पर ग्लानि
उत्पन्न करता था। दूसरी ओर हममे बाला जैसे प्रोबेशनर
भी थे जिन पर चिकने घड़े
क़े समान पानी की एक बूंद भी नहीं रुकती थी। बाला
दर्शनशास्त्र मे प्रथम श्रेणी मे एमए था और ज्यां पाल
सार्त्र की एग्ज़िस्टेंशियलिस्ट फिलोसोफी.
का अर्थ लगाता था'
यावत्जीवेत सुखेन जीवेत'
उसे बियर पीने की आदत पहले से थी,
जो नेशनल एकेडेमी आफ़ एडमिनिस्ट्रेशन
मे भरपेट पिये रहने की लत बन गई थी। इस कारण उसके घुटनों
मे काफी दर्द रहता था और वह घुड़सवारी बिल्कुल नहीं
करना चाहता था। अत: पहले दिन से ही वह घुटने मे दर्द बताकर
घोडे पर चढ़ने मे असमर्थता जताकर बचने का प्रयत्न करने लगा
था। तब राइडिंग इंस्ट्रक्टर ने अन्य प्रोबेशनरों
की सहायता से उसे घोडे पर उठाकर रखना प्रारंम्भ
किया,
तो वह तुरंत उलटी करने लगा।
जब यह क्रम कुछ दिन तक अनवरत चला,
तो राइडिंग इंस्ट्रक्टर
ने हार मानकर बाला को राइडिंग ग्राउंड
के बाहर खडे रहकर दूसरों को राइडिंग करते देखते रहने को कह
दिया। एक दो दिन ऐसा करने के बाद बाला ने घुटने में
दर्द के कारण खडे होने मे असमर्थता जाहिर की और फिर
राइडिंग ग्राउंड पर आना बंद कर दिया। श्री बर्ज,
असिस्टेंट डाइरेक्टर को पता चलने पर एक
दिन वह तनफ़नाते आये और चार प्रोबेशनरों
को कहा,
''बाला को उठाकर ले आओ।''
कुछ देर मे चारों सूखा सा मुँह
लेकर बिना बाला के वापस लौट आये क्योंकि बाला उन्हें देखकर
पलंग से चिपककर कराहने लगा था। हम लोगों ने सोचा कि अब
बाला की नौकरी गई,
पर हुआ मात्र यह कि बाला को फाइनल
इग्जाम में
घुड़सवारी में
फेल कर दिया गया। इस कारण उसे आबंटित
उडीसा राज्य में
जाने के बाद अगले वर्ष के प्रोबेशनर्स
के फाइनल इग्जाम में
घुड़सवारी की परीक्षा देने हेतु पुन: माउंट आबू आना पडा और
वह फिर फेल हो गया। अंगरेज़ी
शासन अपने आल इंडिया सर्विस के अधिकारियों पर सदैव मेहरबान
रहता था क्योंकि उन्हीं के माध्यम से जनसाधारण पर राज्य
करता था। अंग्रेजी समय की आल इंडिया सर्विसेज़ की
उत्तराधिकारी आल इंडिया सर्विसेज़ ने स्वतंत्रता के उपरांत
भी शासन की उन पर इस मेहरबानी को कम नहीं होने दिया था
वरन् कई मानों मे बढ़ा ही दिया था,
अत: तीसरी बार भी फेल होने पर शासन ने
बाला को राइडिंग इग्जाम से मुक्त कर दिया और शीघ्र
ही प्रोन्नत
भी कर दिया।
एक वर्ष की कडी शारीरिक मेहनत और अनेक कानूनों,
पुलिस प्रक्रियाओं,
विवेचना तकनीकों एवं सामाजिक विषयों की
पढाई के
बाद जब हममें से उत्तर प्रदेश को आबंटित
7 प्रोबेशनर जनवरी, 1965
में
उत्तर प्रदेश राज्य के अपने कानूनों
एवं राज्य की अपनी विशिष्ट पुलिस प्रक्रियाओं के विषय में
जानकारी हेतु ढाई माह के प्रशिक्षण के लिये पुलिस ट्रेनिंग
कालेज,
मुरादाबाद पहुँचे,
तो
इंट्रोडक्टरी
लेक्चर देते हुए वहाँ
के पुराने एवं अनुभवी वाइस प्रिंसिपल श्री श्रीवास्तव ने
हमसे कहा,
''आज मैं
आप से सिर्फ
इतना
कहना चाहूंगा कि आप को एक सफल पुलिस आफीसर होने के लिये
आवश्यक है कि आप लोग आज से वह सब भूल जायें जो आप को माउंट
आबू में
सिखाया गया है। आप लोग जो अब सीखेंगे,
वही आप के काम आयेगा।''
(क्रमशः अगले अंक में...)
Oमहेश
चंद्र द्विवेदी
ज्ञान प्रसार संस्थान
1/137,
विवेक खंड, गोमती नगर
लखनऊ,
उत्तरप्रदेश-226010
