रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 10, मार्च, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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स्मरणः कमलेश्वर

एक नायक की विदाई

     तवार का अखबार दो बुरी खबरें लेकर आया। पहली कमलेश्वर के न रहने की और दूसरी सांप्रदायिक दंगों की खबर। कमलेश्वर सही अर्थों में एक ऐसे लेखक थे, जिनका रूतबा हिंदी में हीरो सरीखा था। साहित्य और पत्रकारिता की दुनिया में जो नाम, जो स्थान, जो ऊचाई उन्होंने पाई, इससे वे नई पीढ़ी के बीच एक ऐसे नायक की तरह स्थापित थे।

 

          एक कहानीकार के रूप में कमलेश्वर इतने लोकप्रिय हुए कि उनका नाम हिंदी कहानी में एक अनिवार्य हस्ताक्षर के रूप में दर्ज हो गया। उन्होंने अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया, जिसमें सारिका का नाम और उस दौर में कमलेश्वर का योगदान ऐतिहासिक है। उन्होंने कथा साहित्य को सारिका के माध्यम से एक नई उर्जा दी और सारिका के मंच को एक आंदोलन में बदल दिया। यह वह दौर था जब मीडिया का इतना हल्लाबोल नहीं था। लेकिन कमलेश्वर ने इस दौर में भी मीडिया के उपलब्ध सभी मंचों पर अपनी कुशलता साबित की। आकाशवाणी, दूरदर्शन, समाचार पत्र, पत्रिकाएं तथा फिल्में हर क्षेत्र में कमलेश्वर की उपस्थिति दिखती थी। लगातार काम करने की क्षमता तथा लोगों को अपना बनाते चलने के गुण ने उन्हें वह ऊचाई दिलाई, जहाँ ईष्या जैसा शब्द भी बेमानी हो जाता है।

 

        एक सक्रिय साम्यवादी होने के बावजूद उनमें औदार्य के गुण कूट-कूटकर भरे थे। उनकी रेंज बहुत व्यापक थी। वे अपने घोर वैचारिक आग्रहों के बावजूद अपने वैचारिक शत्रुओं से भी अच्छे रिश्ते बना ले जाते थे। कांग्रेस पार्टी के तमाम महत्वपूर्ण नेताओं के उनके बहुत अच्छे रिश्ते थे। इंदिरा गांधी ने ही उन्हें दूरदर्शन का अतिरिक्त महानिदेशक बनाया था। व्यवस्था में रहकर भी आम आदमी की आवाज को बुलंद करना तथा अपनी शर्तों पर जीना कमलेश्वर को रास आता था। लेखकों और पत्रकारों की एक बड़ी पीढ़ी पर उनका सम्मोहन था। वे उन्हें पढ़ने और सुनने को आतुर रहते थे। खासकर युवाओं को तो वे अपना दीवाना बना लेते थे। उन्हें समां बांधना आता था। लोगों को जोड़ना और जोड़कर रखना उनकी विशेषता थी। आवेग में बोलना और श्रोताओं पर सम्मोहन सी स्थिति कायम करना उन्हें आता था।

 

        एक जमाने में हिंदी में दो संपादकों का जलवा था। पहले डा. धर्मवीर भारती और दूसरे कमलेश्वर। दोनों पत्रकारिता और साहित्य के बीच सेतु की तरह थे। बावजूद इसके कमलेश्वर में जो खुलापन था, उसके चलते वे डा. भारती से ज्यादा लोकप्रिय रहे। लेखन में डा. भारती का अपना स्थान है और कमलेश्वर की अपनी जगह। डा. भारती अपने कार्यालय में बेहद अनुशासनप्रिय थे, जबकि कमलेश्वर का चैंबर ठहाकों से गूंजता रहता था। इन दोनों लेखकों ने एक संपादक के रूप में हिंदी जगत को लंबे अरसे तक सम्मोहित कर रखा था। कमलेश्वर ने जो कुछ पाया अपने संघर्ष और जिजीविषा से पाया। उनकी इस यात्रा में इलाहाबाद का अपना योगदान है। इस शहर ने उनके व्यक्तित्व को रचा और एक पहचान दी। फिर तो जैसे सारा जहां ही कमलेश्वर का घर हो गया। अपनी आवाज के जादू के चलते वे पूरे देश में पहचाने जाने लगे।

 

        लिखना-बोलना और एक कार्यकर्ता की तरह जूझना उनकी आदत में शुमार था। कमलेश्वर मुख्यधारा की पत्रकारिता में थे, लेकिन उन्होंने अपने विचारों से न तो कभी समझौता किया, न ही उन्हें छिपाया। उन्हें जो पसंद था, उसे कहने में वे कभी नहीं हिचकते थे। इससे उनकी साफगोई तो दिखती ही थी, कई बार उनके पूर्वाग्रह भी प्रगट हो जाते थे। उनमें एक खास तरह की फैसले लेने की दृढ़ता थी। वे लिखते हुए जजमेंट भी देते थे। उनके लेखन और व्यक्तित्व दोनों में एक आक्रामक लहजा ही दिखता था। कमलेश्वर के लिखे पर विवाद और बोलने पर तालियां बजना तय माना जाता था। यही कमलेश्वर की पहचान थी, जो उनकी मृत्यु के बाद उनके चाहने वालों को रूलाती रहेगी। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम रिश्तों पर अपना वृहद उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' हाल में ही लिखा था। जिसकी पूरे देश में बहुत चर्चा हुई। इससे हिंदू-मुस्लिम रिश्तों पर उनकी साफ समझ और चिंताओं का पता चलता है।

 

        एक कथा लेखक के रूप में प्रविष्ट होकर नई कहानी के त्रिभुज मोहन राकेश, कमलेश्वर और राजेंद्र यादव में कमलेश्वर प्रतिभा के मामले में सबसे प्रखर साबित हुए। जिन्होंने अपने कई रंग-रूप धारण किए और हर जगह अपना लोहा मनवाया। वे प्रतिबद्ध साम्यवादी भी थे, तो उतने ही प्रखर पत्रकार और लेखक भी। उतने ही दोस्तबाज और उतने ही हठी भी। सही अर्थों में वे आडंबरों के खिलाफ थे। जिंदगी के ढोंग उन्हें रास नहीं आते थे। शायद इसीलिए अपने चाहने वालों को भी वे गलत करने पर नहीं बख्शते थे। आम आदमी की पक्षधरता उनका एक नैसर्गिक स्वभाव था। बाद के दिनों में गंगा पत्रिका के माध्यम से उन्होंने पत्रकारिता में जो हस्तक्षेप किया वह अद्भुत था। पत्रिका लंबे समय तक नहीं चल सकी, लेकिन कमलेश्वर की उपस्थिति ने कम समय में ही उसकी खुशबू पूरे देश में फैला दी। उनका नाम हिंदी पत्रकारिता में इतना महत्वपूर्ण हो गया कि देश के दो समाचार पत्र समूहों ने अलग-अलग समय पर संपादक के रूप में उनके नाम का इस्तेमाल किया। कमलेश्वर का नाम सफलता की गारंटी माना जाने लगा। वे हिंदी पत्रकारिता के ऐसे शुभंकर साबित हुए जिसे हर कोई अपने साथ जोड़ना चाहता था। हाल के दौर में हिंदी जगत में इतना ताकतवर लेखक और संपादक नहीं देखा गया। सत्ता के साथ आलोचनात्मक विमर्श का रिश्ता रखने के बावजूद लोग उनकी आलोचना सुनने को मजबूर थे। कमलेश्वर इसी असहमति का नाम है।

 

        आप उन्हें चाहें या न चाहें कमलेश्वर को पढ़ना और उनकी खनकती आवाज को सुनना एक अलग ही अनुभव है। अब जब वे इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं और उनकी कायिक उपस्थिति की कहीं कोई संभावना भी नज़र नहीं आती,  उनकी याद बहुत स्वभाविक और मार्मिक हो उठती है।

o संजय द्विवेदी

स्थानीय संपादक, दैनिक हरिभूमि

रायपुर, छत्तीसगढ़

 

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वज़ूद आदमी की अपनी ज़िंदगी के कानून का शब्द है - कमलेश्वर

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