रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 10, मार्च, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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स्मरणः कमलेश्वर

।।श्रद्धा-सुमन।।

अनेक खूबियों के धनी थे कमलेश्वर.......

मलेश्वर को सन 2005 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। कमलेश्वर का निधन हिंदी साहित्य और पत्रकारिता जगत के लिए एक बड़ा आघात है। ख़ासकर जिस तरह अभी तक उनका सक्रिय लेखन जारी था, उससे देखते हुए उनका निधन पाठकों के लिए किसी दुखद आश्चर्य से कम नहीं है। कमलेश्वर जी ने नई कहानी और उसके बाद के दौर में जो योगदान किया है. वह बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन कमलेश्वर जी का न रहना हिंदी साहित्य के लिए बहुत बड़ी क्षति है।

-पुरूषोत्तम अग्रवाल

अध्यक्ष, हिंदी विभाग

जवाहरलाल नेहरू विश्विविद्यालय

दिल्ली

साहित्य जगत रहेगा सूना कमलेश्वर के बिना.......

कमलेश्वर ने आधुनिक हिंदी कथा साहित्य को पुष्पित और पल्लवित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होने आधुनिकता की दौड़ में तेज़ी बदलते समाज, जीवन मूल्यों और उसके बीच संवेदनाओं और भावनाओं की कसमसाहट को आवाज़ दी। आज के महानगरीय जीवन में आदमी के अकेलेपन की व्यथा को उन्होंने ख़ूब समझा। उनके पात्र मध्यवर्गीय समाज से आते हैं। एक बार रेडियो डॉयचे वैले से बात करते हुए अपने लेखन की प्रेरणा के बारे में कहा था- मेरे हालात, मेरे आसपास का माहौल, मेरे शहर की स्थितियां और मेरे समाज के हालात, ये सब मिलकर मेरे लिखने की प्रेरणा बने।

-अशोक कुमार

डॉयचे वेले 

 

कमलेश्वर का हमारे बीच से उठ जाना एक बहुत बड़ा नुक़सान है.....

मैं व्यक्तिगत तौर पर उन्हें 1964-65 से जानता हूँ । यह वह ज़माना था जब कमलेश्वर और नई कहानी एक दूसरे के पर्याय बन चुके थे । कमलेश्वर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में आमंत्रित किए जाते थे और वहाँ हम छात्रों की उनसे मुलाक़ाते होती थीं । उसके बाद दिल्ली, मुंबई और फिर दिल्ली में कमलेश्वर से लगातार संपर्क बना रहा और श्रेष्ठ लेखक होने के अलावा उनकी एक बहुत बड़ी ख़ूबी मुझे यह लगी कि कमलेश्वर किसी भी सामाजिक मुद्दे पर हमेशा कंधे से कंधा मिला कर चलने के लिए तैयार रहते थे ।

 

        हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक विभूतिनारायण राय ने अपने गाँव जोकरहा में एक पुस्तकालय बनाया है जहाँ अक्सर गोष्ठियाँ होती रहती है और देश के दूसरे शहरों से लेखक जाते रहते हैं. एक बार मुझे कमलेश्वर के साथ वहाँ जाने का मौक़ा मिला था ।

 

        शहर से गाँव तक जाने वाली सड़क का यह हाल था कि गाड़ी दो-दो फुट उछल रही थी । तीन-चार घंटे की यात्रा एक मुसीबत लग रही थी । लगता था रीढ़ की हड्डी टूट ही जाएगी । लेकिन अचानक ख़्याल आया कि हमारे साथ कमलेश्वर भी हैं जिनकी उम्र उस वक़्त सत्तर से ऊपर थी. कमलेश्वर को भी धक्के लग रहे थे. सोचा हमारी तरह उनकी भी रीढ़ की हड्डी है लेकिन कमलेश्वर के चेहरे पर शिकन नहीं थी। न उन्होंने एक बार सड़क के खराब होने की शिकायत की और ये कहा कि देखों रीड़ की हड्डी बचती है या नहीं ।

 

        उन्हें यह सब सहते देख कर हम लोगों की हिम्मत बंधी और हम आराम से यात्रा करने लगे. बाद में कमलेश्वर से इस बात का ज़िक्र किया तो मुस्कुराए और बोले,‘‘भई हम इस देश के लेखक हैं. यह अच्छा है या बुरा; इसकी ज़िम्मेदारी हमारे ऊपर आती है । शिकायत क्या करें।’’

 

साहस की मीनार

अटूट साहस था कमलेश्वर में । एक बार भारत-पाक दोस्ती के संदर्भ में बात चल रही थी और कहा जा रहा था कि दोनों देशों की सरकारें अगर जनता को आपस में मिलने नहीं देतीं तो सबसे पहले इसका विरोध लेखकों को करना चाहिए । ‘‘लेखकों यदि वीज़ा नहीं दिया जाता तो उन्हें बिना वीज़ा के ही सीमा पार करने की कोशिश करनी चाहिए, चाहे वे गिरफ्तार ही क्यों न कर लिए जाएँ. कमलेश्वर ने कहा था अगर आप लोग ऐसा करते हैं तो मैं पहला आदमी होउँगा जो सीमा पार करने की कोशिश करूँगा.।’’ सचमुच कमलेश्वर हिम्मत और साहस की मीनार थे ।

-असग़र वजाहत

अतिथि संपादक

बीबीसी हिंदी

प्रेमचंद की परंपरा के कथाकार........

कमलेश्वर ने जिस जमाने में लिखना शुरू किया उन्होंने अपने पाठकों पर जादुई असर डाला । एक तो उन्होंने नए ढंग की कथाएं लिखीं। और उनमे जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया वह नैसर्गिक किस्म की थी। हालांकि कमलेश्वर प्रेमचंद की परंपरा के कथाकार हैं लेकिन उन्होंने अपने प्रयोगों द्वारा अपना भिन्न व्यक्तित्व स्थापित किया है। कमलेश्वर की दृष्टि संकीर्ण या साम्प्रदायिक या जातिवादी या दलवादी नहीं । वह  एक प्रगतिशील दृष्टि है जो समूचे मनुष्य? संसार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करती है। हम विवाद कर सकते हैं कि कमलेश्वर साहित्य की राजनीति के मध्य में रहे। नई कहानी आंदोलन हो या मेरा हमदम मेरा दोस्त स्तम्भ हो, इन तमाम चीजों के बावजूद कमलेश्वर का आशय अर्थवान, सृजन का समर्थन रहा है। बहुतेरे आलोचक उन्हें कथा आंदोलनों का प्रणेता कहते हैं किंतु इन आंदोलनों में कमलेश्वर की दृष्टि उस युवा स्वर को मुख्यधारा में लाने की थी जो नए ढंग से मनुष्य के आसनन संकट को व्यक्त कर सकें और उसके निराकरण के लिए संघर्ष की सरचनात्मक राह सुझ सकें। समांतर आंदोलन हो या समकालीन कहानी के दूसरे आंदोलन, कमलेश्वर ने हमेशा नव लेखन के सकारात्मक पक्ष का ही समर्थन किया है।

-गंगा प्रसाद विमल

वरिष्ठ साहित्यकार

नई दिल्ली

 

गहरी संवेदना के साहित्यकार........

कमलेश्वर जी का संबंध मैनपुरी जनपद से था । मेरी ननिहाल मैनपुरी में थी और मेरे मामा कमलेश्वर जी के साथ पढ़ते थे । कमलेश्वर जी का बाल्यकाल बहुत अभावों में बीता। शायद बाल्यकाल के दुर्गम संघर्ष कने ही उन्हें जीवन से लड़ने का साहस, संवेदनसीलता तथा गहरी मानवीय अनुभूति दी। कमलेश्वर जी गहरी संवेदना के साहित्यकार थे। उनके बारे में सबसे बड़ी बात यह थी कि उन्होंने अपने जीवन के कटु अनुभवों को कभी भी अपने चिंतन का विषय नहीं बनाया । लगातार विषम परिस्थितियों से जूझते हुए भी उनकी सृजनशीलता अक्षुण्ण बनी रही। उनकी अति मानवीय व्यवहार चोटों के लिए प्यार और स्नेह, अपने साथियों को आगे बढ़ाने की प्रवृत्ति तथा सबसे बराबरी का व्यवहार सदैव उनके सम्पर्क में आने वालों की स्मृति का अंग बना रहेगा। शायद आम आदमी के प्रति गहरीसंवेदना की पत्रकारिता और साहित्य सृजन उनके लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।

 -प्रदीप माथुर

वरिष्ठ साहित्यकार

बहुआयामी रचनाकार थे कमलेश्वर......

कमलेश्वर जी का अचानक जाना हिंदी ही नहीं बल्कि भारतीय साहित्य के लिए एक बहुत बड़ी क्षति है। कमलेश्वर उन विरले साहित्यकारों में थे जो न केवल अपनी पीढ़ी के लिए आदर्श के बल्कि नहीं पीढ़ी से भी उनका सतत संवाद रहता था। दूसरी बात ये कि वे धर्मविरपेक्षता के पक्ष और सांप्रदायिकता के विरोध में खड़े हुए गिने चुने सक्रिय लेखकों में से थे। मूलतः उनके सरोकार मानवीय थे। वे किसी राजनीतिक दल के प्रवक्ता की भाँति नहीं थे। एक सृजनशील रचनाकार के रूप में वे अपने को निरंतर नया करते रहे। कमलेश्वर ने अपने लेखकीय जीवन की शुरुआत सन 50-55 के आसपास की। उन्हें वास्तविक लोकप्रियता राजा निरबंसिया से मिली। सबसे बड़ी बात यह कि उनकी चाहे कहानियाँ हों या उपन्यास उनमें सामाजिक रिश्तों की गहरी उष्मा है। उपन्याकार के रूप में भी वे निरंतर प्रयोगधर्मी रहे और इसकी सबसे बड़ी मिसाल कितने पाकिस्तान है। उन्होंने पहली बार यह दिखाया कि साहित्यिक पत्रकारिता नाम की भी कोई चीज़ होती है और सारिका का संपादन इसकी उत्कृष्ट मिसाल है। आज अक्सर टेलीविजन धारावाहिकों की चर्चा होती है। लेकिन मेरी मान्यता है कि समाज के हर तबके से जुड़े हुए धारावाहिकों की शुरुआत उन्होंने ही की और अपने अलग ढंग से की।  

-प्रदीप पंत

आलोचक

 

 

आपकी प्रतिक्रिया

सदियों पुरानी सभ्यता मनुष्य के क्षुद्र विकारों का शमन करती रहती है - कमलेश्वर

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, संजीव ठाकुर, कामिनी, प्रगति

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