रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 10, मार्च, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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स्मरणः कमलेश्वर

एक धुआंधार जिंदगी का अंत

 भी 10 घंटे पहले हम कमलेश्वर के बारे में बात कर रहे थे । अब वे नहीं रहे । एक धुआंधार ज़िंदगी का तपाक से अंत हो गया । मेरे लिए तमाम वास्तविकताओं के बावजूद कमलेश्वर के दिल्ली वाले दिनों, दिल्ली के पहलू पर कम ध्यान गया । हम इलाहाबाद वालों के लिए उनकी शुरू की दुनिया यानी इलाहाबाद में उनका युवा काल कभी विस्मृत  नहीं होता बल्कि छाया रहता है । सघन स्मृतियाँ उन्हीं दिनों की हैं, बाकी तो सफलता की, शिखर की कहानियाँ हैं ।

 

        उसी समय कमलेश्वर ने अपना सर्वोत्तम गद्य लिखा, कहानियाँ लिखीं, वे भटकते हुए, लिखते, पढ़ते जबर्दस्तियाँ करते लू की लपेटों जैसे दिन थे और दक्षिणपंथियों को ताल देते हुए । अंत तक एक इलाहाबादी उनमें लहक रहा था । कमलेश्वर ने अपना तापमान हमेशा तेज रखा । रोग उन्हें तो होना ही था । इलाहाबाद में संगम में ही नहीं, साहित्य में भी दो धाराएं बिल्कुल स्पष्ट थीं । उस समय यानी छठवें-सातवें दशक में (1800 से के बाद अभूतपूर्व विकसे इस औपनिवेशिक शहर में) कमलेश्वर-मार्कण्डेय और दुश्यंत कुमार की त्रयी का जबर्दस्त बोलबाला था । आज उस त्रयी के दो धुरंधर नहीं हैं । पर उनका ऐतिहासिक मूल्य अभी भी जगमगा रहा है । कमलेश्वर की दोस्तियाँ हिन्दी में चर्चित रही हैं । वे आज भी यादगार बनी हैं । कमलेश्वर की दुश्मनियाँ भी जगजाहिर हैं ।

 

        कवि और यात्री विशप रेनाल्ड हेव्वर (1783-1826) तथा मिर्जा गालिब(17797-1869) ने इलाहाबाद को अपने समय में उजाड़ और निर्जन संबोधित किया था। ये लोग बाहर से आए थे, अल्पसमय के लिए आए थे और जल्दी प्रयाण कर गए। हम लोगों की पौध तो इसी उजाड़ की उपज थी। हमने चमकते बुझते इलाहाबाद को लगातार देखा । कमलेश्वर भारती राही, रामनारायण शुक्ल का समय भरपूर और बेजोड़ था 1957 के बाद सबसे बुरा निष्क्रमण इलाहाबाद के लिए तब हुआ जब एक तरफ भारतीय चले गए दूसरी तरफ कमलेश्वर ।

 

        जब मैंने शुरुआती कहानियाँ लिखी तो उन्हें सबसे पहले कमलेश्वर ने ही देखा। उसके बाद धर्मवीर भारती ने । कमलेश्वर कुछ समय के लिए जानसेनगंज के कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर में ही रहते थे। वही मैंने अपनी दो-तीन कहानियाँ पढ़ने के लिए दी थी। यह अवसर नहीं  होता तो मेरे जैसा  बेगाबान्ट कहानीकार नहीं बन सकता था। कमलेश्वर ने सराहा और प्रेरित किया । इसलिए कमलेश्वर के प्रति मेरे मन में गहरी श्रद्धांजलि है। इसे मैं सार्वजनिक कर रहा हूँ कि कमलेश्वर ने मेरी कुछ कहानियों में सूक्ष्म परिवर्तन करके उनहें बेहतर बनाया । कमलेश्वर को इसी रूप में याद करूँगा।

oज्ञानरंजन

संपादक, पहल पत्रिका

जबलपुर, मध्यप्रदेश

 

 

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मनुष्य ईश्वर के साथ सघन और उदात्त संबंध नही बना पाया है - कमलेश्वर

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