रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 10, मार्च, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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ललित निबंध

नहीं चाहिए ऐसा धर्म

 

नहीं चाहिए ऐसा धर्म, जिसमें मर्द औरत पर अत्याचार करता हो नहीं चाहिए ऐसा धर्म, जिसमें मर्द औरत को अपमानित करता हो

 

नहीं चाहिए ऐसा धर्म, जिसमें मर्द औरत को गुलाम समझता हो नहीं चाहिए ऐसा धर्म, जिसमें अमीर गरीब का शोषण करता हो नहीं चाहिए ऐसा धर्म, जिसमें अमीर गरीब को तुच्छ समझता हो. नहीं चाहिए ऐसा धर्म, जिसमें बलवान निर्बल को मसलता और कुचलता हो नहीं चाहिए ऐसा धर्म, जिसमें बलवान निर्बल को पाव की जूती समझता हो नहीं चाहिए ऐसा धर्म, जो दूसरे के धर्म को खत्म करना चाहता हो. नहीं चाहिए ऐसा धर्म, जो दूसरे के धर्म को गाली देता हो

 

        सोचता हू कि धर्म का अर्थ तो केवल इतना ही है, कि भगवान ने जिस किसी प्राणी को, जैसा और जिस तरह का बनाया है, वह उसी तरह से जीए वह पूरी सच्चाई और ईंमानदारी से अपनेर् कत्तव्य का पालन करे. बिना किसी ज़ोर जबरदस्ती के. बिना किसी भय संकोच के फिर वह प्राणी अच्छा करे तो सुख, बुरा करे तो दुःख. यही तो भगवान का नियम है, जो धार्मिक किताबें हमें बताती हैं लेकिन शायद ये सब नियम या बातें, पढने या सुनने के लिए ही हैं करने या कराने के लिए कुछ और ही है, जो अक्सर हम हत्याओं के रूप में, अत्याचारों के रूप में देखते और सुनते हैं फिर क्या फायदा इस तरह के धर्म का? फिर क्या लाभ इस तरह के नियमों का? जिसके दामन में खून खराबे के सिवा कुछ भी नहीं.जो स्वर्ग को नर्क बनाने की प्रेरणा देता हो जो इन्सान को शैतान बनने की प्रेरणा देता हो इससे बेहतर तो वो लोग हैं, जो किसी धर्म को न मानते हुए भी, भगवान के बताए या बनाए रास्ते पर चलते हैं. जो अपनेर् कत्तव्य का पालन करते हुए, बिना किसी भेदभाव के रहते हैं बिना किसी पर अपना अधिकार जताए या जमाए रहते हैं जो न तो किसी धर्म स्थान पर जाते हैं, और न ही किसी पंथ के अनुयायी ही हैं. जो अपनी साधना या प्रार्थना, अपने ही ढंग से, अपने ही समय पर, अपने ही घर में कर लेते हैं लेकिन फिर भी उनमें इन्सानियत है. उनमें मानवता के प्रति दया है उनमें मनुष्यता के प्रति प्यार है

 

        इतिहास को यदि पढा या टटोला जाए तो कोई भी युग ऐसा नहीं मिलता, जिस युग में औरतों पर, निर्बलों पर और निर्धनों पर अत्याचार न हुए हों उन्हें मजबूर न किया गया हो अपमान सहने पर उनका शोषण न हुआ हो हा, यह बात अलग है कि किसी युग में यह सब कम हुआ है और किसी युग में ज्यादा लेकिन हुआ ज़रूर कभी रूका नहीं उस वक्त भी जब विद्या आम न थी और इस वक्त भी जब विद्या आम है आज यदि पढाई लिखाई के हिसाब किताब को देखा जाए तो यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि आज, जितनी लम्बी और बडी ड़िगरियां हमारे पास हैं, शायद किसी भी वक्त में, किसी के पास भी नहीं थीं आज जितनी पुस्तकें हमारे पास हैं, किसी भी युग में, किसी के पास नहीं थीं लेकिन इसके बावज़ूद भी हम ज़हनी तौर पर, गंवार के गंवार ही हैं

 

हमारे पास सूचनाएं, घटनाएं, भाषाएं और शब्द तो बहुत हैं, लेकिन ज्ञान नहीं है बुध्दि नहीं है हमने किताबों को बाखूबी रट तो लिया है, लेकिन उनके सार को मन और मस्तिष्क में उतरने नहीं दिया शायद यही बजह है कि हम पढे लिखे होने के बावज़ूद भी, अनपढ ही हैं हम धर्म को जानते और समझते हुए भी, अधार्मिक ही हैं मुझे इस अवसर पर एक मुहावरा याद आता हैः

टटुआ खा गया बटुआ,

फिर टटुए का टटुआ

 

    सोचता हू कि क्या कोई ऐसा देश, ऐसा लोक नहीं है, जहा औरतों पर, निर्बलों पर और निर्धनों पर जुल्म न होता हो? जहा उनका शोषण न होता हो? जहा उनके मान सम्मान का ख्याल रखा जाता हो? जहा उनके सुखदुःख का ध्यान रखा जाता हो? जहा हर प्राणी स्वतंत्र हो? जहा हर इन्सान अपनी इच्छा के अनुसार जी सकता हो? जहा हर इन्सान ईमानदार हो अपने कर्तव्य के प्रति? जहा हर मानव सच्चा हो सच्चाई के प्रति? जहां प्यार ही प्यार हो हर एक के प्रति? हे मेरे प्रभु! यदि कोई ऐसा देश है तो उसका पता बता? यदि नहीं है तो कोई ऐसा देश बना, जहां जाकर बसा और रहा जा सके!  

o अशोक कुमार वशिष्ठ
103 chelveston crescent
Aldermoor, Southampton

So15  5sd, Hampshire, England

 

 

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