संजय की पाँच
कविताएं
(सूर्योदय यानी
नये कवियों की रचनाओं का स्थल । इस बार हम परिचय करा रहे
हैं संजय की कविताओं से । संजय की कविताओं की धमनियों में
आत्मा का सारतत्व मौजूद दिखाई देता है । कम उम्र में ही
आत्मिक अनुष्ठानों और मानव जीवन की सच्चाईयों को जिस तरह
संजय ने पकड़ा है वह चौकाता है । वह विश्वास दिलाता है कि
युवा कविता में मनुष्य की शाश्वत चीजों के लिए तड़प अभी
शेष है । उनकी कविता आत्मिक रसानुभूति तो कराती ही चलती
हैं साथ ही साथ जीवन संबंधी भारतीय दार्शनिक विचारों से भी
जोड़ती जाती हैं । अभी कविता के नये विषयों पर भी उनकी
दृष्टि पूरी तरह सधी नहीं है पर उसकी शुरूआत हो चुकी है ।
'सिगरेट'
ऐसी ही एक कविता है । संजय के यहाँ शिल्पगत नवीनता के लिए
भाषिक संरचना की तलाश की जानी अभी बाक़ी है तथापि इधर उभर
रहे नये कवियों में भाषिक सहजता जिस तरह उभर रही है वह
संजय में भी है, संजय की एक किताब छप चुकी है
अनन्त यात्रा
नाम से। प्रस्तुत है उनकी पाँच कविताएं-
संपादक
)
अग्निप्रवेश
शायद
तुम नहीं जानती
अग्नि केवल जलाती नहीं
निखारती है, चमकाती भी
प्रश्न उठता केवल इतना
तुम सोना हो या नहीं
भय से क्यों हो कंपित
अंश जलेगा वही
जो सोना नहीं
अच्छा है जल जाने दो
उन तत्वों को भस्म हो जाने दो
जो नहीं ते कभी तुम्हारा अंश
न जाने कैसे समा गए
तुम्हें अशुद्ध बना गए
निर्मलता यदि पुनः पाना
संकल्पबद्ध, भयमुक्त हो करना
प्रिय तुम अग्निप्रवेश

सिन्दूर
जो
सजता तु्म्हारी माँग में
रखा बचाकर मैंने
है तुम्हारी अमानत
अब भी पास मेरे
न सजा तुम्हारी माँग में
अब करना प्रिय!
केवल इतना
बिखेरना सफेद कफ़न पर
शायद आए याद फागुन की
जाते-जाते फिर मुझे
अनन्त यात्रा
मृत्यु
नहीं मेरा अंत
मेरी यात्रा अनन्त
जीवन एक पड़ाव था
क्षणभर का विश्राम था
अभी करना पार मुझे
आकाशगंगाए अनन्त
जो पाया वो न मेरा था
जो खोया वो न मेरा था
न कोई मुझे बाँध सका
न मुझको कोई जान सका
श्मशान जला वो चोला था
जो पहना इस पड़ाव में
यह शुभारंभ यात्रा का
नहीं है अंत, नहीं है अंत
पार रहा न मैं तुमसे
स्मृति रूप समान मुझमें
यह मेरी जीवन पूँजी
मृत्यु पार जाएगी
या्त्रा में साथ निभाएगी
सो कर अटल निश्चय
लेता प्रिय विदा तुमसे
न मिलूँ शायद फिर तुमसे
करना प्रारंभ यात्रा अपनी
जिसका न शायद कोई अंत
सिगरेट
हम सिगरेट हैं
जिन्हें वे जलाते हैं
सुलगाते हैं
फिर धीरे-धीरे फूँकते हैं
धुआँ बन उड़ा देते हैं
फिर अधजला छोड़
आगे बढ़ जाते हैं
हम अधजले पड़े सड़कों पर
सुलगते रहते हैं
उनकी चमचमाती कार का पहिया
कुचल जाता है
न यशोगान न रुदन
यही बेनाम, हमारा अंत
वे भूल जाते मगर
इक चिनगारी बन सकती अग्नि प्रबल
माना हम सिगरेट हैं
ख़ुद ही जलते हैं
धीरे-धीरे सुलगते हैं
धुआँ बन निरंतर उड़ते हैं
अपना अस्तित्व स्वयं खोते हैं
अपने बूटों से रौंदने वालो
कभी मत भूलना
जिस दिन भड़के गज़ब हो जायेगा
ज़मीन आसमान, आसमान ज़मीन हो जाएगा

दुर्गापूजा
वो ढूँढ़ रही थी रोटी
कचरे के ढेर में
था मैला उसका आँचल
सहमा सा कमजोर शिशु
लिपटा था तन उसके
देख मुझे सहम गई
उसके सजल नेत्रों में
समायी थी
डर, बेबसी, भय की
अनकही कहानी
मैंने दिया जब शाल अपना
फौरन लपक
हो गई ओझल अँधेरे में
घण्टे घड़ियालों की गूँज आ रही थी
मैं लौट गया
सोचा क्या करूँ मंदिर जाकर
जब हो गई पूर्ण
मेरी दुर्गापूजा
O
संजय
नंद भवन, सुभाष नगर
गौंड पारा, बिलासपुर,छ.ग.
- 495001
