रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 10, मार्च, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलविशेषांकसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

    

समकालीन कविता

   

 

 डॉ. तारा सिंह की पाँच कविताएँ

 

यह कैसा त्योहार

 यह कैसी होली, कैसी दीवाली, कैसा यह त्योहार

लोग घुस आए हैं एक दूजे के घर लेकर तलवार

मजहब के नाम पर हो रहा है मुर्दों का व्यापार

यह कैसी होली, कैसी दीवाली, कैसा यह त्योहार

 

पुजारी बैठा हुआ है घात लगाकर मंदिर में

मौलवी सेवइयाँ बाँट रहा है विष के प्याले में

सतश्री अकाल के नारे संग गूँज रही तोप की

आवाजों के संग गली, घर और गुरुद्वारे में

घर बना मुर्दों का कब्रगाह , कफन बेच रहा

दूकानदार मरघट में, यह कैसा संस्कार

यह कैसी होली, कैसी दीवाली, कैसा यह त्योहार

 

करगिल ध्वंस हुआ, गोधरा जला, वतन हुआ बेजार

सुहागिनों का सुहाग  उजड़ा, माँ की गोद सूनी हुई

बेटी अनाथ हुई, पिता वतन के खातिर खुद

को कर्म-यग्य की हवन ज्वाला में भस्म कर दिया

खून से लिपटी, अकथ कहानी, कहती है दीवार

यह कैसी होली, कैसी दीवाली, कैसा यह त्योहार

 

बेटे का शव पिता के कंधे पर है लदा हुआ

पिता दो कदम चलने से भी लाचार

माँ की आँखों में रोशनी नहीं, कैसे

देखेगी पुत्र का यह अन्तिम संस्कार

यह कैसी होली, कैसी दीवाली, कैसा यह त्योहार

 

जो जीवित बचा वह भी मुरझा गया ग्रीष्म की नादानी से

यह कैसी प्यास जो मिटती नहीं नयन की जलधारों से

सभी अपनी-अपनी प्यास बुझाते,एक दूजे के सीने पर कर प्रहार

चतुर्दिक है हाहाकार , यह कैसा हो गया संसार

यह कैसी होली, कैसी दीवाली, कैसा यह त्योहार

 

यह जग विस्मय से हुआ है निर्मित

जब तक तुम सिंधु, विन्ध्य , हिमालय बन मेरे साथ रहे

तब तक भूत ,वर्तमान , भविष्य सभी मेरे साथ रहे

हृदय - उर रखना जो चाहता था कभी धूलिकण में नभ की चाह

गुनगुनाता था, कहता था सागर संगम में है सुख और

अमरता में है जीवन का हास ,आज वही उर उड़ाता है

मेरा उपहास् कहता है मुझसे, जब प्रिय ने ही उतार लिया

तुम्हारे गले से बाँहों का हार, अब तुम्हारे लिए निगाध के

दिन क्या,सौरभ फैला विपुल धूप क्या, पावस की रात क्या

 

कहते हैं यह जग विस्मय से हुआ है निर्मित

लघु-लघु प्राणियों के अश्रु-जल से बनता यह समन्दर

जिसके ऊँचे -ऊँचे लहरों की फुनगियों पर उठती

गिरती रहती बिना डाँड़ की प्राणी - जीवन तरी

निर्भय विनाश हँसता, सुषमाओं के कण -कण में

जैसे माली सम्मुख उपवन में फूलों की हो लूट मची

अब मैं समझी अंधकार का नील आवरण

दृश्य जगत से क्यों होता रहा बड़ा, क्योंकि

भय मौन निरीक्षक - सी , सृष्टि रहती चुपचाप खड़ी

 

यहाँ किसलय दल से युक्त द्रुमाली को

सुर प्रेरित ज्वालाएं आकर जीर्ण पत्र के

शीर्ण वसन पहनातीं, और कहतीं

धू -धूकर जहाँ जल रहा है जीर्ण जगत

तम भार से टूट -टूटकर पर्वत ने आकारों में

समा रहे, वहाँ अनन्त यौवन कैसे रह सकता

जिसका कि अभी तक कोई, आकार नहीं बना

   

तिमिर भाल पर चढकर काल कहता, तुम जिसे जीवन

कहते हो, वह केवल स्वप्न और जागृति का मिलन है

यहाँ मध्य निशा की शांति को चीरकर, कोकिला रोती है

खिन्न लतिका को छिन्न करने शिशिर आता है

यहाँ सब की अलग-अलग तरी, कोई किसी को दो कदम

साथ नहीं देता, इस त्रिलोक में ऐसा दानी कोई नहीं है

जो तुमको जीवन रस पीने देगा, इसलिए आनन्द का

प्रतिध्वनि जो गुंज रहा है, तुम्हारे जीवन दिगंत के

अम्बर में उसको सुनो, विश्व भर में सौरभ भर जाए

ऐसा सुमन खेल खेलो, रोना यहाँ पाप है मत रोओ

 

अब परिरंभ मुकुल में रहता हूँ बंदी अलि-सा

अब  तो  मद  पीये  बिना   ही   आँखों    के

आगे   छाया  रहता  अंधकार, मादकता  की

तरल    हँसी   के  प्याले में, उठती लहरों को

चूमने    परिरंभ    मुकुल  में बंदी अलि -सा

डोलता  रहता  दिन -   रात, मन    भागकर

छिप  जाता   नव  अतीत  के तुषार  कण में

ढूँढकर भी न मिलता, उसका कोई अता-पता

 

अस्ताचल  पर  देखता हूँ, जब  युवती  संध्या के  लाल

होंठों  से  बह रही मदिरा, तब कामना तरंगों से मंथित

होकर  हृदय सिंधु, बड़वाग्नि उगलने लगता, मनोदेश

की  वायु  व्यग्र,  व्याकुल चंचल हो उठती, लगता शेष

आयु  के  लिए  निज  को  दीपक बना लिया, तभी तो

मेरा आत्मा देह ग्रहण करके भी, अदेह विभा-सी जीता

 

उषा  की सजल गुलाबी किरणें जो धुलती थीं कभी

नीले अम्बर में,अब धुलती हुई मेघाडंबर में दीखती

वासना  की  मधुर  छाया  में, जो  स्वस्थ बल कभी

विश्राम करता था,सौन्दर्यता की प्रतिमा बनकर मेरे

हृदय  कुंज  में  रहा  करता  था, कब  हृदय  के  रुद्ध

कपाट  को  खोलकर  चला  गया, कह  गया  मैं  तो

अतिथि हूँ, मैं  ज्वलित बाड़वाग्नि, मैं नित्य अशांत

मैं नित नये - नये हृदय आकारों में घुसकर उसमें

भंगिमा, तरंगित  वर्तुलता  भरकर परिरंभ वेदना से

विभोर     कर    अंगों     को      करती    हूँ      क्लांत

 

 अब भी वही पवन हिलकोर उठाता आकर सागर जल में

प्रतिध्वनियाँ  भी  पहले  की  तरह ही उठतीं नभ थल में

अब  भी चूमकर मृत को जिलाती, जिंदगी भरती तन में

मेरे लिए तो एक कण भी आशा  का नहीं दीखता उसमें

धरा  तम  की  छाया से  निर्मित,  नीला आकाश दीखता

गरल से भरा हुआ ,अमरता की शीतलता विलीन हो गई

अम्बर से, जगती तल का सारा क्रंदन भर गया  नभ में

 

अब  तो  आँखें  देखती  कुछ , कानों  को  बताती   कुछ

नजरें  रहतीं  कहीं, मन बहता कहीं, ठीक नहीं अब कुछ

जो  बीत  गया  पल  उसे  पूर्व  जन्म  कहूँ,  या स्पृणीय

मधुर  अतीत  क्या  कहूँ,  कर नहीं पा रहा हूँ कुछ ठीक

सुरभि  समीप  रहकर  भी  अब  रहता  हूँ  इतना अधीर

कि  रक्त  सचार धमनियों में वेदना पहुँचाता , हृदय को

आती - जाती  धरकनें  लगतीं  भार  सी अग्निकीट  सा

जलता रहता हूँ मगर न आग दीखता, न उठता धुआँ ही

 

माँ की ममता

 माँ  मुझको  धरा   पर  छोडकर  आज  अकेला

तुम  तो  चली गई पिताश्री के पास , स्वर्ग को

अब  तो  तुम  नीचे, धरा पर उतर नहीं सकती

मैं आ रही हूँ स्वयं तुम्हारे पास, तुम वहीं रुको

 

तुमने  जो  लगाया  था  रंग-विरंगे  फूल  उद्यानों  में

कुछ तो शिशिर में झड़ गये,कुछ झुलस गये अरुण -

ताप  में, कुछ  मूर्च्छित  होकर, हैं  बचे हुए धरा पर

उस  पर आंचल  की  छाया  अब कौन करेगा सोचो

कौन  आँखों  से  बरसायेगी     हरियाली  ,कैसे  बचेगा

सृष्टि -   संताप   से   अब    वह जरा  तुम्हीं    कहो

 

माँ यह लोक-परीक्षा,मनुज के लिए बड़ा ही दारुण क्षण होता

 इसमें दृष्टि-ज्योति हत  , लक्ष्य-भ्रष्ट मन भाव-स्तब्ध निर्वाक

होकर  भू  पर  छायाएँ - सा चलता  , परागों से भरे फूलों का

मुख , अंगारे  से  भरा  कटोरे -  सा दीखता, सागर जल -  सा

दुख  हृदय - सिंधु   को    मथकर   फेनाकार    बना     देता

 

माँ तुम्हारी  ममता  की  घूँट जो  आज  तक  मुझको  जीवित

रखी थी ,अब वही ममता बन गई है मेरे कलेजे  को चीरनेवाली

तुम्हारी   पहलेवाली  ममता   कहाँ   गई   जो  मेरे  प्राण डोर  को

अपनी            पुतली        से        बाँधकर    रखा    करती     थी

इच्छाओं    की    मूर्तियाँ ,   जो   मेरे         मन   में   घूमती  थीं

उन्हें     उतारकर , धरा   पर,  मेरे  हाथॉं  में   पकड़ा    देती   थी

  

कल  गंगा  किनारे  बालुका  पर  जब तुम्हारा अंतिम संस्कार हुआ

मुझे  लगा  तुम  कह रही हो मुझसे, यही है जीवन का सच, तारा

आदमी का स्पर्श पत्थर की मूर्तियों में उतरकर हजारों साल  तक

जिन्दा    रहता  ,   मगर   खुद  आदमी   पानी  पड़ते   गल     जाता

मनुज   मुट्ठी   भर   सिकता   के   कण   पर    छितर  - छितरकर

मंद मंद   वायु   संग   उड़  जाता, इसलिए   पलों  को    मीचकर

मत   बंद   करो   लोचन , मेरी  ममता  तुम  पर  चौकसी    रखेगी

 

डरो  मत  रवि  की  किरणें , तुम्हारी  पलकों  को   भेदकर

तुम्हारी  आँखों  में  चुभन  नहीं पहुँचायेगीं,  ही  हवाएँ

तुम्हारे भौं के केशों को क्लेश पहुँचायेगीं  बस तुम अपने

हृदय  के  ज्वलित  अंगार  की जलन को  समेटे बैठी रहो

इसकी  दीप्ति   ही  तुम्हारे  जीवन  की   सुन्दरता    होग़ी

 

तुम नहीं जानती, चिंता रुधिर में जब खौलती है

तब  उससे उठे धुएँ से देह पर दाग पड़ जाते हैं

हूदय  की  चेतनाएँ  दो टूक हो जाती हैं, इसलिए

अपने  प्राण  में