रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 10, मार्च, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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बांग्ला कहानी

अचानक !

(बांग्ला से अनुवाद- गोविंद पाल)

 विमल मित्र

न दिनों बिलासपुर रेलवे स्टेशन इंस्टिटयूट में नेताजी के जन्म दिवस मनाने हेतु निर्देश मिला क्यालाघन साहब तब डी.टी.एस. बन चुके थे। डी.टी.एस. का मतलब बिलासपुर रेलवे का सर्वे-सर्वा अर्थात् सबसे बड़ा साहब। उस सर्कुलर के नीचे क्यालाघन साहब का बड़ा सा हस्ताक्षर साफ दिख रहा था । सर्कुलर को आफिस के सभी सेक्शनों में घूम-घूम नोट करवाया गया । रविवार शाम को मिटिंग बुलायी गयी । मिटिंग के अध्यक्ष स्वयं क्यालाघन साहब ही थे। क्यालाघन साहब का पूरा नाम व्ही. पी. क्यालाघन। पक्का एंग्लो इंडियन का बच्चा। जब धीमी आवाज़ में बुरी-बुरी गाली देता था तो ऐसा लगता था, इस आदमी को खून कर डालूं, सारी मुसीबत ही टल जाये।

 

क्यालाघन साहब डी.टी.एस. हमेशा से नही था। तब एंग्लो इंडियन लोगों के लिए स्पेशल रिफरेंस दिया जाता था जिससे नौकरी की शुरूआत में ही भारतीयों का सिरमौर बन जाता था । तुम्हें कामकाज आये चाहे न आये। जब तुम अंगरेज़ देवकुल में जन्म लिये हो तो इंडियन लोगों के वेतन के बराबर हकदार तुम नहीं हो सकते हो। इंडियन लोगों से पाँच गुणा ज्यादा तुम्हारा वेतन होना चाहिए।

 

यह ब्रिटिश शासन के अंतिम पड़ाव के दिन की कहानी थी। एकदम अंतिम समय का दौर था, जब हम लोग नौकरी में घुसे तब क्यालाघन साहब चीफ़ कन्ट्रोलर थे। लगभग पचास डिपुटी कन्ट्रोलर उनके अधिनस्थ थे।

 

काम भी उसी तरह । हम लोग क्लर्क नहीं थे । हमारी नौकरी क्लर्क की नौकरी नहीं थी। पूरी तरह परीक्षा पास होने के बाद कन्ट्रोलर पद पर नियुक्त हुए थे। सभ्य, भव्य एवं भद्र पुरुषों की तरह ऊँचे दर्जें की नौकरी । ट्रेनो की गतिविधियों को कन्ट्रोल करना हमारा काम था । उसके ऊपर उस समय ट्रेनों का आवागमन युद्ध काल के दौरान का था। अगर एक स्पेशल ट्रेन को छोड़ना हो तो हम सबका कालेजा धक-धक होता था । खड़गपुर की ओर से कोई स्पेशल ट्रेन  आ रही हो, जिसे बिलासपुर की ओर जाना है। जब तक वह ट्रेन हमारे इलाके में रहेगी तब तक क्यालाघन साहब की तीक्ष्ण दृष्टिरहती थी।

 

कहते थेवेरी केयरफुल ! एक मिनट अगर ट्रेन कहीं लेट हुआ तो मैं तुम लोगों पर जुर्माना लगाऊँगा। कहीं भी युद्ध चल रहा हो, चाहे वह जर्मनी हो, इंग्लैंड हो या फ्रांस ही क्यों न हो, या चाहे सिंगापुर ही हो । इंडिया से पेट्रोल, गोला बारूद, बम कमान के साथ-साथ आर्मी भी पहुँच रही है। एक मिनट अगर कहीं ट्रेन लेट हुई तो जैसे क्यालाघन साहब का अपना देश ही दूसरे के हाथ में चला जायेगा।

 

अपनी कुर्सी में बैठ कर क्यालाघन साहब कहता रहता थाहोपलेस होपलेस होपलेस, पीछे मुड़कर देखता हूँ कि क्यालाघन साहब अखबार पढ़ता रहता था और उसी शब्द को बड़-बडा़ता जाता था।

 

युद्ध में जैसे-जैसे अंगरेज़ों की एक-एक हार होती रहती थी और क्यालाघन साहब के सिर पर जैसे बिजली गिरती जाती थी। उस समय चीफ कन्ट्रोलर क्यालाघन साहब बड़ा स्वदेश भक्त था। जिस दिन फ्रांस का पतन हुआ। उस दिन उनका चेहरा लाल हो उठा। दिन भर क्षोभ, दुःख और अपमान से क्यालाघन साहब लंच तक नहीं लिये । सिर्फ गंभीर उदास होकर बैठे रहे। हम लोग आपस में कानाफुसी करने लगे कि लगता है जैसे साले का बाप मर गया हो । क्यालाघन साहब तब हँसना भी भूल चुका था। अंत में जब जापान युद्ध में उतरा तब क्यालाघन साहब जैसे रणचंडी मूर्ति धारण कर लिया हो, उस समय ट्रेनों का काम भी जितना बढ़ता जाता था, उतना ही क्यालाघन साहब का मिजाज भी कड़ा होता जाता था। उस समय तो पागल कुत्ते की तरह बेचैन हो उठते थे, कि किसे काटूँ।

 

तब लगभग पंद्रह बीस स्पेशल गाड़ियाँ असम की ओर जाने लगी थी। हम लोगों का नहाना, खाना दुभर हो गया था। किसी ट्रेन में गोला बारूद, किसी में आर्मी और किसी में पेट्रोल जाने लगा । लाल-लाल मुँह वाले गोरे सोल्जर आते थे। कुछ देर ट्रेन के रूकते ही प्लेट फार्म में उतर कर हो हल्ला मचने लगता था फिर जब चल देती थी तब जाकर कुछ देर के लिए शांति मिलती थी।

परन्तु क्यालाघन साहब का स्ट्रिक्ट आर्डर था, कि स्पेशल मिलिटरी गाड़ी लेट नहीं होनी चाहिए । मेरे बगल में रामाइया काम करता था । उसे खराब लगता था। वह हमेशा कहता रहता था, मै नौकरी छोड़ दूँगा भाई! इसके साथ नौकरी करना नहीं हो सकता ।

मैं पूछताक्यों, क्या हो गया ?

रामाइया कहता थारोज रोज का ये हर्जाना, और बर्दास्त नहीं हो सकता ।

सचमुच हर रोज फाइन की लिस्ट हमारे नाम निकल ही जाती थी। किसी को पाँच रूपये, किसी का दस रूपये । किसी-किसी के नाम तो बीस रूपये तक भी निकलता था । जबकि हम सब लोग जानते थे ये सब बिना किसी कारण के ।

 

जब युद्ध नहीं छिडा था तब तो कितनी ट्रेनें लेट होती थी। बहुत से कंट्रोलर से कई गलतियाँ भी हो जाती थी । पर उस समय क्यालाघन साहब इतना सिर नहीं खपाता था, पर किसी किसी को थोड़ा बहुत वार्निंग देकर छोड़ देता था। कंट्रोलर की नौकरी में उतना थोड़ा बहुत सहना तो पड़ता ही था। पाँच-सात रूपये फाइल होने पर खास फर्क नहीं पड़ता था। उसका कारण ये नौकरी ही ऐसी है। एक साथ पचास स्टेशन मास्टर फोन पकड़कर आदेश मांगते रहते थे, कि किस ट्रेन तो पहले निकालना है और किसे बाद में । कंट्रोलर अपने सामने रखे चार्ट देखकर आदेश देता है। उस आदेश में जरा सा भी चुक हुई कि नहीं समझो बम्बई मेल अटक गयी । फिर क्या, तब तक जैसे सारी पृथ्वी में भूचाल आ गया हो ।

 

इस नौक़री को जब हमने स्वीकार किया था तभी पता था ये बड़ा कठिन कार्य है। पर तब यह पता नहीं था कि काम चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो पर क्यालाघन साहब को खुश करके रखना उससे भी कठिन होगा। परंतु जापान जब एक एक करके सिंगापुर, वर्मा जीत लिया, उस समय क्यालाघन साहब का उछलकूद देखने लायक था, जैसे जापान अगर उनकी मुट्ठी में आ जाये तो उसे नोच डालेंगे । चर्चिल को तो देखा नहीं । फिर भी अगर चर्चिल हमारा चीफ कंट्रोलर होता तो वे भी शायद इस तरह से हम लोगों की ऐसी दुर्दशा नहीं करता । रमैया कहता थातो हम लोगों ने तेरा क्या बिगाड़ा भाई, युद्ध जापान ने किया और उसका गुस्सा हम लोगों पर क्यों उतारता है ?

 

केबिन के उस पार बसंत बैठता था। बसंत एकदम सीधा-सादा भद्र बंगाली बाबू था । पूरे स्टाफ या आफिस भर में हम दोनों ही बंगाली थे। बाक़ी अधिकतर मद्रासी, गुजराती और मराठी थे, हम लोग जब क्यालाघन के बारे में तरह-तरह की बाते किया करते थे तब बसंत चुपचाप सुनते हुए अपने काम में जुटा रहता था। उसे धमकाने से भी मुँह बंद करके सब कुछ बर्दास्त कर लेता था। मैं कभी-कभी उससे कहता था - तू कुछ कहता क्यों नहीं ? वो जो तुझे इतना गाली देता है तू कुछ बोल नहीं सकता है क्या ?

 

बसंत कहता था अरे छोड़ न उसकी बात । वो तो कुत्ता है, तो क्या मैं भी उसके साथ कुत्ता बन जाऊँ । बसंत का इस तरह चुपचाप गाली सुनते रहना मुझे अच्छा नहीं लगता था। अवश्य मैं यह भी समझ सकता था कि युद्ध के समय झगड़ा झंझट करना उचित नहीं है। उस दृष्टि से देखा जाये तो बसंत ठीक ही करता था। उस समय डिफेंस ऑफ इंडिया चालू हो चुका था। अगर कोई कुछ कहता है तो उसे उसी कानून के तहत अंगरेज़ सरकार जेल में डाल देता । हम लोग काम करते-करते अगर कुछ कहते भी थे तो ऐसे बोलते थे कि क्यालाघन साहब के कानों तक न पहुँचे । क्यालाघन का कान भी अद्भूत तरह का था, बांग्ला, गुजराती, मराठी,तमिल, तेलुगु कोई भाषा बोल नहीं सकता था । परंतु आश्चर्यजनक क्षमता यह थी कि वह सब कुछ समझ सकता था।

 

क्यालाघन सुबह नौ बजे आता था । अखबार में अगर हम देखते थे कि जर्मनी जीत रहा है तो हम लोग समझ जाते थे कि आफिस में आज महाभारत होने वाला है । और अगर कहीं देख लिया कि जापान कोई एक ओर देश जीत लिया है तब तो हमारी खैर नहीं । सभी का पाँच दस रूपये फाइन होना समझो निश्चित है । और वही होता था। ऐसे ही चल रहा था हमारा कंट्रोल आफिस।

 

अचानक खबर मिली कि नेता जी सुभाष बोस टोकियो रेडियो से भाषण दे रहे हैं, पूरे शहर भर में इसका खासा प्रभाव पड़ा। सब लोग गुपचुप सुभाष बोस के लेक्चर के बारे में आपस में चर्चा करने लगे। सभी लोग तभी से नेता जी के बारे में जान सके ।

चक्रधरपुर छोटा शहर । रेलवे कॉलोनी, रेलवे का हेड क्वाटर, रेलवे स्टाफ़ का निवास भी वहीं पर । परंतु अधिकांश एंग्लोइंडियन होने की वजह से खुलकर नेता जी के बारे में चर्चा करना या बोला सख़्त मना था । चुपचाप या छुप-छुप कर सभी टोकियो रेडियो लगाते थे । सभी इस आशा में उत्कंठित रहते थे कि सुभाष बोस अब इंडिया आ रहे हैं । अंगरेज़ों का राज अब नहीं रहेगा ।

 

सोचने एवं कल्पना करने से मन में एक आनंद का भाव महसूस होता था। उस समय की खुशी और उत्साह का अनुभव हम जिस तरह से महसूस करते थे उस समय की अनुभूति आज के युवाओं या बच्चों को समझायी नहीं जा सकती । बसंत ड्यूटी के बाद साधारणतः घर से कहीं नहीं निकलता था, न तो कहीं जाता था और न ही किसी से कोई बात करता था। परंतु उस दिन अचानक मेरे घर आ धमका । आते ही फुस फुसाते हुए कहने लगाक्या तू सुना है ?

मैंने कहा क्या ?

नेता जी का लेक्चर ?

मैंने कहा- नहीं ।

बसंत ने कहा मैं खुद अपने कानों से सुभाष बोस का लेक्चर सुना हूँ।

 

बसंत की खुशी देखने लायक थी। जिस बसंत को मैं हमेशा से चुपचाप मुंडी गड़ाकर काम करते देखा करता था। आज उस बसंत को अचानक इस तरह खुशी से उछलते देख बड़ा आश्चर्य हो रहा था। घर की ओर जाने लगा था। फिर पता नहीं क्या सोचकर दुबारा लौटा। कहादेख इस संबंध में  किसी से कुछ मत कहना ।

मैंने कहाअरे पागल हूँ क्या ? तू सोच रहा है कि पता नहीं कि सीआईडी अब रूप चल रहा है ? बसंत ने कहा नहीं वो बात नहीं । पर हमारे आफिस में बहुत सारे गुप्तचर है। गुप्तचर !

बसंत ने कहाहाँ ! जितने एंग्लो इंडियन है ना, सबके सब । वो जो नरिस, ओखवार्न, डड्, सभी गुप्तचर है, क्यालाघन सबको उसी काम के लिए रखा है।

 

इसके बाद वह एक पल वहाँ नहीं रूका । सीधे मुंडी नीचे करके घर की ओर चल दिया। बसंत और मैं लगभग एक ही दिन में नौकरी में नियुक्त हुए थे। एक ही दिन में नौकरी में आये तो जरूर थे परंतु बसंत के साथ कभी घनिष्ठता नहीं बढ़ी । दोनों बंगाली थे, इसलिए मैं उनसे मेल मिलाप बढ़ाना चाहता था। परंतु बसंत की ओर से कोई आग्रह न होने के कारण घनिष्ठता नहीं हो पाया ।

 

बसंत एकदम टाइम टू टाइम आफिस आता था और अपने काम में मगन हो जाता था । काम भी एकदम सटीक रूप में खत्म करके घर चल देता था । उसके आफिस के कामकाज में कही कोई त्रुटिन  होने के कारण क्यालाघन साहब उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाता था। परंतु फाइन जिस तरह सबका होता था। बसंत का भी होता था। वो तो नियम है, कानून है। कन्ट्रोलर के काम करने वालों में आज तक शायद इतिहास में ऐसा कोई कंट्रोलर पैदा नहीं हुआ जो फाइन नहीं दिया हो । खैर वो जो भी हो, उस दिन आफिस आकर देखता हूँ कि क्यालाघन एकदम आगबगुला, समझ गये कि सुभाष बोस का खबर क्यालाघन तक पहुँच चुका है। साहब गुस्से में अपने आप में बड़बड़ा रहा है। एक बार बातों में कहने लगा सुभाष बोस का जात ही बास्टर्ड का जात है।

 

मैं बसंत की ओर देखा। बंसत निर्विवाद अपने काम पर जुटे रहे । जैसे उसके कान तक वह बात पहुँची ही न हो। इसी तरह आये दिन ऐसे ही चलने लगा। साले बंगाली जात ही नीच होते है। अनग्रेफुल । ब्रिटिश सरकार उन्हें पाल पोस रहा है और वही नमकहराम की जात ब्रिटिश गवर्मेन्ट को ही फंसा रहा है। ये बात पूरे आफिस भर के लोग सुनते रहते है, पर कोई कुछ भी विरोध नहीं कर रहे हैं। और इसका विरोध करेगा भी कौन? बंगालियों को गाली दे रहा, इससे किसका क्या आता जाता है ? मैं बसंत की ओर देखने लगा। देखा बसंत गर्दन झुकाकर, अपने काम में मगन है। जैसे उसके कान जूं नहीं रेंग रहा है।

 

मैं बहुत देर से उन बातों को सुन रहा था। परंतु हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था, कुछ कहने को, हमारा शिक्षा-दीक्षा और संस्कारों ने ही हमें कायर बना दिया है। हम गाली खायेंगे, मार खायेंगे, पर गाली नहीं दे सकते है। बंकिमचंद्र के लेख में हम पढ़े है कि--तुम भले ही नीच क्यों न हो पर हम क्यों नहीं अच्छा बनेंगे ? हम सब वही शिक्षा लेकर बड़े हुए है। उस दिन छुट्टी के बाद सारे अपमान का बोझ सिर पर लाद कर घर पहुँच कर दीवार की आढ़ में मुँह छिपा लिया। सोचा एक बार बसंत के घर जाऊँ, उसे जाकर सब कुछ बता दूँ । पर, बाद में सोचा कि इसमें बहुत खतरा है, कारण कि, रेलवे क्वाटर में हम लोग रहते है। आजू-बाजू सटा हुआ घर। एक की खबर दूसरे को जानने मे कोई असुविधा नहीं थी । कौन किससे मेल मिलाप कर रहा है कौन कब क्या-क्या खाता है। किसी से कुछ छुपा नहीं । कोई एक सिल्क का शर्ट पहन लिया तो दूसरे की आंख में चढ़ जाता है। इसी तरह की दुनिया में हम तब रह रहे थे। उस समय के दौरान क्यालाघन की इतनी गालीगलौच के बाद दूसरे दिन बसंत के घर अगर गया तो, जरूर यह बात साहब के कान तक पहुँचेगी । उसी डर से उस दिन बसंत के घर नहीं गया। दूसरे दिन आफिस में फिर वही क्यालाघन का गाली- गलौच । देखा किरमाइया, देशाई वे सब गर्दन झुकाकर काम कर रहे है। नोरिस, डड्, ओखमैन वे सब हंसी मजाक में मगन थे।

 

मिलिटरी की स्पेशल ट्रेन एक के बाद एक नागपुर से छोड़ी जा रही है और मनीपुर की ओर रवाना हो रहा है । गोला बाबूद, बम और सोल्जर के साथ-साथ एम्बुलेंश स्पेशल भी चल रही थी। आफिस के काम में कोई नागा नहीं। जापानी कलकत्ता में बम गिराकर गये है। चारों ओर बहुत नाजुक स्थिति है।

 

हमारी परेशानी का कोई अंत नहीं । एक तो काम का दबाव, ऊपर से इतनी सारी स्पेशल ट्रेनें । सबकी आँख उस वक्त मनीपुर की ओर थी। हम कहते थेमनीपुर स्पेशश, हमें जानकारी थी कि जापानी सोल्जर मनीपुर से होकर इंडिया में घुसने का प्रयास कर रहे हैं। परंतु वह नेताजी सुभाष बोस की आर्मी थी, ये हमें जानकारी होने नहीं दिया । और हम उन्हीं नेताजी को हटाने के लिए जी जान लगाकर मिलिटरी स्पेशन भेजते रहे । एक मिनट कहीं ट्रेन लेट हुआ नहीं कि कंट्रोलर को फाइन लगाया और सजा दिया । और सबसे ऊपर तो क्यालाघन का बंगालियों को गाली गलौच करना ।

 

साले बंगाली बास्टर्ड, आल बास्टर्ड । रमाईया, देशाई, सुब्रमणियम उन्हें भी बुरा लग रहा था, पर हमारे जैसे उतना नहीं । हम केवल दो ही बंगाली थे। मानो इन सबके लिए हम ही दोषी है। मेरा सर अपमान से गड़ा जा रहा था। फिर भी मैं चुप रहा । परंतु अचानक पीछे की ओर एक हल्ला उठा । बसंत अपनी कुर्सी को दोनों हाथों से उठाकर क्यालाघन के सर पर पूरी ताकत से दे मारा और क्यालाघन देखते-देखते ज़मीन पर लेट गया । उसके सिर से खून की फौव्वारा फूटने लगा। परंतु बसंत के सिर पर तब भी खून सवार था ।

 

चीखने लगा--और बोलेगा तू ? और बंगालयों को गाली देगा ? बोल देगा और गाली ? बोल रहा था और क्यालाघन के सिर पर कुर्सी को जोर-जोर से ठोक रहा था । हम लोग सब अपना अपना काम छोड़कर उस ओर भागे । मुझे डर होने लगा । ऐसा लग रहा था कि बसंत ये क्या कर रहा है ? अभी तो उसका खुद का ही सर्वनाश हो जायेगा । मैं बसंत के हाथ दबोचने गया । कहा- ये तू क्या कर रहा है ?

 

बसंत उल्टे मुझे मारने दौड़ा। बोला--तू चुप रह । तू भी तो बंगाली है ? क्या तेरे शरीर में बंगालियों का खून नहीं है ? क्या तू भी सुभाष बोस की जात का नहीं है ? अगर तू सच्चे बंगाली का बच्चा है तो तू अपनी कुर्सी उठाकर ले आ और मार इस साले को । देखता हूँ कौन इसे बचा पाता है । रमाईया, देशाई, सुब्रमणियम वे लोग भी बसंत को थोड़ा बहुत समझाने गये था, परंतु उसका गुस्सैल चेहरा देखकर कोई कुछ कहने का साहस नहीं कर पाये।

 

बसंत तब तक एंग्लो इंडियन लोगों की ओर देखकर कहने लगे - आ ! एंग्लो इंडियन के बच्चे आजा ! आज तुम लोगों को दिखा देता हूँ । बंगालियों के शरीर में कितनी ताकत है। आ ! सामने आ, दिखा देता हूँ।

नोरिस, डड्, ओखमैन जो लोग क्यालाघन को बचाने के लिए आगे आ रहे थे, बसंत के मुँह की भाषा सुनकर एवं उसका हाव-भाव देखकर पीछे हट गये । बसंत उन लोगों की ओर से कोई विरोध करते न देख तब पुनः क्यालाघन के मुँह के पास अपना चेहरा झुकाकर कहने लगा और देगा सुभाष बोस को गाली ? और बंगालियों को बास्टर्ड बोलेगा?

 

इसके बाद अपना एक पैर क्यालाघन के मुँह के ऊपर उठाकर कहने लगाये छू कर बोल और कभी सुभाष बोस को गाली नहीं देगा । छू, पैर छू ।

 

ठीक उसी समय एक अपघटना घट गई । एक एंग्लो इंडियन चुपचाप शायद दूसरे कमरे से जी.आर.पी.एफ को टेलिफोन कर दिया था। खबर मिलते ही वे सब स्टेशन की ओर दौड़ आये । एक झूंड आर्म पुलिस।

 

वे उस हाल में आफिस में घुसकर वह दृश्य देखकर बसंत की गर्दन पकड़कर उसे बेंत से पीटने लगे । पीटते-पीटते एकदम ज़मीन पर सुला दिया । हमारी आँखों के सामने सारी घटनाएं जैसे किसी सिनेमा की घटना की तरह घट गयी। हम लोग सब वहीं खड़े-खड़े देखने लगे कि बसंत उन लोगों की लाठी की मार खाकर अचेत होकर ज़मीन पर गिरकर घिंघियाने लगा। पर उस हालत में भी उसने एक बार भी क्षमा नहीं मांगा।

 

जब उससे पूछा गया कि तुम मिस्टर क्यालाघन को क्यों मारे हो ? तब भी वह बार-बार एक ही रट लगा रहा था, अच्छा किया मारा हूँ। और मारूँगा। इसके बाद एम्बुलेंस आकर क्यालाघन को स्ट्रेचर में उठाकर हास्पिटल ले जाकर भर्ती करा दिया । और पुलिस बसंत को पकड़ कर ले गई, और पता नहीं कहाँ रख दिया जिसका कभी पता ही नहीं चल पाया । तब युद्ध का समय था । पूरी तरह डिफेंस अब इंडिया रूल चल रहा था। किसी को जरा सा भी मुँह खोलने की हिम्मत नहीं थी । मुझे बहुत दिनों तक बसंत की याद आती रही । बसंत के बूढ़े माँ बाप को भी बसंत के बारे में कुछ पता नहीं चल पाया था। हमें भी नहीं । एक दिन वे लोग रेलवे क्वाटर खाली करके देश चले गये । किसी को बसंत की कोई खबर नहीं मिली । आज तक वह उसी तरह लापता रह गया ।

 

इसके बाद भारत स्वाधीन हुआ । बहुत कुछ बदल गया ।सुभाष बोस नेता जी बनकर लोगों के मन मंदिर में देवता के रूप में बस कर अजर-अमर हो गये । और वह क्यालाघन साहब ? मैं जब बिलासपुर में नौकरी कर रहा था तब वहीं क्यालाघन लगातार प्रमोशन पाकर वहाँ का डी.टी.एस. बनकर आ गये ।

 

तब 1948 का सन् था । उस समय कलकत्ता के हैड आफिस से रेलवे स्टाफों के लिए निर्देश आया कि नेताजी का जन्मदिवस मनाना होगा । रेल्वे इंस्टीट्यूट प्लेट फार्म के बगल में ही है।