रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 10, मार्च, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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कहानी

दायित्व का एहसास

श्यामली जब अपने सास-श्वसुर के यहाँ से लौटकर पति के साथ अपने क्वार्टर पर आई, तो घण्टों तक वह सोचती रही, क्या उसका जीवन, उसी गिरधारी नौकर की तरह बीत जाएगा, जो पूरे परिवार के लिए, हर समय आज्ञा मानने के लिए, एक पैर पर खड़ा रहता है। क्या आज वह स्वयं गिरधारी हो गयी है ? सुपर्णा चिल्लाई, माँ मेरा फ्रॉक कहाँ है ?’

 

आ रही हूँ, तो देती हूँ !’ उसे धुले हुए फ्राक देती है। फिर वह अपने साल भर के भूखे रोते बच्चे को, जल्दी-जल्दी गर्म पानी कर, दूध घोलकर पिलाती है। इस समय तक, उसकी नीता बेटी सोई हुई थी और उसे तैयार कर स्कूल भेजना था। इसलिए उसे उठाकर उसने बाथरूम भेजा। फिर व्रश में पेस्ट लगाकर, उसे मुँह धुलाया । जल्दी-जल्दी खाना खिलाकर और स्कूल ड्रेस पहनाकर स्कूल छोड़ आई । इधर उसका पति हरीश बाथरूम से चिल्ला रहा था, श्यामली तौलिया, गंजी देना !’ तब उसे तौलिया गंजी दी। फिर हरीश बाथरूम से बाहर आकर अपने ऑफिस जाने के लिए तैयार होने लगा। हरीश के तैयार होते ही, श्यामली ने फटाफट थाली परोसकर टेवुल पर खाना लगा दिया और रोटी सेंक-सेंक कर, उसे खाना खिलाने लगी ! इसके बाद वह, उसके जूतों में जल्दी-जल्दी पॉलिस कर, उसे ऑफिस विदा किया। फिर वह स्वयं जल्दी-जल्दी बाथरूम से स्नान कर निकली और सब काम कर, बारह बजे खाना खाया । गन्दे बर्त्तन एवं कपड़ों को इकठ्ठा कर उसे साफ किया । डेढ़ बज जाने पर, नीता का टिफिन तैयार कर स्कूल गयी । वहाँ खेल रही नीता को पकड़कर, जल्दी-जल्दी नास्ता कराया और सब्जी आदि खरीदकर घर लौटी । तब उसने सोच, बाहर पढ़ रही दोनों बेटियों को कई दिनों से चाह कर भी पत्र नहीं लिखा है, जबकि इस बोच उसके दो-दो पत्र आ गए थे. न जाने समय कैसे पंख लगाकर उड़ जाता है, पता ही नहीं चलता। इसलिए आज वह अपने मन में दृढ़ निश्चय कर, चिट्ठी लिखने बैठी। चिट्ठी खत्म होत-होते नीता स्कूल से आ गयी थी। दरवाजा खोलने में, मात्र थोड़ी सी देर ही हुई थी, जिस कारण उसने घण्टी बजा-बजा कर उसे परेशान कर दिया था !

 

ममी तुम क्या कर रही थी, इतनी देर से ?’

तुम्हारी दीदी के पास चिट्ठी लिख रही थी।

अच्छा क्या लिखा है, दीदी को ?’ हमारे विषय में कुछ लिखा कि नहीं ? वह वह तुम्हें बहुत याद करती है। तुम्हारे जन्म दिन पर, हमने कार्ड भेजा था, वह मिला कि नहीं ? न जाने नीता, कितनी बात उससे कहती रही और श्यामली सिर्फ हाँ, हूँ करती रही। फिर उसने जल्दी-जल्दी ड्रेस उतार कर, मुँह हाथ धोकर, मास्टर साहेब का होमवर्क बनाने के लिए उसे पास बैठा लिया । थोड़ी देर के बाद, उसके मास्टर साहेब आ गए थे। जिनसे वह बढ़ने लगी।

 

मास्टर साहेब के आने के बाद, श्यामली निश्चिंत हो गयी, क्योंकि उसे अब पूरे एक घण्टे की छुट्टी मिल गयी थी। जिस कारण सोचते-सोचते वह अपने श्वसुर के घर के वातावरण में डूब गयी ती। गिरधारी स्नान करने के लिए, गर्म पानी हो गया ’?

नहीं अभी कर देते है ?’

ठीक है, जल्दी कर दो ! वह बाथरूम जाते-जाते, यह भी कहती गयी कि वऊआ के लिए भी गर्म पानी कर दो । वह भूखे बहुत रो रहा है। उस समय वह सबके लिए, खाना बना रहा था। उसे छोड़कर, जल्दी-जल्दी पानी, गर्म कर बोतल में दूध घोलकर, बच्चे के हाथ में पकड़ा दिया । साथ ही श्यामली के लिए उसने गर्म पानी, बाथरूम में रख दिया. तब थोड़ी देर में स्नान कर बाथरूम से बाहर निकलते ही, वह चिल्ला पड़ी, गिरधारी खाना तैयार हो गया?’

हाँ भाभी जी, खाना तैयार हो गया है। क्या काढ़ दूं ?’

हाँ, हाँ, काढ़ दो न !’ थोड़ी देर में उसे गर्मा-गर्म खाना परोसा हुआ मिला। तब वह अपने सारे बच्चों के साथ, खाना खाती है और फिर श्वसुर जी के ऑफिस जाने के बाद, वह आराम से सो जाती है। जब शाम को वह उठती है तो उस समय उसका मूड एक दम फ्रेश रहता है। फिर वह टेलिविजन खोल कर, गिरधारी से अपनी मनपंसद खाने की चीजों की, फरमाइश करती रहती। इस बीच उसके सास-श्वसुर भी गिरधारी को बुला-बुला कर काम लेते रहते हैं। गिरधारी दौड़-दौड़ कर, सवों का काम करता रहता है। इसी दरम्यान गिरधारी बाजार से सौदे लाता, शरीर थक जाने पर स्वसुर-देवर का बदन भी दवाता, खाना बनाता एवं तीज-त्योहार आदि में जमकर काम करता। इसका नित्य दिन का यही काम ता । कभी-कभी इस बीच, उससे गलती हो जाती हो, वह डाँट भी सुन जाता। जिससे उसे काफी दुःख होता । उस समय वह सोचता कि मैं दिन-रात एक पैर पर खड़ा रहता हूँ, फिर भी मुझे डाँट सुनने को मिलती है। लेकिन थोड़ी देर के बाद ही, वह सारे दुख और गम को भूलकर हँसता हुआ दिखलाई पड़ता है। इस तरह उसे काम करते-करते, रात बारह-एक बज जाता है ! इस बीच कभी कोई मेहमान वहाँ पहुँच जाता, तो काम करते-करते रात के दो-तीन बज जाते । फिर सुबह उनके बेड-टी के लिए, पाँच छह बजे उठ जाना भी पड़ता । इसके बाद सारे मेहमानों के खातिर-स्वागत के लिए, जी तोड़ परिश्रम कर काम करता । लेकिन अपने रिलैक्स के लिए, वह अपनी मन पसन्द सिनेमा भी देख आता । यही नहीं होली, दुर्गा पूजा, दीवाली जैसे अवसरों पर वह घर भी चला जाता और वहाँ जाकर मजा लूटता, पर मैं, ?मेरे जीवन में छुट्टी कहाँ ? अरे मैं तो धोबी की बेटी तरह हूँ, जिसे ससुराल और नैहर दोनों जगह ग्राहकों के कपढ़े धोने पड़ते हैं। उसे बैठकर, खाना नसीब ही नहीं होता। उसी प्रकार मेरा जीवन भी हो गया है ! तभी नीता के मास्टर साहेब, उसे पढ़ाकर जा चुके थे और वह उससे नास्ता माँग रही थी। जिस कारण श्यामली के सोचने का क्रम टूटता है ?......

देती हूँ !’ यह कह कर उसने अपने बनाए हुए निमकी और खजुरिया उसे नास्ता में दिया । फिर वह नास्ता लेकर, खेलने लगी और श्यामली खुद रात का खाना बनाने के लिए, सब्जी आदि काटने लगी ।

 

श्यामली कभी सोचती, उसके जीवन का कोई औचित्य नहीं है ? क्या वह इसी सब में मर खप कर रह जाएगी ? क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं ? क्या औरत का जीवन कुछ नहीं होता है ? काश, मैं खूब पढ़ कर, अपने पैरों पर खड़ी होती ? तब मैं शादी करती । जिससे परिवार और समाज में मेरा कोई वजूद होता, कोई स्थान होता। तभी मेरे जीने की कोई सार्थकता होती ? अचानक उसके सोचते-सोचते, सब्जी काटने वाली चाकू से, उसकी अगुँली कट गई। खून टप-टप कर गिरने लगा । सहसा खून देखकर, वह ऊपर से लेकर नीचे तक सिहर गयी । फिर उसने उस पर, रूई से डिटॉस लगाया और टीसते हुए दर्द को सहकर भी, पूरी सब्जी को काटा और खाना पकाया। वह खाना नहीं बनाती तो परिवार के सारे लोगों को भूखे ही सोना पड़ता। इसलिए खाना बनाना उसकी मजबूरी थी।

 

 वह किचन से निकलकर टी.वी के पास बैठी तब तक हरीश भी आ गया । थोड़ी देर तक वह चाय नास्ता कर, अपने परिवार के साथ टी.वी. देखता है। फिर एकाएक वह उठकर, अपने दफ़्तर से बचे हुए, लाये काम को करने, अपने रूम में चला जाता है। यह देख कर श्यामली को काफी दुःख होता है।वह सोचती है सबको केवल मेरा काम ही प्यारा है। मैं रो रही हूँ या हँस रही हूँ, इससे किसी को कोई मतलब नहीं ? इस बीच, कभी सास-श्वसुर उसके घर आ जाते हैं, उस समय कभी उसके काम न करने पर, पूरे घर में एक चर्चा का विषय बन जाता है जबकि इस समय वह अपने बुखार में सिरदर्द  अथवा पेट दर्द से पीड़ित रहती है। तभी तो वह काम नहीं करती है ? इस समय उसे डाक्टर-वैद्य से दिखाना तो दूर, उसके दर्द और पीड़ा को कोई समझने वाला भी नहीं होता है ? इतना होने के बावजूद, वह खुद अपने बच्चों की अगर देख-रेख नहीं करती है, तो उसके बच्चे न स्कूल जा पाएँगे और न उन्हें समय पर खाना मिलेगा ? इस समय उसकी ननद एवं सास भी, लोगों से कहती-फिरती है, वह दिन भर आराम करना चाहती है । इसलिए घर के काम से कोई वास्ता नहीं रखती ! चाहे घर का कितना भी काम क्यों न पड़ा हो, उससे उसको कोईमतलब नहीं ? ...तब तक नीता, श्यामली के पास स्कूल का होमवर्क पूरा करने बैठ गयी, जिससे उसके सोचने का क्रम टूट गया । नीता, को पढ़ाने के वाद उसने उसे खाना खाकर खिलाया सो गयी । लेकिन मानसिक और शारीरिक थकान के वाद भी, नींद गदे्दार बिछावन पर नहीं आ रही थी। तब रहरह कर, वह अपने जीवन के बारे में सोचने लगी थी। थोड़ी देर के बाद, हरीश बेडरूम में आकर, उसे खाना लगाने के लिए कहा । वह यह सुनकर कसमसा गयी, फिर भी हरीश की खातिर खाना गर्म कर उसे खिलाया । तब दोनों बिछावन पर आकर सो गए । जहाँ हरीश थोड़ी देर के बाद ही गहरी नींद में डूब गया था। तब श्यमली उसके चेहरे को देख-देख कर, गिरधारी के जीवन से पुनः अपने जीवन की तुलना करने लगी । जिस तरह से गिरधारी के जीवन से हम लोगों को कोई मतलब है उसी तरह से, हमारे जीवन से भी, लोगों को कोई मतलब नहीं है-सिर्फ मेरे काम से लोगों को मतलब है। इस बीच घंटों तक, वह इसी तरह अपने और गिरधारी के बीच सामंजस्य बैठाते-बैठाते गहरी नींद में सो गयी

 

दूसरे दिन भी श्यामली का वही दिनचर्या  रहती । बच्चे को उठाना, उसे तैयार करना, स्कूल भेजना, पति को तैयार कर खाना देना एवं घर के अन्य काम में जूट जाना ! वह सुबह पाँच बजे नित्य दिन उठती और खाते-पीते-सोते रात बारह बजा देती । इसी तरह की दिनचर्या को करते-करते, उसने अपने वैवाहिक जीवन के आज, तीस साल गुजार दिए थे। आज तो उसके बाल भी सफेद हो गए थे । चेहरे पर झर्रियों का बादल घिर आया था । तभी एक दिन हरीश ने उसे अपने बाहों में लेते हुए बड़े प्यार से कहा,  'श्यामली आज मैं जहाँ हूँ, इसके पीछे तुम्हारा हाथ है ! नहीं तो मैं एक टाइपिस्ट से जनरल मैनेजर कभी नहीं होता ? यह सब सिर्फ तुम्हारे त्याग और परिश्रम के कारण ही संभव हो सका है। इसके अलावा नीता बेटी डाक्टरी मीता और सुपर्णा इन्जिनियरिंग पढ़ रही है और अब बेटा मेडिकल में जाने की तैयारी कर रहा है। यह सब तुम्हारे अथक प्रयास के कारण ही हुआ है। इस कारण सच कहो तो, मैं तुम्हारा बड़ा अहसानमंद हूँ । नहीं तो आज मेरा सारा परिवार इधर-उधर बिखर जाता।

एहसान की क्या बात है ? यह तो मेरा फर्ज और धर्म था।फिर यह मेरा भी तो परिवार है, यानी हम दोनों का !’

सो तो ठीक कह रही हो लेकिन इसके लिए तुमने बड़ा ही परिश्रम किया है। तुमने दिन-रात एक कर, इस दोनों का !’

स-बस, अब मैं कुछ भी सुनना पसन्द नहीं करूँगी !’ उसने प्यार से हरीश के मुँह पर हाथ रख दिया ।

 

अचानक हरीश की इन सारी बातों को सुनकर, श्यामली का हृदय गद-गद हो उठा। उसका रोम-रोम खिल उठा । आज उसके हृदय में, इतनी ठंडक महसूस हो रही थी जैसे-आज उसकी ज़िन्दगी की सारी तपस्या सफल हो गयी हो ! इसलिए अब वह सोचती है मेरा जीवन जीना व्यर्थ नहीं गया । वैसे भी अपने परिवार की परवरिश करना स्त्री का पहला नैतिक कर्त्तव्य होता है। फिर औरत अपने परिवार को छोड़कर,सर्फ अपने लिए जीए, यह भी तो ठीक नहीं ? क्योंकि वह होती ही है, परिवार का एक महत्वपूर्ण अंग ! जो पूरे परिवार को सींच कर, उसे एक अच्छे मुकाम पर लाकर खड़ा कर देती है। सच कहिए तो उसकी गोद में एक बच्चा नहीं एक राष्ट्र पलता है। यह सब सोचते-सोचते आज की रात, उसे काफी सुखद और शान्ति भरी नींद आयी । दूसरे दिन, वह खूब जोश-खरोश से, अपने परिवार को सींचने में जुट गयी ।

डॉ. सूरज मृदुल

 

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, संजीव ठाकुर, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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