कॉकटेल
बहुत
बारिश हो रही थी। कार से निकलते ही दौड़कर मैं
लॉज में आ गया और बालों को झटक कर पानी हटाने लगा। कमीज
भीग कर बदन से चिपक गई थी
और सारा बदन नुमायां हो रहा था। कल्पना में एकाएक मेरी-सी
हालत में भीगी लड़की की
तस्वीर कौंध गई। ठीक मेरी-सी भीगी। ठीक मेरे-से भीग कर
चिपके कपड़ों में। ठीक मुझ-सी
नुमांया। रोमांच की एक तीखी लहर सिर से उठकर पूरे बदन में
दौड़ गई और पंजों के
रास्ते जमीन में समा गई। मैं मुस्कुरा दिया। मैं सबसे पहले
आया था,
मेजबान जो ठहरा।
मैंने एक हाथ से पीछे वाले जेब में अपना पर्स सम्हाला और
निश्चिन्त होकर,
लोगों की
राह देखने की बजाए सीधा बार में चला गया।
धीरे-धीरे लोग आना शुरु हो गए।
सबसे पहले कुंदन आया। दुबला पतला सिंगल स्टेपनी कुंदन पीने
के मामले में
'बेवड़ा'
था। कहीं और बेशक लेट हो जाये पर पीने के ठिकाने पर हमेशा
'बिफोर'।
उसके बाद राजेश,
आशीष,
श्रवण,
सप्तेश आदि सारे पियक्कड़,
एक एक कर आते रहे मैं वहाँ कोने की मेज पर
एक लाइट पैग लिये बैठा था और लोगों के इन्तजार में ऑंखे
मूँदे मेहंदी हसन की भारी
भरकम आवाज में
'रंजिश
ही सही,
दिल ही दुखाने के लिए आ...'
सुनकर होले होले झूम रहा
था। एकाएक बार में दाखिल हुए शोर के झौंके ने मुझको हिलाया,
ऑंख पट् से खुलीं और
मैं लपक कर सबसे गले मिला। हमप्याला लोग सबसे गहरे दोस्त
होते हैं। यहाँ का मंजर
देखकर कोई भी यह ब्रह्मसत्य जान सकता था। सबसे पहले
'पीने'
का प्रायोजन बताया गया।
एक कुर्सी पर चढकर श्रवण बोलने लगा,
'ऐ!
सुनो बेवड़ों। सालों अभी तुम होश में हो,
काम की बात सुनो। ये दारू पार्टी हमारे यार रौनक के घर की
रौनक बढ़ाने की खुशी में
सामूहिक चंदे से आयोजित की गई है। भाई रौनक के घर में छोटा
रौनक आया है। सब मिलकर
बधाई दो।'
सभी मेरी ओर लपक पड़े और चारों तरफ से
'बधाई',
'बधाई',
'बधाई'
गूँजने लगा। मैं थैंक्यू,
थैंक्यू,
थैंक्यू,
करता रहा। अचानक श्रवण फिर मुखर हो
उठा,
'अबे
सालों सारी रात बधाई ही देते रहोगे तो इस
'लुगाई'
को कौन चखेगा।'
उसने
हाथ में पकड़ी बोतल की ओर ईशारा किया। सभी भूखे भेडियों की
तरह उस
'लुगाई'
की तरफ
लपक पड़े। बोतलें खुलने लगी। कहीं बीयर,
कहीं रम,
कहीं विह्स्की,
कहीं जिन...। सभी
के हाथ में पैग था। किसी-किसी के हाथ में सिगरेट भी सुलग
रही थी। सबके सामने
तश्तरियों में भुजिया,
मूंगफली के दाने,
कटी हुई प्याज और पनीर कबाब पड़े हुए थे।
मेरे घर की रौनक बढ़ने का जश्न जोरों पर था। मुझे आज जेब के
अच्छा खासा हल्का हो
जाने का अनुमान हो चुका था। मैं मुस्कुरा दिया।
'रौनक
एक बात बता यार तेरी शादी
को तीन साल हो गए,
लौंडा तूने अब जाकर पैदा किया। अब तक क्या यूँ ही खाट तोड
रहा
था?'
राजेश दो पैग के बाद ही औकात पर आ गया।
'दोस्त
शादी हुई है तो बच्चे तो
होंगे ही। करने पडेंगे। पितृऋण से उऋण जो होना है। हाँ,
तसल्ली से कुछ साल हँस
खेलने के बाद करो तो जी को जरा सुकून रहता है...'
मैं जल्दी में नहीं था,
धीरे-धीरे
सिप कर रहा था। पहला ही पैग था।
'तीन
साल तक कैसे
'कंट्रोल'
किया?'
'साईंस
का जमाना है यार! ढेरों गोलियाँ पड़ी हैं मार्केट में। कोई
भी एक
चुन लो बस।'
'अब
साले गोली तो चुन लो,
पर कई बार गोलियाँ धरी रह जाती हैं। पिछले
महीने दीपक बता रहा था। सावधानी रखते रखते साला
'चूक'
गया। पूरे तीन हजार ठुक गए
भाई के। खाया पीया कुछ नहीं,
गिलास तोड़ा-बारह आना।'
'कहीं
किसी रोज गोली खाना
चूक जाओ तो यही होता है...'
मैंने बड़ा-सा घूँट भरते हुए कहा।
'अच्छा
एक बात बता।
शादी से पहले कितनियों को चटकाया तूने।'
राजेश ने एक लम्बा कश खींचते हुए
पूछा।
'शादी
से पहले से क्या मतलब है तेरा?
बंदा अब भी
'जोशीला'
है। जहाँ
देखी नारी,
वहीं ऑंख मारी ...'
मैं ठहाका मार कर हँसा,
राजेश भी।
'नहीं
सही
बता,
फिर मैं बताऊंगा।'
राजेश तरंग में था।
'ये
ही कोई दस-ग्यारह,
बस'
मैंने जरा
सोचते हुए अदांजन बताया।
'साले
इसको बस कहता है। फिर ट्रेन,
ट्राम,
जहाज क्या
होगा?
पूरे हिन्दुस्तान का ठेका छुड़ा लेगा क्या?
आशीष जोर से चिल्लाया। सारे बेवड़ों
ने एक साथ जोर का ठहाका लगाया। ठहाकों से एक बारगी बार में
भरा सिगरेट का धुँआ सहम
गया।
उपस्थित लोगों की शकलें,
सूरतें,
बातें,
ठहाके आदि देखकर कोई भी यह
नहीं कह सकता था कि यहाँ शहर के नामी गिरामी लोगों की
पार्टी चल रही है। सभी अलमस्त
और मदहोश हुए जा रहे थे। राजेश डाक्टर था,
आशीष एडवोकेट,
श्रवण सीए,
सप्तेश ब्रोकर,
मैं प्रोफेसर। कहने का मतलब समाज के हर प्रतिष्ठित पेशे का
प्रतिनिधि इस
'दारू-सभा'
में था। दिनभर की भागदौड़ से थककर चूर हो गए सभी
'प्रोफेशनल्स'
शाम को पूरा
'एन्जॉय'
करने के मूड़ में थे।
'चलो
अब मैं बताता हूँ। ये साला झूठ बोलता है।
दस-ग्यारह लडकियाँ छोड़ो,
गली की कुतिया ने भी इसकी तरफ आज तक ऑंख नहीं मारी होगी।
एक लडकी गलतफहमी का शिकार हो गई थी। टयूशन पढने आती थी,
फँस गई बेचारी आज इसके
बच्चे की माँ है ...। बाकी सब साला फेंकता है। उस भोली
लडकी,
सॉरी,
उस आदरणीया भाभी
के अलावा साले की तरफ कोई नहीं देखता ... अलबत्ता हमने
जरूर कईयों को प्रेगनेन्ट
किया है अपनी कमीनी जिन्दगी में ...'
राजेश झौंक में बोलता चला जा रहा था।
'दो
चार के नाम तो बता ...'
कुंदन ने हाँक लगाई।
'लीना,
मीना,
टीना,
जीना,
पीना,
पसीना,
नगीना ... और ना जाने कितने
'ना'...।
'भाभी
का नाम भूल गया डाक्टर -
बीना। संतोष ने आगे बढ़कर जोर से कहा। सब एक साथ ठहाका मार
के हँस पड़े।
अचानक
मेरी नजर दूर कोने में बैठे साहिल की तरफ पड़ी। साहिल एम
कॉम,
फाईनल ईयर का
स्टूटेण्ड है,
कविता लिखने का शौकीन है। गाहे बगाहे मेरे यहाँ कविता ठीक
कराने आता
था। इस नाते मेरा मित्र हो गया था। मैंने जब उससे
पीने-पिलाने के बारे में पूछा,
पहले तो ना-नुकुर करता रहा उसके बाद
'पीने'
आने को राजी हो गया। देखा,
बड़ा
गुमसुम-सा बैठा है। मैं उठकर उसके पास आया
'साहिल,
कैसे हो?
यहाँ क्यों बैठे हो भई?
चलो उधर,
अपनी कोई ताजा तरीन गजल सुनाओं जरा ...'
मैं भी अब
'मूड'
में आता जा रहा
था। अचानक मैं ठिठक गया। देखा,
उसकी ऑंखें नम थी। पैग उसके सामने टेबल पर जस का तस
पड़ा था। उसकी मुट्ठी में कोई कागज दबा था,
जिसे वो बड़ा बेरहमी से मसल रहा था। मैं
एकाएक चेतन हो उठा,
'क्या
हुआ?
क्या है ये?
दिखा।'
उसने मुझे थमा दिया। मैंने अपना
गिलास एक ओर रखकर कागज को खोला। उसकी किसी प्रेमिका का एक
पुराना खत था,
जिसको वो
दिल से लगाकर घूमता था। जिसमें उसने इस बेवकूफ को एक लम्बे
समय तक बेवकूफ बनाते
रहने की माफी माँगते हुए अपनी शादी की तारीख लिखी थी और
कोई अच्छी-सी लडकी देखकर
शादी कर लेने की सलाह दी थी। कलेजे से लगाकर तब से घूम रहा
है,
ये खत। सारा माजरा
समझ कर मैं वापस
'अपने
में'
लौट आया और बाँह से पकड़कर उसे मजमे के बीच ले आया। सब
एकाएक हमारी ओर देखने लगे।
'देखो
भाइयों। ये नौजवार शायर है। नाम है साहिल।
सिटी कॉलेज में एम कॉम में पढ़ता है। बी.कॉम. सैकण्ड ईयर
में किए गये इश्क को दिल से
लगाए बैठा है,
अभी तक। उधर वो तीन बच्चे पैदा कर चुकी है अब तक ...'
मैंने उद्धोषणा
के-से लहजे में सबसे उसका परिचय कराया।
'अमां
यार! यहाँ तो हर साल एक इश्क ...
अगले साल दूसरा इश्क ... सबको शादी की शुभकामनाएँ और बच्चे
पैदा करने की आजादी ...
रोने की क्या बात है?
कुंदन ने जुगाली की।
'साहिल
मियां हमको देखो,
दफ्तर की
गरिमा है ना,
वो साली कभी हमारे से इश्क लड़ाया करती थी। बाईक पर पीछे इस
कदर चिपक
कर बैठती थी कि पीठ पर नर्म-नर्म हथौड़े पड़ा करते थे।
जाँघों पर हाथ फिराती थी,
तो
बदन में सीटियाँ बजने लगती थी। साली को खूब खिलाया,
पिलाया,
घुमाया,
'हिलाया'
पर
कुछ ही दिनों बाद ऊब गई हमसे। आजकल भार्गव से हाथ फिरवा
रही है। हमारी ओर देखती तक
नहीं। मादर... औरत है ही ऐसी चीज। आदमी को उल्लू बनाकर
बरतती है और चुतिया बना कर
चल देती है। आदमी खड़ा रह जाता है,
अपना इकतारा लिए और वो चली जाती है चूतड हिलाती
हुई। तू क्यूँ टेंशन लेता है यार?
अभी जवान है,
हजार लौंडिया मिलेंगी। देवदास बना
फिरता है ख्वामखाह।'
एडवोकेट आशीष ने दलील दी।
आशीष जी,
पहला प्यार भूलाया
जाता है क्या?
साहिल सिसकने लगा था। लड़के भी इस कदर सिसक सिसक कर रो सकते
हैं,
मैं
पहली बार देख रहा था। वाकई वो बड़ा भावुक हो रहा था।
'पहले
प्यार की ऐसी की तैसी।
ये लडकियाँ साली टाईम पास करती हैं। तुझ जैसे चूतिया के
साथ। खिलाने,
पिलाने,
घुमाने को एक मुर्गा मिल गया,
बस। इससे ज्यादा
'प्यार'
नहीं करने देंती। आदमी साला
अपनी आदतों से मजबूर। दुत्कार खाता है,
फिर लौटकर पहुँच जाता है कुत्ते की तरह लार
टपकाता हुआ ... मेरी बात मान जीवन में ये ब्रह्मवाक्य बना
ले
'फन
एण्ड फोरगेट...'
अजी,
इस तरह मातम करने लगो तो जी लिए भईया। सुनो इसी बात पर ...'
आशीष पूरे रंग में
था और इस तरह अपनी तकरीर कर रहा था मानो कोर्ट में खड़ा हो।
कहने लगा
'...किस
किस को
याद कीजिए,
किस किस को रोईये। आराम बड़ी चीज है मुँह ढक के सोईये।'
वाह-वाह-वाह-वाह,
चारों ओर से गूँज उठा। सभी बेवड़े रसिक हो उठे थे।
'एक
और फडकता-सा आने दो
आशीष भाई',
कुंदन का आग्रह आया।
'तू
बनती है शरीफ,
तो आवारा मैं भी नहीं
हूँ।
तू
करती है बेवफाई तो तुम्हारा मैं भी नहीं हूँ।
प्यार
की आखिरी मंजिल
पे आकर कहती है - मैं शादीखुदा हूँ।
तो साली,
कान खोल के सुन ले कुँवारा
मैं भी नहीं हूँ ...।'
झूम के आशीष ने सुनाया।
वाह भाई,
छा गए,
वा-वा-वा ...,
कुँवारा मैं भी नहीं हूँ। चारों ओर से दाद आने लगी। लग रहा
था मानो कोई मुशायरा चल
रहा हो और अब एक-एक शायर नम्बर से आएगा। अपना कलाम सुनाने।
साहिल अब मुस्कुरा रहा
था। मैंने जोर से उसकी पीठ पर धौल जमा दी।
'चियर
अप'।
वो खिलखिला उठा। कुन्दन ने
लाकर उसो गिलास थमा दिया।
लोगों की ऑंखों से खुमार टपकने लगा था। चेहरे पर
मदहोशी साफ पढ़ी जा सकती थी। धुँए के बादल इधर उधर मँडरा
रहे थे। सभी की
घ्राणेन्द्रियाँ धुँए की अभ्यस्त हो चुकी थी। सब रंग में
थे। बल्कि धीरे-धीरे रंग
और अधिक चढ़ता जा रहा था। खाली बोतलें इधर उधर लढ़क रही थी।
'सुनो,
सुनो,
सुनो
...
सुनो यार ... आजकल हमारे कुंदन जी का एक लड़की से जबरदस्त
इश्क चल रहा है,
एसा
मैंने सुना है। एक बार दिल्ली से आते हुए बस में
'कोई'
मिली थी। इनको। बस,
क्या था?
इन्होंने लपक लिया। इनकी कहानी,
इन्हीं की जुबानी ... कुंदन साहब प्लीज। श्रवण ने
मानो मंच पर बुलाकर माईक कुंदन की ओर बढ़ा दिया था। लोगों
ने ताली बजा दी।
'एसी
तो कोई खास बात नहीं है। हाँ,
एक लडकी मिली जरूर थी,
एक बार। बड़ी रोचक
थी। बगल वाली सीट पर ही बैठी थी। दस पन्द्रह मिनट की
मुलाकात में ही उसने मेरा हाथ
अपने हाथ में ले लिया था। अपन ठहरे बेवडे,
उंगली मिली नहीं कि पूरा हाथ ही पकड़ लेते
हैं। बस की लाईटें ऑफ थी। हमने तुरंत उसके गाल पर एक
'रसीद'
लगा दी। वो चिहुंक उठी।
शर्ट और जींस पहने पढ़ी लिखी,
सुन्दर,
आधुनिक,
सैक्सी ... आदि आदि। माने,
हर लिहाज
से बिंदास थी वो। अचानक उसने मेरा हाथ पकड़ कर अपने सीने पर
धर लिया। मैं इसके लिए
तत्पर नहीं था। सो एकदम हाथ खींच लिया। उसने दुबारा वैसा
ही किया। इस बार भीतर का
'पुरुष'
कंट्रोल नहीं रख पाया और हमने स्वयं को नियति के भरोसे छोड़
दिया। अक्सर
आदमी अपनी कमजोरी से जब ज्यादा देर तक लड़ नहीं पाता है,
तो उसे
'नियति'
कह कर