|
मनोज
सोनकर के दोहे
-1-
ख़ुशी बड़ी रूठी
चले, माने ना वह बात
छिटकी जाए हाथ आ,
देती जाए मात ।
ख़ुशी नहीं है पालतू, द्वार
बदलती जाय
ललचाती सबको फिरे, सुंदर
नाज़ुक गात ।
खुशी समेटे जो हंसे, कुछ लमहे
कुछ मास
आज फिरें रोते हुए, सहते उसके
दांत ।
ख़ुशी जिन्हें ठुकरा चली,
दूजों को ले साथ
लौट उन्हें दुलरा धरे, दे
हाथों में हाथ ।
ख़ुशी बड़ी सनकी लगे, बिना
बुलाए आय
तोड़े चले यक़ीन वह, करती जाए
घात ।
◌◌◌
-2-
डूब-डूब सूरज
उगे, मन बस डूबा जाय
इधर-उधर भटका फिरे, चैन कहीं
ना पाय ।
पांखी तो उड़ते चले,
अपने-अपने गाँव
आँखें अब थकने लगी, लौट कोई न
आय ।
गहरी नीली झील है, ठहरी भूरी
शाम
घायल-सी लहरें पड़ी, हवा
उन्हें सहलाय ।
हर मौसम गाता फिरा, जब तक थे
वे साथ
हवा तो सांरगी हुई, अब कोई ना
गाय ।
बेला है फूली बहुत, फूली बहुत
धधाय
गंध नशीली ना लगे, उन बिन
नहीं सुहाय ।
◌◌◌
-3-
तसवीरें उभरी खड़ीं, धरे हुए
दीवार
कुछ तो चहकी लगे हैं, कुछ की
आँखों धार ।
स़नकी कोई एक था, आज़ादी का
भक्त
गोली खाकर मरा वह, भरा हुआ
बाज़ार ।
गोरी छोरी एक थी, चूड़ी की
शौकीन
गले में बांहें डालती, कभी न
माने हार ।
विधवा कोई एक थी, रोटी को
मोहताज़
किसी तरह सांसें चलीं, दामन
में बस खार ।
कोई इक मगरूर था, शरबत जैसी
आँख
ख़त मीठे लिखता चले, चूके ना
इतवार ।
◌◌◌
oमनोज
सोनकर
599/3,
शर्मा निवास
जामेजमशेद रोड, मुंबई
महाराष्ट्र - 400019
|