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दोहा का रंग : छत्तीसगढ़ी के संग

प्रकाशन :शनिवार, 1 मई 2010
संजीव वर्मा 'सलिल'
महतारी छत्तीसगढ़ी, बार-बार परनाम
माथ नबावों तोरला, बनहीं बिगरे काम

बंधे रथे सुर-ताल से, छत्तीसगढ़िया गीत।
किसिम-किसिम पढ़तेच बनत, गारी होरी मीत।

कब परधाबौं अरघ दे, सुरज देव ल गाँव।
अँधियारी मिल दूर कर, छा ले छप्पर छाँव।

खुल्ला आँखी निहारत, हन पीरा-संताप।
भोगत हन बदलाव चुप, आँचर बर मुँह ढाँप।

शोषण अउर अकाल बर, गिरवी भे घर-घाट।
खेत-खार खाता लीहस, निगल सेठ के ठाठ।

हमर देस के गाँव मा, सुनहा सुरज बिहान।
अरघ देहे बद अंजुरी, रीती- रोय किसान।

जिनगानी के समंदर, गाँव-गँवई के रीत।
जिनगी गुजरत हे 'सलिल', कुरिय-कुंदरा मीत।

महतारी भुइयाँ असल, बंदत हौं दिन-रात।
दाई! पइयां परत हौं, मूड़ा मा धर हात।

जाँघर टोरत सेठ बर, चिथरा झूलत भेस।
मुटियारी माथा पटक, चेलिक रथे बिदेस।

बाँग देही कुकराकस, जिनगी बन के छंद।
कुररी कस रोही 'सलिल', 'मावस दूबर चंद।

  संजीव वर्मा 'सलिल'
संजीव वर्मा 'सलिल'
अनुविभागीय अधिकारी
मध्य प्रदेश लोक निर्माण विभाग

204, विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाऊन, जबलपुर
मध्यप्रदेश – 482001.
salil.sanjiv@gmail com
 
         
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