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जीवन के रंग और रंग भरते उत्सव

प्रकाशन :मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010
जया केतकी

त्सव हमारे जीवन में तीन प्रकार का रंग भरते हैं, ख़ुशियों का, यादों का और संवेदनाओं का। जब हम एक उत्सव मनाते हैं, उससे जुड़ी यादें ताज़ा हो जाती हैं जो हमारी ख़ुशियों को दोगुना करती हैं और अनायास ही संवेदनाओं को सहला जाती हैं। उत्सव के तीनों रंगों से जीवन के उन न भूलने वाले पहलुओं की याद आना जिनसे खट्टे-मीठे अनुभव जुड़े हैं, एक सामान्य बात है। कभी-कभी उनकी याद से आँखें भर आती हैं, यही संवेदना का चरम है। 

क्या आपने कभी ठंडे दिमाग़ से विचार किया है कि जैसे-जैसे हमारे जीवन से संवेदनाएं कम हो रही हैं वैसे ही उत्सवों के रंग भी फ़ीके पड़ते जा रहे हैं। इसके कारण कुछ भी हो सकते हैं। पारिवारिक विघटन इसका एक बड़ा कारण है, चाहे वह रोज़गार की खोज के कारण हो या अन्य किसी कारण से। हाँ ये अलग बात है कि यदा-कदा बाहरी रिश्तों में भी संवेदनाओं की झलक देखने मिल जाती है। यह बहुत कुछ सहभागिता पर भी निर्भर करता है। 

हमारा जीवन एक उत्सव के समान है। आशावादी जीवन को सकारात्मक सोच के साथ जीते हैं। सुख हो या दुख, वे इसका सहजता से सामना करते हैं। हताश व्यक्ति ऐसी सोच नहीं रखते। उनके लिए जीवन कांटों की सेज होता है। सोच बहुत महत्वपूर्ण होती है। आप जैसा सोचते हैं, वैसे ही विचार आपके मन में पनपते हैं। कल्पना करें क्या पानी का कोई आकार होता है? जैसा पात्र होता है, पानी का आकार वैसा ही हो जाता है। पानी को घडे़ में रखें, गिलास में रखें या जमीन पर बहा दें। पानी नहीं, बल्कि पात्र में अंतर होता है। 

जीवन अभूतपूर्व कृति है, ईष्वर की। जीवन में कभी सुख के फूल खिलते हैं तो कभी दुख के। इन दोनों फूलों का स्वाद बेहिचक चखना चाहिए। दुख मिलने पर निराश-परेशान नहीं होना चाहिए। वास्तव में, इसी जीवन का उपयोग कर कुछ लोग शिखर पर पहुँच जाते हैं, तो कुछ इसका दुरुपयोग कर अपनी लक्ष्य-प्राप्ति की राह से भटक जाते हैं। 

लोग आशावादी होते हैं, निर्माण करते हैं और निराशावादी, तोड़फोड़। नकारात्मक सोच रखने वाले लोगों ने अपना जीवन घृणा से भर लिया है। उन्हें अपने आसपास रहने वाले लोग दुश्मन नज़र आते हैं, क्योंकि इनके भीतर गंदगी है। यदि मन गंदा है, तो सोच भी वैसी ही होगी। अपने जीवन के हर पल को सुगंधित बनाने का प्रयास करें। 

देश में अनेक महापुरुष हुए। राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, विवेकानन्द जैसे लोगों ने अपने जीवन को एक उत्सव के रूप में जिया और भारत की संस्कृति और संस्कारों की रक्षा की। रावण का नाम भी हैं, लेकिन रावण के जीवन को सार्थक नहीं कहा जा सकता। उसने जीवन में अनेक ग़लत कार्य किए, जिससे समाज में उसे बुराई का प्रतीक माना गया। सार्थक लोग ही अपने जीवन को उत्सव के रूप में जी पाते हैं। ऐसे लोग केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं होते, बल्कि राष्ट्र का गौरव बन जाते हैं।               

इसी तरह देश के अन्य हिस्सों में भी वर्ष भर उत्सवों की धूम रहती है। कुल्लू का दशहरा, बंगाल की दुर्गापूजा, महाराष्ट्र का गणेशोत्सव, मथुरा की होली, आदि ऐसे ही उत्सव हैं जिन्हें देखने और आनन्द लेने विश्व के हर क्षेत्र से लोग एकत्रित होते हैं। 

सामान्यतः उत्सव दो तरह के होते हैं। एक राज उत्सव, जिसका आयोजन राजसत्ता की ओर से किया जाता है। कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन राज उत्सव था। दूसरा है लोक उत्सव। दुर्गापूजा और दशहरे की जो धूम आपने देखी वे सब लोक उत्सव का हिस्सा हैं। आगे आने वाले दीपावली और क्रिसमस इनसे अलग नहीं। लोक उत्सवों का विकास किसी समाज की सांस्कृतिक समृद्धि से होता है। भारत की संस्कृति विकसित है। राज उत्सवों का विकास देश की सत्ता की समृद्धि और ताक़त से होता है। गणतंत्र दिवस, एयर शो और व्यापार मेला राज उत्सव के कुछ और उदाहरण हैं। जनता और सत्ता की भागीदारी दोनों तरह के उत्सवों में होती है। कुंभ मेले का प्रबंधन सरकार करती है। गेम्स का समापन समारोह देखने के लिए आम लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है।

लोक उत्सवों के प्रति लोग सहज होते हैं। उत्सव उन्हें अपने तौर-तरीक़े बदलने को बाध्य नहीं करते। जिस ढंग से चाहें ख़ुशी मना सकते हैं। दशहरा में सिर्फ़ दुर्गा की पूजा करें या मातृ दर्शन कर निकल जाएं। रामलीला का मंचन या झाँकी देखने निकल सकते हैं। यह उनकी अपनी आस्था पर निर्भर करता है। किसी प्रकार का बंधन नहीं रहता। लोक उत्सव व्यापक होते हैं। 

राज उत्सवों में इतनी छूट नहीं होती। खाना-पीना मना होता है, सुरक्षा कारणों से घूमने-फिरने की आज़ादी सीमित होती है। टिकटों की पाबंदी होती है, साथ समय की। राज उत्सव एक नए क़िस्म की वैरायटी देते हैं। इनके माध्यम से समाज का परिचय आधुनिक उपकरणों से होता है। यहाँ राज उत्सवों का आनंद छोटा और सीमित तबक़ा ही ले पाता है। भय, अज्ञान, विपन्नता और गीदड़ भभकियों के कारण ज़्यादातर लोग इससे वंचित रहते हैं। इसीलिए दो-चार लाख लोगों के अलावा बाक़ियों द्वारा गेम्स का मजा अखबारों और टीवी के ज़रिए ही लिया जाता है। 

समरसता और एकता का आधार: उत्सव 

मकर संक्रांति एक उत्सव है और जब सूर्य की गति दक्षिणायन होती है तो व्रत होते हैं। श्राद्ध कर्म पुण्य कर्म है। श्राद्ध कर्म के पूर्व व्रत, नियम और संयम का पालन किया जाता है। जब सूर्य उत्तरायण होता है तो उत्सव का माहौल होता है। उत्तरायण सूर्य शरीर, मन और वातावरण में उल्लास लाता है। 

दोनों ही उत्सव कर्तव्यों के अंतर्गत आते हैं। इनका वैज्ञानिक आधार है। दक्षिणायण सूर्य से शरीर, मन और वातावरण में विकार उत्पन्न हो सकते हैं। इस दौरान अमावस्या, पूर्णिमा, सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण और अन्य खगोलीय घटना, ,व्रत और उत्सव का उल्लेख पौराणिक अध्ययन में मिलता है। 

धर्म के सभी उत्सव और व्रत ब्राह्मांड की खगोलीय घटना, धरती के वातावरण परिवर्तन, मनुष्य के मनोविज्ञान तथा सामाजिक कर्तव्य और ध्यान करने तथा मोक्ष प्राप्ति के उचित समय को ध्यान में रखकर निर्मित किए गए हैं। उचित नियम से किए जाने वाले उत्सव और व्रत से संकट मुक्त हुआ जा सकता है। अनुचित तरीक़े और मनमाने नियम से धर्म की हानि होकर जीवन कष्टमय हो सकता है। 

कर्तव्य: उत्सव

कर्तव्यों का विवेचन धर्मसूत्रों तथा स्मृतिग्रंथों में मिलता है। वेद, पुराण, गीता और स्मृतियों में उल्लिखित चार पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक को कर्तव्यों के प्रति जाग्रत रहना चाहिए। कर्तव्यों के पालन करने से घर में शांति मिलती है। चित्त में शांति मिलने से मोक्ष व समृद्धि के द्वार खुलते हैं। कर्तव्यों के अनेक मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आध्यात्मिक कारण हैं। जो मनुष्य लाभ की दृष्टि से इन कर्तव्यों का पालन करता है वह अच्छाई के रास्ते पर आ जाता है। दुख से मुक्ति का उपाय कर्तव्य ही है। संध्योपासन, व्रत, तीर्थ, उत्सव, सेवा, दान, यज्ञ और संस्कार यह प्रमुख कर्तव्य हैं। 

मनमाने त्यौहार या उत्सव को मनाने से हानि होती है। ऐसे अनेक त्योहार हैं जिन्हें अपने तरीक़ों से मनाया भी जाता है। प्रत्येक समाज या प्रांत के अलग-अलग त्यौहार, उत्सव, पर्व, परंपरा और रीतिरिवाज हैं। यह लंबी वंश परम्परा का परिणाम है कि वेदों को छोड़कर अब स्थानीय स्तर के त्यौहार और विश्वासों को ज़्यादा माना जाने लगा है। सभी अपने मन से नियमों को चलाते हैं। आमतौर पर रात्रि के कर्मकांड निषिद्ध माने गए हैं। 

उन उत्सवों को मनाने का महत्व अधिक है जिनकी मान्यता स्थानीय परम्परा, व्यक्ति विशेष या संस्कृति से न होकर, वैदिक धर्मग्रंथों, धर्मसूत्रों और आचार संहिता के आधार पर होती है। इन पर्वों में सूर्य-चंद्र की संक्रांतियों और कुम्भ का महत्व सबसे ज़्यादा है। मकर सक्रांति का महत्व अधिक माना गया है। 

                सूर्य को ब्रह्मांड की आत्मा माना जाता है। सूर्य के प्रति धन्यवाद देने हेतु संक्रांति का पर्व मनाया जाता है। मकर संक्रांति का पर्व पूरे भारत में मनाया जाता है। यह सूर्य आराधना का पर्व है जिसे भारत के प्रांतों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है। इसी दिन से सौर नववर्ष की शुरुआत मानी जाती है जबकि सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में गति करने लगता है। इस दिन से सूर्य मकर राशि में गमन करने लगता है इसीलिए इसे मकर संक्रांति कहते हैं। भारत के अलग-अलग प्रांतों में इस पर्व को मनाए जाने के ढंग भी अलग हैं, लेकिन मूल ध्येय सूर्य की आराधना करना है। मकर सक्रांति को पतंगोत्सव, तिल सक्रांति आदि नामों से भी जाना जाता है। इस दिन पवित्र नदी में स्नान करने का, तिल-गुड़ खाने का तथा सूर्य को अर्घ्य देने का महत्व है। इस दिन से दिन धीरे-धीरे बड़ा होने लगता है। यह दिन दान और आराधना के लिए महत्वपूर्ण है। मकर संक्रांति से माहौल की शुष्कता कम होने लगती है। 

हिंदू धर्म में कुंभ मेले का बहुत महत्व है। वेद ज्ञाताओं के अनुसार यही एकमात्र मेला, त्यौहार और उत्सव है जिसे सभी हिंदुओं को मिलकर मनाना चाहिए। धार्मिक सम्मेलन की यह परंपरा भारत में वैदिक युग से ही चली आ रही है जब ऋषि और मुनि किसी एक विशेष काल में नदी के किनारे जमा होकर धार्मिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक रहस्यों पर विचार-विमर्श किया करते थे तभा से यह परम्परा आज भी क़ायम है। इस का आयोजन प्रत्येक 12 साल में 4-4 किया जाता है । पूर्ण कुंभ हर 3 साल में एक बार 4 अलग-अलग स्थानों पर लगता है। अर्द्धकुंभ मेला प्रत्येक 6 साल में हरिद्वार और प्रयाग में लगता है जबकि पूर्णकुंभ हर 12 साल बाद केवल प्रयाग में ही लगता है। 12 पूर्ण कुंभ मेलों के बाद महाकुंभ मेला भी हर 144 साल बाद केवल इलाहाबाद (प्रयाग) में ही लगता है। उज्जैन और नासिक में भी कुंभ मेले आयोजित किए जाते हैं। 

गणेशोत्सव, नवरात्रि, शिवरात्रि, वसंतोत्सव, रंगोत्सव(होली), विजयादशमी और दीपोत्सव का भी ख़ासा महत्व है। कृष्ण जन्माष्टमी, रामनवमीं और बुद्ध जयंती को धूमधाम से मनाए जाने की सलाह दी जाती है, क्योंकि संक्राति और कुंभ के बाद यही सबसे महत्वपूर्ण माने गए हैं। हिंदू धर्म के भिन्न सम्प्रदाय में अलग-अलग पर्व, त्यौहार, व्रत या उत्सव का प्रचलन है किंतु सभी मकर संक्रांति और कुंभ पर एकमत होकर मनाते हैं। 

उत्सवों में दान का महत्व

कर्तव्यों का विशद विवेचन धर्मसूत्रों तथा स्मृतिग्रंथों में मिलता है। वेद, पुराण, गीता और स्मृतियों में उल्लेखित चार पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक सनातनी (हिंदू या आर्य) को कर्तव्यों के प्रति जाग्रत रहना चाहिए। कर्तव्यों के पालन करने से चित्त और घर में शांति रहती है। चित्त और घर में शांति रहने से मोक्ष व समृद्धि के द्वार खुलते हैं। 

कर्तव्यों के कई मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आध्यात्मिक कारण और लाभ हैं। जो मनुष्य लाभ की दृष्टि से भी इन कर्तव्यों का पालन करते हैं वह भी अच्छाई के रास्ते पर आ जाते हैं। दुखः है तो दुख से मुक्ति का उपाय भी कर्तव्य ही है। प्रमुख कर्तव्य संध्योपासन, व्रत, तीर्थ, उत्सव, सेवा, दान, यज्ञ और संस्कार आदि हैं।

तीन प्रकार के दानदाता होते हैं- धर्म की उन्नति हेतु सत्यविद्या के लिए जो देता है वह उत्तम दानदाता। कीर्ति या स्वार्थ के लिए जो देता है तो वह मध्यम और जो वेश्यागमनादि, भांड, भाटे, पंडे को देता वह निकृष्ट दानदाता माना गया है। 

पुराणों में अनेक प्रकार के दानों का उल्लेख मिलता है जिसमें अन्नदान, विद्यादान, अभयदान और धनदान को ही श्रेष्ठ माना गया है, यही पुण्य भी है। दान से इंद्रिय भोगों के प्रति आसक्ति घटती है। मानसिक ग्रथियाँ खुलती है । मृत्यु से पूर्व सारी गाँठे खोलना ज़रूरी है, जो जीवन की आपाधापी के चलते बंध गई है। दान सबसे सरल और उत्तम उपाय है। दान के मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं। किसी भी वस्तु का दान करते रहने से विचार और मन में खुलापन आता है। मोह कमज़ोर पड़ता है, जो शरीर त्यागने या मुक्त होने में ज़रूरी भूमिका निभाता है। 

लोक जीवन की छवि मनाये जानेवाले उत्सवों में दिखाई देती है। केरल में अनेक उत्सव मनाये जाते हैं जो सामाजिक मेल-मिलाप और आदान-प्रदान की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं । कलाओं का विकास यहाँ मनाये जानेवाले उत्सवों पर आधारित है । इन उत्सवों का संबन्ध देवालयों से है, अर्थात् ये धर्माश्रित हैं तो अन्य कई उत्सव धर्मनिरपेक्ष। ओणम केरल का राज्योत्सव है। यहाँ मनाये जाने वाले प्रमुख हिन्दू त्यौहार हैं - विशु, नवरात्रि, दीपावली, शिवरात्रि, तिरुवातिरा आदि। मुसलमान रमजान, बक़रीद, मुहर्रम, मिलाद-ए-शरीफ आदि मनाते हैं तो ईसाई क्रिसमस, ईस्टर आदि । इसके अतिरिक्त हिन्दू, मुस्लिम और ईसाइयों के देवालयों में भी विभिन्न प्रकार के उत्सव मनाये जाते हैं । 

मैसूर में दशहरे की परम्पराओं के साथ गोम्बे हब्बा (गुड़ियों का उत्सव) विशेष रूप से जुड़ा है। संवेदनाएं तथा बेहतर भावनाएं इस परम्परा के साथ करीबी जुड़ी हुई हैं। गोम्बे हब्बा नवरात्रि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो मैसूर के साथ ही लगभग पूरे राज्य में काफ़ी पसंद किया जाता है। दशहरे के मौके पर प्रत्येक घर में गुड़ियों का मेला ज़रूर देखने को मिल जाता है। गोम्बे हब्बा के तहत नौ गुड़ियों की सजावट की जाती है । इन नौ गुड़ियों में महिलाओं की हस्तकला दक्षता की झलक भी मिलती है। कलात्मक रूप से देखा जाए तो पुराने मैसूर में इन गुड़ियों की काफ़ी बारीक सजावट की जाती थी। 

वर्तमान में घरों में आयोजित किए जाने वाले इस गोम्बे हब्बा में गुड़ियों को नौ स्तरों पर सजाया जाता है। इन्हें देवी दुर्गा के नौ नामों शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी तथा सिध्दिरात्रि के नामों से ही पुकारा जाता है। माना जाता है कि यह गुड़ियाएं दैवी स्वरूप धारण कर अशुभ आत्माओं से परिवारों की रक्षा करती हैं। 

आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। इसे रास पूर्णिमा भी कहते हैं। वर्ष में केवल आश्विन मास की पूर्णिमा का चन्द्रमा ही षोडस कलाओं का होता है। कहते हैं कि इस दिन चन्द्रमा अमृत की वर्षा करता है। शरद पूर्णिमा के दिन शाम को खीर, पूरी बनाकर भगवान को भोग लगाएँ । भोग लगाकर खीर को छत पर रख दें और रात को भगवान का भजन करें। चाँद की रोशन में सुईं पिरोते हैं। 

दीपावली प्रकाशोत्सव है, जो सत्य की जीत व आध्यात्मिक अज्ञान को दूर करने का प्रतीक है। शब्द दीपावली का शाब्दिक अर्थ है दीपों (मिट्टी के दीप) की पंक्तियाँ। यह एक बहुत लोकप्रिय त्यौहार है। यह कार्तिक माह के 15वें दिन में मनाया जाता है। यह त्यौहार भगवान राम के 14 वर्ष के बनवास के बाद अपने राज्य में वापस लौटने की स्मृति में मनाया जाता है। 

भारत के सभी त्यौहारों में सबसे सुन्दर दीपोत्सव है। मिट्टी के दीपकों की पंक्तियाँ प्रकाशित की जाती हैं तथा घरों को रंगों व मोमबत्तियों से सजाया जाता है। यह त्यौहार नए वस्त्र, आतिशबाजी, परिवार व मित्रों के साथ मनाया जाता है। यह प्रकाश व आतिशबाज़ी, आनन्दोत्सव तथा दैव शक्तियों की बुराई पर विजय की सूचक है। 

भगवती लक्ष्मी , जो धन और समृद्धि की प्रतीक हैं, की पूजा की जाती है। पश्चिम बंगाल में यह त्यौहार काली पूजा के रूप में मनाया जाता है। दक्षिण में, दीपावली त्यौहार, असम के शक्तिशाली राजा नरकासुर, पर विजय की स्मृति में मनाया जाता है। कृष्ण ने अंत में नरकासुर का दमन किया व क़ैदियों को स्वतंत्रता दिलाई। इस घटना की स्मृति में लोग सूर्योदय से पहले उठ जाते हैं, कुमकुम अथवा हल्दी को तेल में मिलाकर नकली रक्त बनाते हैं। राक्षस के प्रतीक के रूप में एक कड़वे फल को अपने पैरों से कुचलकर वे विजयोल्लास के साथ रक्त को अपने मस्तक पर लगाते हैं। 

कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन उत्सव मनाया जाता है । इस दिन बलि पूजा, अन्नकूट, आदि उत्सव भी सम्पन्न होते है । यह ब्रजवासियो का मुख्य त्यौहार है । अन्नकूट या गोवर्धन पूजा भगवान कृष्ण के अवतार के बाद द्वापर युग से प्रारम्भ हुई । गाय बैल आदि पशुओ को स्नान कराकर फूल माला, धूप, चन्दन आदि से उनका पूजन किया जाता है । मिठाई खिलाकर उनकी आरती उतारी जाती है तथा प्रदक्षिणा की जाती है । गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर जल, मौली, रोली, चावल, फूल दही तथा तेल का दीपक जलाकर पूजा करते हैं। 

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाए जाने वाला ऐसा पर्व है, जो भाई के प्रति बहन के स्नेह को अभिव्यक्त करता है एवं बहनें भाई की खुशहाली के लिए कामना करती हैं। भाईदूज में हर बहन अपने भाई का तिलक कर उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए आशीष देती हैं। भाई अपनी बहन को कुछ उपहार या दक्षिणा देता है। इस पावन पर्व को यम द्वितीया भी कहते हैं। इसके पीछे एक कहावत है कि यम देवता ने अपनी बहन यमी यमुना को इस दिन दर्शन दिया था, जो बहुत समय से उससे मिलने के लिए व्याकुल थी। अपने घर में भाई यम के आगमन पर यमुना ने प्रफुल्लित मन से उसकी आवभगत की। यम ने प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि इस दिन यदि भाई-बहन दोनों एक साथ यमुना नदी में स्नान करेंगे तो उनकी मुक्ति हो जाएगी। 

25 दिसंबर यीशु मसीह के जन्म की कोई ज्ञात वास्तविक जन्म तिथि नहीं है, और इस तिथि को एक रोमन पर्व या मकर संक्रांति (शीत अयनांत) से संबंध स्थापित करने के आधार पर चुना गया है। क्रिसमस मंे एक दूसरे को उपहार देना, चर्च में समारोह, और विभिन्न सजावट करना शामिल है। इस सजावट के प्रदर्शन में क्रिसमस ट्री़, रंग बिरंगी रोशनियाँ, जन्म की झाँकी आदि शामिल हैं। सांता क्लॉज, क्रिसमस के पिता क्रिसमस से जुड़ी एक लोकप्रिय पौराणिक कल्पित शख़्सियत हैं जिसे क्रिसमस पर बच्चों के लिए तोहफे लाने के साथ जोड़ा जाता है।

  जया केतकी
45, मंसब मंजिल रोड,
कोहेफिज़ा, भोपाल,
मध्यप्रदेश-462001.
jaya.ems@gmail.com
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