एक बुंदेली कविता

प्रकाशन :22-02-2012
पी. दयाल श्रीवस्तव
बात बात में एंड़ एंड़ में ऊँसई उँसई
लड़े खेत में सेंत मेंत में ऊँसई उँसई।

अब तक तो हँस रये ते जम कें सँजले कक्का
रोउन लगे हैं केत केत में ऊँसई उँसई।

मज्जा में ने गाद मिलाई नॆ ई उरदा
कटी पतंगें पेंच पेंच में ऊँसई उँसई।

दोई तरपे लगे तानबे अपनी अपनी
रस्सा टूटो खेंच खेंच में ऊँसई ऊंसई।

फागुन भर में तो बिटिया की सुध ने
ब्याओ की बातें चैत चैत में ऊँसई उँसई।

तेंदुलकर को चौआ घल गओ बड़े जोर सें
नाक टूट गई कैच कैच में ऊँसई उँसई।
 पी. दयाल श्रीवस्तव
12 शिव‌म‌ सुंद‌र‌म न‌ग‌र‌, छिंद‌वाड़ा,
(म‌.प्र.) 480001
मो.- 9713355846
pdayalshrivastava@rediffmail.com
 
         
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