| पिछड़ गए आदमी के पास | ||
| रचनाकार : अजीत चौधरी | ||
पिछड़ गए आदमी के पास कुछ तो छूट ही जाता है बुरे दिनों में वक्त काटने के लिए मसलन ऊँचाईयों पर पहुँचे संगी-साधी और भटकाव भरे रास्तों की स्मृतियाँ कुछ ऐसे मोड़ जहाँ मेहनत और लगन हो जाती है असंगत कुछ ऐसी ऊँचाइयां जहाँ पैरों की कुब्बत खास माइने नहीं रखती एक दिन उसे बहुत सी बातों पर संदेह होता है ![]() जैसे जिस जीवन को संघर्ष माना वह एक भ्रम ही निकला एक दिन उसकी परछाई उसी रोटी को कुतरती है जिसे वह छोड़ गया था बहुत समय पहले वह कोने में टिकी पुस्तैनी साइकिल की धूल झाड़ता है और उन खेतों की तरफ निगल जाता है जो बरसों पहले इसी मौसम में ऐसे ही दिखते होंगे पीछे छोड़कर, सूर्यास्त वह चिड़ियों के साथ लौट पड़ता है गोधूलि से ढँके, बसेरे की ओर |
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| खंण्डहर | ||
| रचनाकार : अंजु दुआ जैमिनी | ||
अठारह वर्षों के अन्तराल के बाद देखकर इन्हें अहसास हुआ कितना बुढा़ गई है ज़िन्दगी खिला करते थे गुलाब कभी यहाँ मंडराती थी उन पर रंग-बिरंगी तितलियाँ गुनगुनाते भौंरे आज भी आकर लेते हैं धूप आज भी आकर लेते हैं धूप आँगन में टूटी खिड़की से चाँदनी ![]() आ धमकती है आज भी मगर बुझी-बुझी वीरानी याद दिलाती है उस आलम की ढूँढने आ पहुँचे तलाश रहे हर ओर बिखरे जज़्बात सिसकती मजबूरियाँ घायल मन या तड़पता आलम शायद मिट्टी में दबी गुम हो चुकी खुशियाँ फिर से मिल जाएँ वरना उनकी यादों को सीने से लगाए लौट जाएँगे खण्डहरो ना पुकारों हमें ज़ख़्म हो गए फिर से हरे जी लेंगे किसी भी तरह |
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| कहा पति ने- | ||
| रचनाकार : मंजु महिमा | ||
'घर की चौखट पर यदि, रोज़-रोज़ ताला लगा होगा, तो तुम्हीं बताओ कि घर कहाँ होगा ?' उत्तर दिया पत्नी ने - ' जब पति देर रात लौट, लड़्खडाते कदमों से घर ढूंढता होगा , तो तुम्हीं बताओ कि फिर घर कहाँ होगा ?" इसीसे कहती हूँ मैं- 'घर वह हो, जिसकी एक दीवार प्यार की हो, दूसरी विश्वास की हो, ![]() तीसरी अहसास की हो, चौथी अरमान की हो, और् छत आकांक्षाओं की हो । दरवाज़ा खुलता हो जिसका, एक ऎसे प्रांगण् में , जहाँ उन्मुक्त हो , हम जाएँ, अपने आगत के बीज बोएँ, और फिर साँझ होते ही लौट आएं, अपने घर में।' हाँ, तभी वहाँ घर होगा, वही अपना घर होगा । सपनों का राजमहल होगा। |
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| माह के कवि |
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| माँ | ||
| रचनाकार : डॉ. महेन्द्र कुमार ठाकुर | ||
वह जो फूँक फूँक कर एक हाथ से आँखों को बन्द किए धुँए से बचाती चूल्हा जलाती है माँ है... वह जो पिता भाई बहन मेहमान को खिला कर खाली गंजी और कढ़ाई ![]() बटलोही को खुरच खुरच कर खा रही होती है माँ है... वह जो मैले कपड़ों में धूल भरे पप्पू के हाथ बस्ता थमाकर माथे पर चुम्बन दे भविष्य के सपने को आँखों में पालती मंगल कामनाएं दे विदा कर रही है माँ है। |
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| नवजात शिशु को देखकर | ||
भोला भाला नवजात शिशु जब मुस्कराता है तब उसकी मुस्कान कितनी आकर्षक और मोहक होती है। ![]() जब वह निंद्रा में लीन होता है तब उसका चेहरा कितना मासूम दिखाई पड़ता है उसकी किलकारियाँ किसका मन नहीं मोह लेती उसकी मुस्कान का, मासूमियत का किलकारियों का कोई मजहब नहीं होता। |
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| अगर वहाँ आदमी होता ! | ||
उसे भारत में चोट लगी वह चीखा अमरीका में भी वह दर्द से कराहा था रूस में भी चोट लगने पर उसे पीड़ा हुई थी पाकिस्तान में भी वह दर्द से बेबस नज़र आया था वह आदमी था केवल – नहीं होता तो भी चोट लगने पर वैसे ही चीखता कराहता चाहे वह अमरीकी, रूसी या हिन्दुस्तानी या पाकिस्तानी ही क्यों न होता – उसे भूख लगी थी अतड़ियाँ दर्द से बेहाल कर रही थीं ![]() वह भी केवल आदमी था किसी देश का वासी नहीं होता तो भी भूख से इतना ही पीड़ित होता जितना आदमी होने पर पीड़ित हुआ था वह – और एक बात कहूँ बन्धु ! अगर धरती ही नहीं... अंतरिक्ष में भई कहीं किसी को चोट लगती तो भी वह ऐसे ही चीखता कराहता धरती में चन्द्रमा में मंगल में शुक्र में वृहस्पति में अगर वहाँ आदमी होता... |
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