अवश्य हुई होगी
वक़्त के चिंतन से

किसी ने
सुबह सुबह
पूछ लिया
इन दिनों
तुम
बहुत चुपचाप रहते हो
आखिर
वजह क्या है ?
मुझे
पूछना तो
नहीं चाहिए
किन्तु
वक़्त को परखना
उसे जानना
सबको न सही
एक वर्ग को
जानने समझने के लिए
लाज़मी है ही
वर्ग का वर्गीकरण
किसने किया
किसी न किसी ने तो
किया ही
फिर उभरा स्वरुप
और उसमे
स्वरूपीकरण की
फूटने लगी कलिया
भले ही
उनके खिलने पर
और खिल कर
विखरने पर
कोई विलम्ब न हुआ हो
किन्तु टीका टिपण्णी तो
अवस्य हुई होगी
आभास ही दे दों
संभव हैमिलना असंभव हो
पर
आभास दे कर
मन को
कुछ पल के लिए
शांति ही दे दों
जैसे
धरती और आकाश
दूर
छितिज के उस पार
मिलते नहीं
पर
मिलने का आभास तो
देते है
दृष्टी को नहीं लगता
की दूर जा कर
वह अलग है
कुछ ऐसा ही तुम करते
तो मेरा मन भी
कुछ पल के लिए सही
उदासी से मुक्ति पाकर
नए उत्साह से
जीने के लिए
कोई रास्ता ढूँढता
रास्ता मिलने पर
मंजिल दूर भी होती
तो क्या
पा लेने की चाह
मन में होती
और
अपनी यात्रा जारी रखता


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