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राजेंद्र परदेसी की दो कविताएं

प्रकाशन :मंगलवार, 7 फरवरी 2012
राजेंद्र परदेसी

अवश्य हुई होगी


वक़्त के चिंतन से
किसी ने
सुबह सुबह
पूछ लिया
इन दिनों
तुम
बहुत चुपचाप रहते हो
आखिर
वजह क्या है ?

मुझे
पूछना तो
नहीं चाहिए
किन्तु
वक़्त को परखना
उसे जानना
सबको न सही
एक वर्ग को
जानने समझने के लिए
लाज़मी है ही
वर्ग का वर्गीकरण
किसने किया
किसी न किसी ने तो
किया ही
फिर उभरा स्वरुप
और उसमे
स्वरूपीकरण की
फूटने लगी कलिया
भले ही
उनके खिलने पर
और खिल कर
विखरने पर
कोई विलम्ब न हुआ हो
किन्तु टीका टिपण्णी तो
अवस्य हुई होगी

आभास ही दे दों


संभव है
मिलना असंभव हो
पर
आभास दे कर
मन को
कुछ पल के लिए
शांति ही दे दों
जैसे
धरती और आकाश
दूर
छितिज के उस पार
मिलते नहीं
पर
मिलने का आभास तो
देते है
दृष्टी को नहीं लगता
की दूर जा कर
वह अलग है
कुछ ऐसा ही तुम करते
तो मेरा मन भी
कुछ पल के लिए सही
उदासी से मुक्ति पाकर
नए उत्साह से
जीने के लिए
कोई रास्ता ढूँढता
रास्ता मिलने पर
मंजिल दूर भी होती
तो क्या
पा लेने की चाह
मन में होती
और
अपनी यात्रा जारी रखता
  राजेंद्र परदेसी
बी-1118, इंदिरा नगर,
लखनऊ-226016
rajendrapardesi@gmail.com
 
         
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