श्रेणियाँ

डॉ. सुभाष राय की तीन कविताएँ

प्रकाशन :शनिवार, 1 मई 2010
सुभाष राय

यह हाथ किसका है

यह हाथ किसका है
बार-बार मेरी जेब में उतरता हुआ
बेख़ौफ़, बेलौस
मुट्ठियाँ बंधते-बंधते खुली रह जाती हैं
दाँत भिंचना चाहते हैं
पर अपनी ही जीभ बीच में फँस जाती है
;
यह हाथ अक्सर मेरे कमरे में तैरता है
मेरे और मेरी बीवी के बीच आ जाता है
हम करवटें बदलते रह जाते हैं

एक ही घर में एक साथ होकर भी
अलग-अलग

मेरा बेटा माँगता है
नए कपडे, नए जूते, नयी साईकिल

मेरी कलाइयों पर हथकड़ी की तरह
बंध जाता है यह हाथ

मैं जानता हूँ
एक दिन वह बड़ा होगा
उसे भी नज़र आयेंगे ये हाथ
बेवजह बिस्तर से किचेन तक
दखल देते हुए

मैं चुप हूँ
शायद वह चुप न रह सके !

Error : Empty Script Tag

  सुभाष राय
ए-158, एमआईजी, शास्त्रीपुरम, बोदला रोड,
आगरा (यूपी)
मो.- 9927500541
raisubhash953@gmail.com
 
         
Bookmark and Share
टिप्पणी लिखें
 
वाक्यांश खोजें




Bing


Site Search Site Search
लेखागार (Archive)