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विद्या गुप्ता की दो कविताएँ

प्रकाशन :शनिवार, 4 फरवरी 2012
विद्या गुप्ता

मरा हुआ आदमी

किया हैं तुमने जघन्य अपराध
मार कर
अपने अंदर का आदमी

शायद,
तुम नहीं जानते,
कितना खतरनाक होता है
मरे हुए आदमी का जीना

वह देखो !.हिरोशिमा नागासाकी .....
वह देखो ,मरे हुए आदमी ....खोज रहे हैं
नक्शे पर ..बारूद के फूल

आंकलन

आकाश छूने के बाद
बहुत बौना हो जाता मैं
अपने आप

मैं जानता हूँ ...भूल नहीं पाता हूँ
अपना कद ,
और सीढियों का जुगाड़
  विद्या गुप्ता
160, आर्यनगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़
vidyagupta1953@gmail.com
 
         
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