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एक टूटा वृक्ष

प्रकाशन :शुक्रवार, 26 अगस्त 2011
अदिति मजूमदार
एक टूटा वृक्ष हूँ
अपनी आखरी
सांसे गिन रहा हूँ।

परोपकारी बनने का सपना देखा
कर्मयोगी भी बना
लेकिन अपनी शाखाओं को
बचा न सका।

दिमाग उम्र दिल
सब लगा दिया
मेरी ख़ामोशी ने
दुर्दशा को निश्चित कर दिया।

अगर में बोल सकता
कहता कि मुझे बचाओ
मुझे काट घर न बनाओ
मुझमें भी कई घर है
उन्हें तो बचाओ।

अँगुलियों पर गिन रहा हूँ
पीड़ित मस्तिष्क में
धरती में सामने के लिए
जर्जरित हो रहा हूँ।

  अदिति मजूमदार
300, इंडियन ब्रांच ड्रिव मोरिस्विल,
नोर्थ करोलिना यू. एस. ए.

aditi2001@gmail.com
 
         
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