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असीम

प्रकाशन :मंगलवार, 1 जून 2010
अनुराग शर्मा

ह अन्दर क्या आयी, सारा दफ़्तर महक उठा था। रोज़ाना की उन ग्रामीण गंधों के बीच में तिरती यह ख़ुशबू ही उसके आने का पता मुझे देती थी. तब मैं मुंबई और पुणे के बीच में एक छोटे से गाँव में एक सरकारी बैंक में एक प्रोबेशनरी अधिकारी की अस्थायी पोस्टिंग पर था। अपने जीवन में पहली बार मैं अपने परिवार से दूर एक ऐसी जगह में था जहाँ की भाषा एवं संस्कृति मेरे लिए नई थी। शाखा में मेरे अलावा पाँच व्यक्ति थे। घाटे, जोशी, शिंदे, पंवार और ममता। सभी लोग बहुत अच्छे और नेक थे। अपने स्वाभाव के अनुकूल मैं भी दो एक दिन में ही इस परिवार का अटूट हिस्सा बन गया।

प्रोबेशनरी होने के कारण मैं अपने बैंक की इस शाखा के नियमित स्टाफ़ में नहीं गिना जाता था। मेरे बैठने के लिए कोई निश्चित जगह भी नहीं थी। आज यहाँ तो कल वहाँ। मुझे बैंकिंग के सभी आयाम सीखने थे और शाखा में मेरे लिए काम की कोई कमी न थी। घाटे, जोशी, शिंदे और पंवार मुझसे कहीं वरिष्ठ थे। सिर्फ़ ममता ही मेरी हमउम्र थी। जैसे मैं एक प्रोबेशनरी अधिकारी था उसी तरह वह एक प्रोबेशनरी क्लर्क थी। उसने यह नौकरी मुझसे कोई तीन महीने पहले शुरू की थी। वह एक पतली दुबली, आकर्षक और वाक्पटु लडकी थी। वैसे तो सबसे ही हँस बोलकर रहती थी लेकिन मुझसे कुछ अधिक ही घुल मिल रही थी। हाँ, नटखट बहुत थी। मुझे तो हमेशा ही छेड़ती रहती थी।

उस दिन मैं शाखा के एक कोने में अकेला बैठा हुआ रोज़नामचा लिख रहा था। तभी ममता अपनी चिर-परिचित मुस्कान बिखेरती हुई आई और मेरे सामने बैठ कर एकटक मुझे देखने लगी। मैं भी औपचारिकतावश मुस्कराया और फ़िर अपने काम में लग गया।

"क्या कर रहे हो?” उसने पूछा, "इतना सुंदर लिखते हो तुम।”

फ़िर मेरे जवाब का इंतज़ार किए बिना ही बोलती चली गयी।

"तुम्हारी लाइन तो तुम्हारी तरह ही है, सुंदर, साफ और स्पष्ट।"

मैंने काम रोककर उसकी और देखा और देखता ही रह गया। सुंदर तो वह हमेशा ही थी, पर आज कुछ ज़्यादा ही आकर्षक दिख रही थी।

“क्या देख रहे हो …" उसके चेहरे पर शरारत नाचने लगी, “तुम्हारी लाइन तो बिल्कुल क्लियर है।"

उसके कथन ने मुझे हतप्रभ कर दिया। इससे पहले कि मैं कुछ कह पाता, वह उठी और बोली, "डरो मत निखिल, मैं तुम्हें खाने वाली नहीं हूँ"

वह खिलखिलायी और मेरे उत्तर का इंतज़ार किए बिना अपनी सीट पर चली गयी। मैं आश्चर्यचकित रह गया। अजीब लड़की है यह। मुझे तो इसकी कोई बात समझ नहीं आती है।

उस बार सम्पूर्ण शाखा की तनख़्वाह तैयार करने का काम मुझे दिया गया। शायद वह भी मेरी ट्रेनिंग का एक हिस्सा था। मैं एक कोने में बैठा हुआ खाते और केलकुलेटर से जूझ रहा था कि फ़िजां में ख़ुशबू सी तिरने लगी। हाँ, वह ममता ही थी। उसने मेरी सहायता करने की पेशकश की जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। इतने ख़ूबसूरत सहायक को कोई मना भी कैसे कर सकता था। मैं सभी कर्मचारियों के मूल वेतन की गणना करने लगा और वह भत्तों की। बड़ी बड़ी संख्याएँ मेरे सामने कागज़ पर उलझ रही थीं। जोड़ में कोई ग़लती हो रही थी जिसे मैं पकड़ नही पा रहा था। उसने पूछा तो मैंने बताया।

वह बोली, "तो ढूँढो न। प्यार से देखोगे तो कुछ भी मिल सकता है।"

फ़िर एकटक मुझे देखा, हँसी और धीमे सुरों में गुनगुनाने लगी, "ढूँढो ढूँढो रे साजना..."

पहली बार मैंने महसूस किया कि वह बहुत सुरीली थी। गाते गाते वह रुकी और मेरी आँखों में आँखें डालकर फ़िर से गुनगुनाने लगी। इस बार मराठी में शायद कोई कविता थी या कोई ऐसा गीत जो मैंने पहले नहीं सुना था। गीत के बोल कुछ इस तरह से थे:

मामूली मछली के पीछे
दौड़ रहा क्यों इधर उधर
यह मोती तेरे पास गिरा है
दैवी, धवल, अछूता
क्यों अनदेखी करता उसकी
ओ निर्मोही मछुआरे
आगे बढ़कर पा ले उसको
तप तेरा सार्थक हो जाए
श्रम का पूरा फल तू पाये
यह मोती तेरा हो जाए
यह मोती तेरा हो जाए।

मैं सम्मोहित सा उसका गीत सुनता रहा। गीत पूरा होने पर मेरी तंद्रा भंग हुई। कुछ देर प्रयास करने के बाद वेतन की गणना में हो रही ग़लती भी पकड़ में आ गयी। हम फ़िर से काम पर लग गए।

जब उसने मेरे पेट्रोल भत्ते के बारे में पूछा तो मैंने कहा, "पाँच।"

"नेट?" उसने पूछा।

मेरा सम्मोहन शायद अभी भी पूरी तरह से उतरा नहीं था इसलिए मैं उसकी बात ठीक से समझ न सका।

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  अनुराग शर्मा
पिट्सबर्ग, यूएएसए
indiasmart@gmail.com
 
         
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