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प्रवेशांक, जून, 2006
सृजनगाथा
रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन
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संस्कार
समय, समाज और त्वरित लेखन
...कुछ ही बरस पहले तर तंत्र और उस पर काबिज़ ताकतों के जन-विरोधी तेवरों को लेकर चिंता करते अपने प्रश्नाकुल छात्रों को मैं दिलासा देता कि आदमी की ज़िन्दगी में तीस-चालीस बरस बेशक बहुत होते हैं लेकिन देश की ज़िन्दगी में तो यह बूंद भर समय ही है । वह दिन ज़रूर आयेगा, मैं उनसे कहता ,जब न यह जनविरोधी तंत्र रहेगा न उस पर काबिज़ दिख रही ये काली ताक़तें ही । लेकिन जिस दौर से हम इन दिनों गुज़र रहे हैं और देश की मूल प्रकृति और व्यापक हितों के विरुद्ध जैसे निर्णय लगातार लिए जा रहे हैं, लोभ संदेह और नफ़रत के माहौल को सियासी ताकतें जिस तरह हवा देती चल रही हैं, माफ़िया और सत्ता के दलाल जिस तरह दिनोदिन मजबूत होते जा रहे हैं उन्हें देख कर मेरे जैसा सुधारातीत आशावादी भी अब बुरी तरह संशकित होने लगा है । अभी उसी दिन बम्बई में हुए बस विस्फोटों की खबर देख रही हमारी ग्यारह साल की बेटी झुंझला कर अपनी माँ से कह उठी, “ बंद करो मां बकवास कर रहे इस डिब्बे को । भौगोलिक कारणों से तो इस देश को अतिरेकों का उपमहाद्वीप कहा ही जाता है लिकिन यह राजनैतिक कारणों से भी यही है । अवकाश के घंटे में जानती हो हम सहेलियां प्रायः क्या गाती हैं –नफ़रत की गंगा बहे देश में झग्ग्ड़ा रहे ।‘’
बात इसलिए बेहद चौकाने वाली है क्योंकि भय हत्या झूठ फ़रेब अन्याय और दमन की राजनीति अपना कुप्रभाव समाज के सबसे कोमल और पवित्र मन पर भी डालने लगी है । प्यार को नफ़रत, एकता को झगड़ा और देश को न कुछ का नाम देते बच्चों को कौन सा संसार दे रहे हैं हम । जब हम बच्चे थे तो जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी उचारते विह्वल हो-हो उठते थे । देश का एक साफ़ विचार था हमारे अंदर । भूगोल और राजनीति से भी परे वह एक सांस्कृतिक सच्चाई था । देश और समाज की भला कौन सी धारणा दूँ मैं अपनी इस बड़ी हो रही बच्ची को ? राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए अनुसूचित जाति, जनजाति के आयुक्त कहते हैं कि इस देश में तिहरी अर्थव्यवस्था लागी है क्योंकि इसके भीतर दो और देश हैं इंडिया के अलावा भारत और हिंदुस्तान । कौन से मुँह से उपदेश दे कोई पिता अपने बच्चे को कि अपने देश को प्यार करो क्योंकि तब वह फट्ट से पूछ बैठेगा, किस देश को पिता और पिता को कोई जवाब नहीं सूझेगा ।
समय के एसे दौर में पत्रकार की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है । पत्रकारों में मैं लेखक को भी शामिल मानता हूँ- सिर्फ़ इसलिए नहीं कि पत्रकारिता त्वरित लेखन है, बल्कि इसलिए खासतौर से कि हमारे यहाँ पत्रकार लेखकों और लेखक-पत्रकारों की सुदीर्घ और समृद्ध सरंपरा रही है जो आज तक चली आ रही है । सबसे ज़रूरी काम आज मुझे नवजागरण और स्वतंत्रता संग्राम के दौर की स्पिरिट का पुनर्वास लगता है क्योंकि मन के हारे हार मन के जीते जीत । सिर्फ़ साठ- सत्तर साल पहले तक जो जाति आत्मगौरव और देशाभिमान से रहित नर को नर-पशु और मृतकतुल्य कहती थी और जिसके स्वाधीनता-संघर्ष से एशिया-अफ्रीका के तमान मुल्क़ो ने अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ने की प्रेरणा पायी थी उसी को अपने स्वाभिमान को ताक पर रख अंतर्राष्ट्रीय पूँजीवाद के चरण चांपते देखना बेहद लज्जाजनक अनुभव है । तालागांव के रुद्रशिव की प्रतिमा जिस चेतना से उपजी है उस के पीछे सदियों का सोच और विवेक है । हर दर्पण अपने ही इतिहास और संस्कृति को प्रतिबिंबित करता है । अपने दर्पण को तज देने से हमारे पुरखे कहां प्रतिबिम्बत होंगे ? और वही नहीं रहे तो हम भला कितने रह जाएंगे ? औपनिवेशिक ताकतों की मानसिक गुलामी से छुटकारा पाना मेरे विचार से जाति के तौर पर सम्मानजनक ढंग से हमारे बने रहने की अहम शर्त है ।
तहसनहस के इस दौर में हमारे देश की पत्रकारिता पर बड़ी ज़िम्मेदारी है । यह देख कर तसल्ली होती है कि बहुतेरे दबावों के बीच भी उसमें वैदिकी हिंसा को भी हिंसा ही कहने का साहस है, डरावनी से डरावनी सच्चाइयों से मुठभेड़ करने की कूवत है । अयोध्या की टूटी मस्ज़िद का सच, कश्मीर में मंदिरों के सही सलामत होने का सच, दलितों के उत्पीड़न का सच, सियासी साजिशों और आर्थिक घोटालों का सच, लोगों तक पहुंचाने का जोखिम उसने उठाया है । बेशक काली-पीली पत्रकारिता का भी हमारे यहां बड़ा ज़खीरा है । सता के ढिंढोरचियों की भी एक बड़ी जमात है । लेकिन जातीय जीवन के परिप्रेक्ष्य में आम आदमी और उसकी नियति के अहम फ़ैसलों से जुड़े सवाल बेहिचक उठाती पत्रकारिता ही तिलक, गांधी और गणेश शंकर विद्यार्थी की परम्परा है । जिसमें सत्ता के विरुद्ध अपनी इंटीग्रिटी कायम रखने की क्षमता हो वही हमारी पत्रकारिता और लेखन की मुख्य धारा हो सकती है ।
प्रमोद वर्मा


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