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प्रवेशांक, जून, 2006

सृजनगाथा  

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

    कहानी                                                                                           

राजेन्द्र अवस्थी

कौए के पीछे बैलगाड़ी

 

          टुंक टुकर टुंक !

           घंटियों की हल्की-सी आवाज़ के साथ चूं-चूं चर करती बैलगाड़ी ऊबड़-खाबड़ राह से, अंधेरो को चीरते धीरे-धीरे सरक रही थी। दोनों ओर घना जंगल, बार-बार सीधी चढ़ाई और फिर एकदम नीची ढाल। बैलों के दम पर चाहे जो आये, गाड़ी में बैठनेवाला भी कांप-कांप जाता था। तब वह अपनी दोनों हथेलियां छाती के सामने रख लेता और कलेजे से ऊपर चढ़ा थूक, एक बार ज़ोर से खखार कर गाड़ी के बाहर फेंक देता। उसकी बाजू में बैठी थी रसीली उसकी उमरभर की साथी, जो नाम से तो जवान पर शरीर से उतनी ही कृश थी। उसका यह नाम उसके बाप ने रखा था। ब्याह कर आ गयी पर सानी ने उसका नाम नहीं बदला। वह बार-बार कहती रही, सासुरे का नाम मैके से अलग होता है, अपनी मरजी का नाम रख लो न, पर सानी; वह सिर्फ हंस देता। कहता, तेरा नाम बदलूंगा तो तेरा रस चला जाएगा। रसीली अपनी नयी जवान आंखों तब कुछ इस तरह मटकाती कि सानी दांतों के बीच अपनी जीभ दबाकर उसकी ओर दौड़ पड़ता। तब वह भागकर अपनी सास के पीछे छुप जाती। सास हंस देती। कहती, बहू, नाम बदलने की परंपरा को यदि यह तोड़ रहा है, तो बुरा नहीं कर रहा।

 

सास की यह बात उसे गुस्ताखीभरी लगती। वह उसके गाल दबा देती और हंसीभरी खीझ में कहती जानती हूं, जाया तो वह तेरा है। मैं तो परायी ठहरी ! वह कूदती-फांदती उस कमरे से बाहर चली जाती।

 

एक दिन..! सानी और रसीली में ऐसे ही बात बढ़ गयीथी। सानी ने पानी मांगा। जब वह लेकर आ गयी तो सानी ने पहले वह गिलास रसीली के होंठों से छुआया, तब फिर उसने पानी पिया। इस पर रसीली ने इस तरह नज़रें उठाकर देखा था कि सानी की छाती में बबूल का कांटा चुभ गया था। सानी हंसकर यही कहा था रस उतर आया है गिलास में, जैसे भट्ठी में महुए ने अपनी छाती का एक कतरा चुवा दिया !

 

सुनकर रसीली भागी थी। सानी ने उसका पीछा किया और तब दोनों दौड़ते मकई के उस घने खेत में पहुंच गये थे, जहां के झा़ड़ अपने सिर पर हाथभर लंबे दानेदार भुट्टे रखे थे और उनसे सफेद रेशे लटकाये हवा के साथ आवाराओं की तरह झूल रहे थे। चिड़ियों के झुंड-के-झुंड वहां आते। उन भुट्टों पर बैठते और फिर फुर्र से उड़ जाते। उस समय इन चिड़ियों के पर रसीली को मिल गये थे। सानी तब शिकारी था। अपना हाथ हवा में ऐसा घुमाता मानों गुलेल झुला रहा हो और जब वह रसीली की चोटी पकड़ पाया तो उसने इतने ज़ोर से उसे नीचे पटक दिया कि वह बस, एक हिचकी लेकर रह गयी। उसका मुंह फिर नहीं खुल पाया।

 

    गाड़ी के चक्के से एक पड़ा पत्थर जैसे ही टकराया कि बूढ़ा खांसता हुआ रसीली पर ऐसा गिरा जैसे उस भुट्टे के खेत में बरसों पहले रसीली गिरी थी। तब आज भी रसीली कांख कर रह गयी। उसने अपना दाहिना हाथ बूढ़े के सिर पर फेरा और उसे अपने आंचल में छिपा लिया। सामने देखकर बोली, अरे बीरसिंह गाड़ी धीरे हांक ! तेरे दादा को दौरे आ रहे हैं !”

बीरसिंह गाड़ी के चौर पर बैठा था। उसने हाथ का कोड़ा उठाया और दोनों बैलों की पीठ पर जड़ दिया, धीरे रे धीरे !”

 

वह यह न जान सका कि इसमें बेचारे बैलों का क्या दोष है ! गाड़ादान ही ऊटपटांग है ! रात अंधेरी है। एक टिमटिमाती बाती और सनसनाता जंगल जितने विवश उसमें बंधे बैल हैं, उतनी ही विवश वह बैलगाड़ी है। और इनसे भी ज्यादा विवश उसमें सवार ये तीन सवारियां हैं। बूढ़ा खांसता है तो छाती फटती है। खंखार के साथ थूक आता है या खून किसने देखा है ? दमा का रोगी, जो इस रोग को चालीस बरस से पाल रहा है और उसे पालते बीस बरस हो गये हैं ! रसीली तो अब दांतों में चूसकर फेंके गये गन्ने की गंडेरी रह गयी है जिंदगी का सूरज जब उगा तो चने की भाजी और मक्का की सिर्फ दो रोटियां उसने फूस की उस झोपड़ी में देखी थीं। उमर चढ़ नहीं पायी कि उसने देखा कि सानी उसकी लगाम थामे है। वह आज लाया और बरस बाद ही उसके पेट की अंतड़ियां खिंचने लगीं।

 

दर्द और पीड़ा के बीच गांव की औरतों ने नाच-गाकर रात बितायी और पूरब दिशा जब सिंदूर लगाकर जाती तो रसीली ने अपनी बाजू में एक फूल पड़ा देखा ! उसकी किहें-किहें ने रसीली की जिंदगी में वह रस घोल दिया कि आज भी जब वह उस दर्दभरे सुख का अनुभव करती तो शारदा मइया के सामने सिर झुका देती है हे मईया, जिंदगी की वह घड़ी एक बार ला दे ! उमर का यह बोझ पलभर को उतर जाए तो भला। पर शारदा मइया कुछ नहीं सुनती। सारी चढ़ोतरी हजम कर जाती है। पत्थर की देवी तब पत्थर रह जाती है ! सिंदूर से लाल उसका तन तब जैसे खून से रंग जाता है। रसीली ने दस लड़के-लड़कियों को जन्म दिया। वह और चाहती है, यह बात नहीं है। दरअसल वह बुढ़ापे को भूलना चाहती है। उसे झुठला देना चाहती है और इसलिए उन दिनों को याद करती है। कारण बचपन से उसने सुना है लड़कपन उचटने और हंसने के लिए है। जवानी बच्चे जनने के लिए और बुढ़ापा रोने के लिए। वह रोने से डरती है और इसलिए फिर जवानी के दिनों में लौट जाना चाहती है पर जब उसकी नज़र सामने बैठे बीरसिंह पर पड़ती है, तो उसके मन में अपने-आप एक हूक उठती है। वह अपनी आंखों को आंचल के छोर से बंद कर लेती है। वह बीरसिंह का अधिकार छीनना चाहती है। उस बीरसिंह का, जो दस में दूसरा है और उसका अब इकलौता बेटा रह गया है, जिसे उसने बड़े लाड-दुलार से पाला-पोसा है। उसके बाद जितने आये, सब धोखा दे गये। सबसे बड़ी है बेटी। जब वह बारह साल की हुई तो वह चिड़िया की तरह फुर्र से उड़ गयी

 

चिड़िया मैं परदेस की

मोर पंख हिराने हो माय।

 

बचपन के गीत, बचपन के बीतते-बीतते अपने-आप डूब जाते हैं, जैसे सबेरे के सूरज के पहले ही आसमान के तारों को एक-एक कर नीचे समंदर में कूद जाना पड़ता है; मानो कोई ग्वाला उनके पीछे लगा, उन्हें इसके लिए विवश कर रहा है। रसीली क्या करती ? गाड़ी के चक्के की तरह जिंदगी घूम रही है। आदमी उसकी लीक पर खड़ा है। ....

 

क्रमश:...                                                                                                                                                                                         

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