
सृजनगाथा
रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन
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प्रवेशांक, जून, 2006

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//प्रेरक प्रसंग//
बदसूरती और अच्छाई
तॉलस्तॉय
का बचपन बहुत सुख से बीता । वे अपने पिता को बहुत प्यार करते थे। उनके पिता
बहुत लम्बे-तगड़े और ख़ूबसूरत थे । वे उन्हें दिलचस्प कहानियाँ सुनाते,
उनके साथ हँसी-मज़ाक करते और उन्हें अपनी कुर्सी पर भी चढ़ कर झूलने देते ।
तॉलस्तॉय पर उनके पिता का बहुत प्रभाव था।
पिता और तात्याना चाची के साथ-साथ घर के दूसरे लोग भी तॉलस्तॉय को बहुत प्यार करते । उनके मास्टर साहब बहुत अच्छे आदमी थे । वे उन्हें बहुत अच्छी तरह पढ़ाते । कभी –कभी सब बच्चे अपनी दादी के साथ आस-पास के जंगल में चले जाते । वहाँ वे खेलते, तरह-तरह के फूल इकट्ठे करते ।
सर्दियों में बर्फ पड़ने लगती । तब तॉलस्तॉय अपने भाइयों और बहन के साथ बर्फ पर फिसलते । गर्मियों में सब बच्चे नदी में नहाने और पिकनिक मनाने जाते ।
तॉलस्तॉय को अपने पिता के अस्तबल और कुत्तों के बाड़े को देखने के लिए जाना बहुत अच्छा लगता । पिता श़ूब शिकार खेलते थे । वे अपने घोड़ों और कुत्तों का बहुत ध्यान रखते । धीरे-धीरे तॉलस्तॉ की भी रुचि शिकार में होने लगी । बचपन ही से तॉलस्तॉय के दिल में जानवरों के लिए प्यार था। उनमें जानवरों को समझने की शक्ति भी थी ।
लेकिन बच्चो, बालक तॉलस्तॉय को एक बात का बड़ा दुख था – कि वे ख़ूबसूरत नहीं थे ।
तॉलस्तॉय के तीनों भाई बहुत सुन्दर थे । उनहें देख कर तॉलस्तॉय को अपनी बदसूरती बहुत अखरती । उन्हें बार-बार अपनी कुरूपता का ध्यान आता ।
जब तात्याना चाची उन्हें इस तरह परेशान होते देएखतीं तो वे उन्हें समझातीं । वे कहतीं-तुम अच्छा और समझदार बनने की कोशिश करो, जिससे लोग तुम्हें केवन । तुम्हारे चेहरे के लिए ही प्यार न करें । वे तुम्हारे गुणों को भी देखें और उन्हें देख कर तुम्हारी इज्ज़त करें । तुम्हें सचमुच चाहें ।
बालक तॉलस्तॉय चाची के समझाने पर लम्बी साँसें भरते । उनके मन में खूबसूरत बनने की बहुत इच्छा थी । कभी – कभी तो वे प्रार्थना भी करते कि कोई चमत्कार हो जाय और वे एकाएक सुन्दर हो जायँ ।
लेकिन तॉलस्तॉय अपनी चाची की बातों को भूलते न थे । बचपन से ही उनमें दूसरों को प्यार करने प्रसन्नता देने और सभी का प्यार पाने की क्षमता थी । उन्होंने अपने मन में चाची की बात सँजो ली थी और वे अच्छा, समझदार और बिद्वान बनने के लिए कोशिश करने लगे ।
बच्चो, संसार में सभी लोग एक से नहीं होते । कुछ सुन्दर होते हैं । कुछ सुन्दर नहीं होते । लेकिन हमेशा से दुनिया में सुन्दरता का नहीं, समझ और बुद्धि का सम्मान किया गया है । तुम्हें जान कर अचरज होगा कि यूनान के विश्व –प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात सुन्दर नहीं थे । लेकिन आज सारा संसार उनके ज्ञान और ऊँचे विचारों के आगे सिर झुकाता है । तुम्हें भी इससे शिक्षा लेनी चाहिए ।
उपेन्द्रनाथ अश्क

