
सृजनगाथा
रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन
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संस्मरण
प्रेमचंदः कुछ यादें
छोटक अपने से उम्र में 14 वर्ष बडे भाई का पिता के समान आदर और सम्मान करते थे।सिर नीचा किये दबी जबान से उत्तर दिया, “नहीं भैय्या, उस समय 11 बजे थे । प्रेस से उठा तो छविनाथ जी अपने साथ लिवाते गये । वहीं खाते-पीते 10 बजे गये थे।”
प्रेमचंद मुस्कराते हुए बोले, “मैंने तो समझा कि सबेरा होने को है । सो तभी से बैठा लिख रहा था । समय का अन्दाज ही नहीं रहा ।”
भैया की बातें सुनकर छोटक न केवल आश्चर्यचकित रह गये बल्कि मन ही मन अपराध-बोध का अनुभव करते हुए सोचने लगे कि उनके कारण नाहक भैया की नींद उचट गयी और वह सारी रात सो नहीं सके । परन्तु प्रेमचंद के चेहरे पर उस समय भी थकान का नामो-निशान न था और वह तरो-ताजा दिख रहे थे ।
8 अक्टूबर 1959 को प्रेमचंद की 23 वीं पुण्यतिथि के अवसर पर जब देश के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ.राजेन्द्र प्रसाद लमही ग्राम में प्रेमचंद स्मारक का शिलान्यास करने आये हुए थे, उस समय अपने स्वागत-भाषण में भी महताब राय ने उक्त घटना का उल्लेख अश्रुपुरित नेत्रों से किया था । ऐसी थी प्रेमचंद की तन्मयता कि लिखते समय उन्हें समय की सुधि-बुधि नहीं रहती थी । शायद उनकी विलक्षण सृजन-क्षमता का राज भी यही था । रात के समय उनके कमरे में मिट्टी के तेल से जलने वाला लैम्प कभी बुझाया नहीं जाता था । लेटते समय वह लैम्प की बत्ती थोडी नीची कर दिया करते थे ताकि यदि रात में कोई नई थीम या विचार उनके दिमाग में आये तो वह तुरन्त लैम्प की बत्ती उसका कर अपने विचारों को लिपिबद्ध कर सकें ।
एक बार की बात है कि प्रेमचंद अपने मकान के सामने पत्थर के चबुतरे पर बैठे नाई से हजामत बनवा रहे थे । दाढी बनाने के बाद नाई ने अपनी चमडे की पिटारी से नहरनी निकाली और प्रेमचंद के हाथ की उँगलियों के नाखून काटने लगा । हर उँगली का नाखून वह पाँच-छः प्रयास में छोटे-छोटे टुकडों में कुतर-कुतर कर निकाल रहा था । प्रेमचंद से देखा न गया । मजाकिया लहजे में बोले, “क्यों जी नियामत(गाँव का हज्जाम), एक लखनऊ के हज्जाम होते हैं जो उँगली के एक सिरे पर नहरनी लगाते हैं और एक ही बार में आहिस्ता से दूज के चाँद जैसा नाखून का खूबसूरत टुकडा तराश कर रख देते हैं, एक तुम हो कि एक-एक नाखून पाँच-छः हुचक्कों में कुतर रहे हो ।” इतना कह कर वह ठहाका लगा कर हँस पडे । नाई को बेहद शर्मिन्दगी महसूस हुई ।
एक समय था जब प्रेमचंद की विशिष्ट पहचान उनके सेब जैसी गुलाबी गालों, लम्बी-घनी काली मूँछों और स्वच्छंद अट्टहास से हुआ करती थी । वह कोई चुटीली बात कहकर इतने जोर का ठहाका लगाते थे कि कमरा हिल उठता था और घर के बाहर तक उनका मुक्त हास सुनायी पडता था । कालान्तर में धीरे-धीरे उदर रोग ने उनके चेहरे की कान्ति फीकी कर दी और बडी-बडी गुच्छेदार मूँछों के स्थान पर वह होठों के बराबर छोटी मूँछें रखने लगे थे ।
तोहसे नाहीं देख जात हौ का
एक दिन प्रेमचंद के मकान से सटे पक्के कुएँ पर अन्तू महतो का पुरवट चल रहा था । दोपहर के समय प्रेमचंद नहाने के लिए वहाँ पहुँचे । अन्तू अपनी खरी-खोटी बातों और कडक-मिजाजी के लिए कुख्यात था । यद्यपि गाँव के रिश्ते के नाते वह प्रेमचंद को चच्चा कहकर सम्बोधित करता था और उम्र में भी उनसे छोटा ही था, फिर भी अपने तीखे स्वभाव के अनुरुप उसने प्रेमचंद से एक बतुका प्रश्न दाग ही दिया, “कहो चच्चा, आजकल तूँ कुछ करत-धरत नाहीं हौ अ, देखीला दिनवा भर घर ही में घुसुरल रहै ल--। खेतो-बारी थोडिकै है और उहो अधिया पर उठल हौ । आखिर तोहार खरचा-खोराकी कैसे चलैला ।” प्रेमचंद पहले तो अन्तू के प्रश्न पर खूब हँसे और फिर नहले पर दहला रखते हुए बोले, “अरे अन्तू तू काहे के पेरशान हौअ...। आजतक कभों तोहसे त कुछ माँगे नाहीं गइली । केहू क .... चैन से घरे बइठलो तोहसे नाहीं देख जात हौ का ।” इस करारे उत्तर पर अन्तु महतो अपना सा मुँह लेकर रह गये । अपनी मोटी कृषक बुद्धि के कारण उन्हें क्या पता था कि एक बुद्धिजीवी घर में बैठकर भी अपनी सृजनशीलता और बुद्धिबल से कलम घिसकर कमायी कर सकता है । वह तो काम धन्धे का मतलब किसी नौकरी-चाकरी या व्यवसाय को ही मानता था ।
प्रेमचंद के तमाचे की याद
प्रेमचंद का मकान गाँव के बिल्कुल उत्तरी छोर पर स्थित था । उसके बाद आमों का बाग, बाँसों के झुरमुट और फिर खेत-खलिहान थे । एक दिन की बात है कि उनके घर के उत्तर स्थित बाग में गाँव के कुछ लडकों के साथ मैं भी आम के पेड पर ढेलेबाजी कर रहा था । हम लोगों का लक्ष्य था आम की उँची टहनी पर लटक रहा चार पके आमों का गुच्छा । काफी प्रयास के बाद भी हम लोगों को आम का वह गुच्छा गिराने में कामयाबी नहीं मिली । खूब शोर-शराबा मचा रखा था हम लोगों ने । प्रेमचंद अपने कमरे में बैठे कुछ लिख रहे थे । शायद हम लोगों के हल्ले-गुल्ले से उनकी एकाग्रता भंग हो रही थी । वह कमरे से बाहर निकले और हम लोगों की कल्पना के विपरीत डाँटने के बजाय मुस्कराते हुए बोले, “तुम लोग कब से ढेलेबाजी कर रहे हो और आम का एक गुच्छा भी मार कर नहीं गिरा सके । लाओं, एक ढेला मुझे दो, मैं देखता हूँ ।” उन्होंने एक ढेला लेकर पके आम के गुच्छे को लक्ष्य कर ऐसा निशाना लगाया कि एक ही बार में चारों पके आम जमीन पर गिर कर बिखर गये । उन्होंने हम बच्चों को आम बाँटते हुए कहा, “अच्छा, अब यहाँ से रफ्फूचक्कर हो जाओ । मुझे फिर शोर नहीं सुनायी पडना चाहिए ।”हम लोग आम चूसते हुए चुपचाप वहाँ से खिसक गये । उसके बाद कई दिनों तक बच्चों की वहाँ आने की हिम्मत नहीं हुई ।
15-20 दिनों बाद अचानक फिर कुछ बच्चे खेलते हुए उसी बाग में आ पहुँचे । उन्हें देखकर मैं भी अपने बडे भाई रामकुमार राय के साथ वहाँ जा पहुँचा । प्रेमचंद के कमरे में खिडकी बंद थी । हम लोगों ने समझा कि वह कमरे में नहीं हैं । फिर आम पेड पर ढेलेबाजी शुरू कर दी । इसी बीच संयोगवश लालू (रामचन्दर लाल) नामक एक लडके के हाथ से छूटा एक नुकीला ढेला बहक कर मेरे बडे भाई की कनपटी के ऊपर आ लगा और खुन बहने लगा । वह जोर-जोर से रोने लगे । आवाज सुनकर प्रेमचंद दरवाजा खोलकर गुस्से से तमतमाये कमरे से बाहर निकले और लालू, जिसके हाथ से छूटा ढेला भाई की कनपटी पर आ लगा था, का कान ऐंठकर ऐसा तमाचा रसीद किया कि उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई । भन्नाता सिर लिए वह भाग खडा हुआ और कई महीने तक वह प्रेमचंद के घर के करीब नहीं दिखलाई नहीं पडा । बच्चों के खातिर खुद बच्चा बनकर एक दिन पेड पर ढेले का अचूक निशाना साधने और हम बच्चों को पके आमों का तोहफा देने वाले प्रेमचंद के क्रोध का पारा उस दिन अपने परिवार के एक बच्चे के सिर से बहते खून को देख कर इस चढ गया कि वह आपे से बाहर हो गया और ढेला चलाने वाले बच्चे को ऐसा करारा तमाचा जड दिया कि उसे नानी याद आ गई । उस समय का लालू नामक वह लडका कब का सरकारी सेवा से अवकाश ग्रहण कर अब बुढापे के दिन गुजार रहा है । बातों-बातों में जब कभी उसे प्रेमचंद द्वारा जमाये गये तमाचे की याद दिलायी जाती है तो आज भी उसे अपने गाल पर उस तमाचे की गरमाहट महसूस होने लगती है । फिर भी उसे उस बात का फख्र है कि बचपन में वह प्रेमचंद के जैसे महापुरूष के हाथों एक तमाचा खा चुका है, भले ही उसका अपराध अनजाने में किया गया रहा हो ।
खेलों का राजाः गुल्ली डण्डा
प्रेमचंद को ढेले से अचूक निशाना लगाने के साथ ही गाँवों के लोकप्रिय खेल गुल्ली-डंडा में भी महारत हासिल थी । प्रायः फुर्सत के समय वह गाँव के हम-उम्र लोगों के साथ इस खेल का लुत्फ उठाया करते थे । इसकी झलक “गुल्ली-डंडा” शीर्षक प्रसिद्ध कहानी में भी देखने को मिलती है । आइये, जरा आनंद तो लें उनके इस पंसदीदा खेल का स्वयं उन्हीं के शब्दों में-
“हमारे अंग्रेजीदाँ दोस्त माने या न माने, मैं तो यही कहूँगा कि गुल्ली-डंडा सब खेलों का राजा है । अब भी कभी लडकों को गुल्ली-डंडा खेलते देखता हूँ तो जी लोट-पोट हो जाता है कि उनके साथ जाकर खेलने लगूँ । न लॉन की जरूरत, न कोर्ट की, मजे में किसी पेड से एक टहनी काट ली, गुल्ली बना ली और दो आदमी भी आ गये तो खेल शुरू हो गया ।....यह गुल्ली-डंडा है कि बिना हर्र-फिटकिरी के चोखा रंग देता है।....मुझे गुल्ली ही सब खेलों से अच्छी लगती है और बचपन की मीठी स्मृतियों में गल्ली ही सब खेलों से मीठी है । वह प्रातःकाल घर से निकल जाना, वहाँ पेड पर चढकर टहनियाँ काटना और गुल्ली-डंडा बनाना, वह उत्साह, वह लगन, वह खिलाडियों का जमघट, वह पदना और पदाना, वह लडाई-झगडे, वह सरल स्वभाव जिसमें छूत-अछूत, अमीर-गरीब का बिल्कुल भेद न था, जिसमें अमीराना चोंचलों के प्रदर्शन की, अभिमान की गुंजाइश ही न थी । घर वाले बिगड रहे हैं, पिता जी चौके पर बैठे वेग से रोटियों पर अपना क्रोध उतार रहे हैं, अम्मा की दौड केवल द्वार तक है लेकिन उनकी विचारधारा में मेरा अंधरकारमय भविष्य टूटी हुई नौका की तरह है और मैं हूँ कि पदाने में मस्त हूँ । न नहाने की सुधि है न खाने की । गुल्ली है जरा सी, पर उसमें दुनिया की मिठाइयों की मिठास तमाशों का आनन्द भरा है ।”
प्रेमचंद की निजी जिन्दगी से जुडे ऐसे ही छोटे-मोटे प्रसंगों की याद जेहन में कौधा करती है जिन्हें फिर कभी अवसर मिलने पर लिखूँगा ।
कृष्ण कुमार राय
E-mail:Srijangatha@gmail.com
अंक-2. जुलाई 2006

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