
सृजनगाथा
रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन
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संस्मरण
प्रेमचंदः कुछ यादें
कृष्ण कुमार राय
(प्रेमचंद परिवार के जीवित सदस्यों में सबसे वरिष्ठ कृष्ण कुमार राय का मार्मिक संस्मरण । हम उनकी रचनात्मकता पर कृतकृत्य हैं । उनकी प्रकाशित कृतियों में बीसवीं सदी के सर्वश्रेष्ठ कथाकार प्रेमचंद, गल्प समुच्चय(अंबिका प्रसाद दिव्य पुरस्कार) तरंगिणी व देवी वारांगणा महत्वपूर्ण हैं । 81 वर्ष की अवस्था में भी लगातार सृजनरत हैं । संपर्क है उनका- कृष्ण कुंज, एस.2-51ए, अर्दली बाजार, अधिकारी हॉस्टल के समीप, वाराणसी, (उ.प्र.)221002 -संपादक )
धनपत राय उर्फ नवाब राय यानी प्रेमचंद नाम है उस अजीम शख्सियत का जिसने कथा-साहित्य के क्षेत्र में हिन्दी तथा उर्दू भाषा-भाषियों के बीच अपनी अमिट छाप छोडी है। तुलसी के बाद यदि भारत में कोई सर्वाधिक लोकप्रिय साहित्यकार हुआ है तो वह निर्विवाद रूप से प्रेमचंद ही हैं जिनके उपन्यासों तथा कहानियों ने हिन्दी और उर्दू भाषा-भाषी राज्यों के घर-घर और जन-जन के बीच तो अपनी पैठ बनायी ही है, अहिन्दी भाषा-भाषी राज्यों और विदेशों में भी जिनकी कालजयी रचनाओं के अनुवादों ने पाठकों का मन मोह लिया है ।
प्रेमचंद की रचनाओं में जो ताजगी और प्रासंगिकता अपने रचना-काल के समय थी वह आज भी कायम है और संभवतः आने वाले समय में भी लम्बे समय तक यथास्थिति बनी रहेगी । इतना जरूर है कि पिछले छःसात दशकों में देश की राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में बदलाव आ जाने के कारण कुछ रचनाओं को उस समय के परिदृश्य और परिस्थितियो को ध्यान में रखकर पढना होगा ।
प्रेमचंद की दूर-दृष्टि विलक्षण थी । उनका यथार्थवादी साहित्य अपने समय के समाज, घटनाक्रमों तथा परिस्थितियों का आईना तो है ही, सुदूर भविष्य के बारे में भी उनके विचार और दृष्टिकोण सत्य की कसौटी पर शत-प्रतिशत खरे उतर रहे हैं । बीसवीं शताब्दी के आरम्भ से चौंथे दशक तक की तमाम ज्वलंत सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं, यथा विदेशी शासकों द्वारा किया जा रहा शोषण और अत्याचार, प्रशासन तंत्र की जडों तक समाया भ्रष्ट्राचार, जमींदारों का जुल्म, दलितों और गरीबों का उत्पीडन, बाल-विवाह, विधवा-विवाह जाति एवं वर्ग भेद, दहेज की कुप्रथा, नारी की व्यथा आदि विविध विषयों पर तो उन्होंने पुरजोर तरीके से कलम चलायी ही है, जनसंख्या विस्फोट और परिवार नियोजन जैसी ज्वलंत समस्या, जिसकी आज से सात-आठ दशक पहले न कहीं चर्चा थी और न कभी किसी बुद्धिजीवी ने इस विषय पर चिन्तन ही किया था, उन्होंने अपने कथा-पात्रों के माध्यम से गंभीर परिणाम की चेतावनी दे डाली थी जो आज सत्य की कसौटी पर कितनी सही साबित हो रही है यह किसी से छिपा नहीं ।
प्रेमचंद के कृतित्त्व पर, उसकी प्रासंगिकता पर अब तक काफी चर्चा हो चुकी है, बहुत कुछ लिखा जा चुका है तथा उसका पर्याप्त मंथन, समीक्षा, आलोचना एवं समालोचना हो चुकी है और अभी आगे भी होती रहेगी । देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में अब तक चार सौ से अधिक शोधार्थियों द्वारा प्रेमचंद पर शोध-प्रबन्ध प्रस्तुत किये जा चुके हैं जिनपर उन्हें डाक्टरेट की उपाधियां प्रदान की गयी हैं, परन्तु प्रेमचंद की निजी जिन्दगी के अनेकानेक ऐसे अछूते प्रसंग है जिनसे उनकी लेखन के प्रति प्रतिबद्धता, तन्मयता, विनोद-प्रियता, वाक्-पटुता, सरल और निश्छल स्वभाव तथा सीधी-सादी आडम्बर-रहित जिन्दगी पर प्रकाश पडता है । प्रेमचंद परिवार के वरिष्ठतम जीवित सदस्य के रूप में आज मैं यहां ऐसे ही रोचक और प्रेरक प्रसंगों का उल्लेख करना चाहता हूँ जिनके सम्बन्ध में पारिवारिक दायरे के बाहर शायद अभी कम ही लोगों को जानकारी होगी ।
प्रेमचंद बडे ही स्वाभिमानी व्यक्ति थे और सम्मानपूर्ण जिन्दगी जीने तथा बाल-बच्चों की परवरिश के लिए उन्हें सतत संघर्षरत रहना पडा । प्रारंभिक वर्षों में वह सरकारी शिक्षा विभाग में नौकरी करते रहे और बाद को अपना स्वयं का प्रेस तथा प्रकाशन व्यवसाय सँभालते रहे । कुछ वर्षों तक तो उन्हें इस कार्य में अपने अनुज महताब राय का सक्रिय सहयोग प्राप्त रहा, किन्तु पारिवारिक कारणों से बाद में इसमें टूटन आ गयी और सारा भार अकेले उन्हीं के कन्धों पर आ पडा । इस प्रकार उनका दिनभर का समय तो नौकरी करने और बाद को अपने व्यवसाय की देखरेख में गुजर जाता था । अपना समस्त लेखन कार्य वह प्रातःकाल तथा रात्रि के समय लैम्प की रोशनी में किया करते थे, वह भी ऐसे समय में जब न तो आमतौर पर फाउन्टेन-पेन का प्रचलन था और न डॉट-पेन का अस्तित्व । फाउन्टेन-पेन तो उस समय विलासिता की वस्तु समझी जाती थी और उसका उपयोग सम्पन्न लोगों तक ही सीमित था । सामन्यतः लोग लिखने का काम निब वाली कलम से बार-बार स्याही में डुबोकर किया करते थे । प्रेमचंद ने अपने जीवन-काल में जितना कुछ हिन्दी में लिखा है, उससे कहीं अधिक उर्दू में भी लिखा है । दोनों ही भाषाओं में उनकी रचनाएँ अपना मौलिक स्वरूप लिए हुए हैं । उन्होने पर्याप्त अनुवाद-कार्य भी किया है और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है । आंग्ल भाषा के भी वह अच्छे ज्ञाता थे और अँग्रेजी तथा उर्दू कथा साहित्य का उन्होने गहन अध्ययन किया था । चाहे उर्दू से हिन्दी में, हिन्दी से उर्दू में अथवा अँग्रेजी से हिन्दी –उर्दू में अनुवाद हो, अनूदित रचनाओं को भी मौलिकता का जामा पहिनाना उनकी विशेषता थी । यही कारण है कि पं. जवाहर लाल नेहरु ने आचार्य नरेन्द्र देव के माध्यम से प्रेमचंद से विशेष रूप से अनुरोध करके अपनी पुत्री(इंदिरा) के नाम जेल से लिखे गये अपने अति मार्मिक एवं शिक्षाप्रद पत्रों का हिन्दी और उर्दू भाषाओं में अनुवाद उन्हीं से कराया था । नेहरु जी की ओर से प्रस्ताव के बवजूद प्रेमचंद ने इस कार्य के लिए कोई पारिश्रमिक लेना स्वीकार नहीं किया । उक्त पत्रों के संकलन तीनों ही भाषाओं में पुस्तकाकार प्रकाशित हुए हैं । उत्कृष्ट अनुवाद के लिए नेहरु जी ने प्रमचंद के प्रति विशेष रूप से आभार व्यक्त किया था । इस प्रकार देखा जाय तो अपने मात्र 55 वर्ष के जीवन-काल में प्रेमचंद के अत्यन्त संघर्षपूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए इतना अधिक लेखन कार्य किया है कि उसकी कल्पना भी सामान्य जन द्वारा नहीं की जा सकती । इसीलिए तो सुप्रसिद्ध रचनाकार एवं प्रेमचंद के यशस्वी पुत्र अमृत राय ने उन्हें “कलम का सिपाही” माना है, हांलाकि बहुचर्चित समीक्षक एवं शोघकर्मी, अलीगढ विश्वविद्यालय के जनाब जैदी साहब ने उन्हें “कलम का सौदागर” तक कह डाला है । उस कलम के फनकार को कलम का जादूगर तो कहा जा सकता है किन्तु उसे कलम का सौदागर कहना उसके साथ सरासर अन्याय होगा क्योंकि सभी जानते हैं कि उस जमाने में उनका बेजोड साहित्य कौडियों के मोल बिकता रहा जो आज आज अनमोल रत्न बन चुका है ।
तन्मयता और प्रतिबद्धता
लेखन कार्य के प्रति प्रेमचंद की तन्मयता और प्रतिबद्धता के सम्बन्ध में एक प्रेरक प्रसंग पाठकों की जानकारी के लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ। बात वर्ष 1922-23 की है । मेरे पिता तथा प्रेमचंद के एकमात्र अनुज स्व. महताब राय उन दिनों काशी से प्रकाशित प्रसिद्ध हिन्दी दैनिक “आज” के प्रेस-व्यवस्थापक थे । एक दिन प्रेस से छुट्टी मिलने पर वह अपने अभिन्न मित्र तथा “आज ” परिवार के ही वरिष्ठ सहयोगी पण्डित छबिनाथ पांडेय के साथ उनके घर चले गये । वहाँ खाते-पीते रात के दस बज गये । जब महताब राय उस समय की खस्ताहाल सडक पर साइकिल चलाते लमही ग्राम स्थित अपने घर लौटे तो रात के 11 बज चुके थे । उन्होंने आहिस्ता से दरवाजे की कुण्डी खटखटायी, किन्तु घर में प्रतीक्षारत बैठी मेरी माता जी के दरवाजा खोलने से पहले ही ऊपर की मंजिल में सोये प्रेमचंद की श्वान-निद्रा भंग हो गयी और वह खिडकी से झाँक कर बोले, “बडी देक कर दी छोटक” वह अपने अनुज को छोटक कहकर सम्बोधित करते थे । छोटक बिना कोई उत्तर दिये चुपचाप अन्दर चले गये, क्योंकि घर लौटने में देर तो हो ही गयी थी । जब वह सोकर उठे और लोटे में पानी लेकर शौच के लिए खेत की ओर जाने लगे तो बाहर चबूतरे पर बैठे प्रेमचंद दातुन-कुल्ला कर रहे थे । छोटक को देखकर बोले, “छोटक, रात जब तुम लौटे तो कोई तीन बज रहा होगा । इतनी रात तक कहाँ रूक गये थे ?”
क्रमशः....
E-mail:Srijangatha@gmail.com
अंक-2. जुलाई 2006

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