
सृजनगाथा
रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन
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E-mail:Srijangatha@gmail.com
अंक-2. जुलाई 2006
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साहित्य के एकांगी प्रवक्ता और उत्सुक पीढ़ी का असमंजस
...संसार में हर चीज़ बदलती है और इस बदलाव के बावजूद एक सनातन सत्य, समष्टि का रहस्य निरन्तर जीवित रहता हैं । इसी की खोज में अपने अंगो-उपांगो के साथ साहित्य प्रयत्नशील रहता है । अपने-अपने समय में इस रहस्य को खोजने के लिए प्रयोग होते रहते हैं, लेकिन अंतिम सत्य आज भी रहस्यमय है । जब तक सत्य छिपा हुआ है, साहित्य चलता रहेगा। चूंकि साहित्य का दूसरा, स्रष्टा मनुष्य है इसलिए यह आरोप बेबुनियाद नहीं कि उसने अधिकांश अभिव्यक्तियां स्वकेंद्रित या स्व के आसपास की है । ‘स्व’ से मुक्त होने पर साहित्य समष्टि का मार्ग अपनाता है । इसीलिए आम पाठक की भी यात्रा की शुरुआत ‘स्व’ से रुबरु होते हुए होती है। इसका भटकाव अस्वाभाविक नहीं है । सवाल फिर वहीं छुट गया देश, काल के सन्दर्भ में साहित्य को परिभाषित होना चाहिए या नहीं होना चाहिए ?
जब साहित्य दार्शनिक प्रश्नों से जूझता है तो ये बातें गौण हो जाती हैं । देश, काल का अतिक्रमण करते हुए वैश्विक स्तर पर साहित्य के प्रतिमानों में परिवर्तन अवश्यंभावी है । सौंदर्य का प्रतिमान यदि दक्षिण अफ्रीका में ‘ब्लैक इज ब्यूटी’ है तो गोरों के देश में इसके विपरीत और अन्यथा होना अस्वाभाविक तो नहीं है । समष्टि के धरातल पर पहुंचा सर्जक, विश्वदृष्टा वैश्विक साहित्य सर्जन के पूर्व ‘स्व’ की घेरेबन्दी से निकलकर ‘आत्मा’ के एकरुप सौंदर्य का प्रतिमान रचता है, परमतत्व के साक्षात्कार की प्रक्रिया से गुजरता है । महान साहित्य इस सूक्ष्म आध्यात्मिक साधना की परिणति होता हैं, साहित्य की सर्वसमावेशिता और सार्वभौमिकता इसी बिन्दु पर सिद्ध होती है जहाँ शब्द समाप्त नहीं होते और अनुभूत सम्पूर्ण आन्द अपने पूरे वेग से अभिव्यक्त होना चाहता है । ‘गीतांजलि’ में रवीन्द्रनाथ ठाकुर कहते हैं –
जन्म भर अपने गीतों द्वारा मैं अपने अन्तः करण व जगत् के
दिशा-दिशान्तर में तेरी खोज करता रहा हूं ।
मेरे गीत मुझे घर-घर द्वार-द्वार ले जाते रहे ।
इन गीतों द्वारा मैंने कितनी ही बार इस भुवन में
तेरा संदेश दिया, कितने ही गुप्त
रहस्यों का उद्घाटन किया, कितनी सीख मिली,
हृदय-गगन के कितने ही / तारों से मेरा परिचय हुआ ।
नानाविध सुख-दुख भरे प्रदेशों में मेरे गीतों ने भ्रमण किया
और अन्त में,
संध्या वेला में ये गीत अनेकों रहस्यलोकों से मुझे
न जाने किस भवन में ले आये हैं ।
दिशा दिशान्तर में साहित्य के माध्यम से परमतत्व की खोज का कार्य सर्जक करता है । जिस भी देश के जिस भी युग में साहित्य की साधना इस उद्देश्य को लेकर हुई वह साहित्य काल को अत्क्रमित करता हुआ महान और साश्वत बना रहा ।
समष्टिगत अभिव्यक्ति के सार्थक समुच्चय रचते हुए सर्जक भौतिकता के द्वन्द्व से निःसृत सार्थ क अनुभवों को पिरोता है । समष्टिगत अभिव्यक्ति का तात्पर्य कल्पित अलौकिक अनुभूति की सरलीकृत प्रस्तुति नहीं है । यह एक अनुभव से दुसरे बहुआयामी अनुभव में सर्जकीय रूपांतरण की अविराम यात्रा है। यह महानुभव की महाभिव्यक्ति की दूर्लभ स्थिति है, जहां पहुंचकर साहित्य सर्वत्र अपेक्षाकृत दीर्घजीवी होने की संभावनाओं को जन्म देता है ।
मित्रों,इतनी लम्बी है साहित्य की यात्रा ! उत्सुकरजनों को शीघ्र निराश नहीं होना चाहिए । जो है उससे स्वस्थ और बेहतर की समावेशी दृष्टि अंततः अपनी चरम स्थिति में इसी महानुभूति को छूती हुई सृजन का अप्रतिम सुख पाती है । साहित्य का लगभग सत्य यही है ।
विजय कुमार देव
