
सृजनगाथा
रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन
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E-mail:Srijangatha@gmail.com
अंक-2. जुलाई 2006


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कविता का कथ्यः अंतदृष्टि और जगत-दृष्टि
आधुनिक कविता से पाठक की संप्रेषण संबंधी जो शिकायत है, उसकी चर्चा भी यहाँ करना जरूरी है । दरअसल हुआ यह है कि आधुनिक कविता में इतिवृत का प्रायः लोप होता चला गया है । पहले कविता में विषय, कथा या प्रचलित विश्वासों के सहारे संकेत पाना अधिक सहज हो जाता था । पाठक की यह कविता छिन गई इसलिए उसकी अभ्यस्त रुचियों को आधुनिक कविता जटिल जान पड़ी । कथा-रस, उत्तेजकता, रोमान और उपदेश कविता से लुप्त हो गये तो पाठक एक तरह से बेसहारा हो गया । वह काव्य की सूक्ष्मताओं को समझने की कोशिश करे कि कविता आगे निकल गई और पाठक पिछड़ गया । इस बीच रचनाकार की गति तेज़ होती चली गई और उसने कविता को अंतरानुभूति के साथ अन्वेषण और विश्लेषण की विधा बना दिया । क्योंकि यथार्थ के भीतर छिपे सत्य को खोजने की उसकी बेचैनी बढ़ गई, जो संभवतः हर युग के कवि की रही है, लेकिन आधुनिक कवि ने अपने औज़ारों को भी बारीक बनाया और कथ्य के लिए लगी बाहरी सीढ़ी गिरी दी । ये स्थितियाँ कविता को जटिलतर बनाती चली गईं । कलाकार को कविता उपलब्ध नहीं हुई, उसने उसे अन्वेषित किया तो पाठक से भी कविता को पाने की बैसी ही मांग की गई । यों संप्रेषण के लिए आधुनिक रचनाकार भले कितना ही व्याकुल रहा हो, व्यावहारिक रूप में संप्रेषण दूभर हुआ, इसमें शक नहीं । लेकिन इसका अगर कोई अच्छा नतीजा निकला तो यह कि पाठक का भी कविता के प्रति रवैया बदला और उसमें कविता के आस्वादन की नई समझ विकसित हुई । इसका प्रमाण यह है कि आज प्रबुद्ध पाठक को इतिवृत्तात्मक, नारेबाज़ और स्थूल उपादानों वाली कविता नहीं रुचती । उसके संस्कारों में यह बदलाव सिर्फ कविता की वजह से नहीं, जीवन की वजह से भी आया है । ज़ाहिर है कि कविता का यह बदला स्वाभाविक और युग की मांग के अनुरूप है । निश्चय ही इस दिशा में कवि ने ज़रूरी पहल की, क्योंकि सृजनशील मानस हमेशा अग्रगामी हुआ करता है । (शायद इसीलिए गहरे कवियों की प्रायः हर युग में यह शिकायत रही है कि उन्हें समझा नहीं जा रहा है । )
यहाँ प्रसंगवश अवधारणा, वस्त और रचना-प्रक्रिया के संबंधों की थोड़ी चर्चा करना उचित होगा, क्योंकि कई बार इनमें से किसी एक की जकड़न शेष दो को भी जकड़ लेती है । इससे प्रतिभा की उत्कटता सीमित होती है । इसलिए कि एक सर्जक को नया खोजने, अनुभव करने और रचने के लिए किसी न किसी स्तर पर अनवरत संघर्ष करना पड़ता है । यह कमायी हुई दृष्टि है । इसके विपरीत अगर कोई रचनाकार पहले से ही आदर्शीकरण या प्रारूपीकरण कर लेता है तो कवि-कर्म उसके लिए मात्र औपचारिक रह जाता है, क्योंकि उसी के अनुरूप स्थितियाँ और अनुभूतियाँ रची जाती हैं । छायावाद के आदर्शीकरण और प्रगतिवाद के प्रारूपीकरण ने जीवन और कविता दोनों का अत्यधिक सरलीकरण किया है । उदाहरण के लिए यदि छायावादी कवि प्रेम-निरूपण करता था तो पहले से वह निर्णय कर लेता था कि वह सुखांत होगा या दुःखांत, वह समर्पणपरक, त्यागमय, उत्सर्गशील या क्या कुछ होगा । फिर इस प्रत्ययीकरण पर चलते हुए, उसे रचना में पाना उसके लिए सरल हो जाता था । ऐसी व्यंजनाएँ क्या अनुभव की बाध्यता से रूपाकार ले पाती हैं ? मैं छायावाद की वायवीयता को किसी और अर्थ में नहीं, इसी अर्थ में लेता हूँ कि वस्तु या भाव के बारे में पूर्वपत्यय उस वस्तु या भाव को वायवीय बना देता है । वह एक युटोपिया ही है क्योंकि वहाँ दैनंदिन अनुभवों में, सत्य को नैसर्गिक अवस्था में पाने की अपेक्षा पूर्वग्रह में पाना ही ज़्यादा महत्त्व का हो जाता है । प्रगतिवादी भी पहले से ही व्यक्ति का, उसके वर्ग के हिसाब से प्रारूपीकरण कर लेता था, जिसके विरुद्ध वह नहीं जा पाता था । क्या हमें मनुष्य की प्रकृति इस तरह के सामान्यीकरण की छूट देती है ? इस मामले में छायावाद के बाद की आधुनिक कविता अधिक खुली है । इसलिए जटिलता के बावजूद वह यथार्थ के अधिक करीब है और उसके प्रति अधिक उत्तरदायी है ।
अब सवाल वस्तु के मूल्याँकन का है । अक्सर कथ्य का मूल्याँकन बहुत प्रारंभिक और यहाँ-वहाँ बिखरी स्थितियों के आधार पर कर लिया जाता है । जबकि कथ्य का उद्गम या प्रस्थान नहीं, उसका लक्ष्य और समग्र प्रभाव ही उसके मूल्याँकन की सही दृष्टि हो सकती है । क्योंकि कई बार कविता व्यक्तित्व की एकांत खोह से निकलती है, लेकिन सृजन-प्रक्रिया के दौर में या अंत में पहुँचकर वह नितांत सामाजिक हो जाती है । कई बार हम तात्कालिक आवेग को प्रेरणा मान लेते हैं । लेकिन प्रेरणा अनवरत जीवन-चेतना और दीर्घकालीन अंतर्रचना का परिणाम होती है । उदाहरण के लिए हम छायावादी युग की दो शोक-गीतियोँ को लेते हैं- आँसू और सरोज- स्मृति- दोनों का स्त्रोत वैयक्तिक विशाद है । परंतु पहली में वह व्यक्तिगत राग-व्यथा; काल के अननुमेय अभिशाप की त्रासद अनुभूति और अंततः लोकोत्तर दार्शनिकता में परिणत हो जाता है, लेकिन दूसरी कृति में वही वैयत्तिक विशाद, सामाजिक संत्रास, पाखंड और रूढ़ियों के खिलाफ एक दुर्दम्य क्षोभ में पर्यवसित होता है । दोनों शोक-गीतियोँ को पढ़ने पर, स्त्रोत की सजातीयता के बावजूद, भिन्न अनुभव प्राप्त होते हैं – इस भिन्नता का कारण स्त्रोत नहीं, प्रेरणा की समग्रता है । इसीलिए पहली कृति किसी हद तक जहाँ दुनिया से हमारे संबंधों को काटती है, वहीं दूसरी कृति संवेदनों को दुनिया से जोड़कर प्रश्न पूछने और उस पर आक्रमण करने को बाध्य करती है ।
कविता के वास्तविक अभिप्राय और प्रेरणा की पहचान एक अनवरत प्रक्रिया है, इससे न केवल कथ्य का, बल्कि शिल्प का रहस्य भी खुलता है । वास्तव में सर्जक के मानसिक संघर्षों और अंतर्विरोधों की गहराई में जाने पर ही कविता के मौलिक कथ्य का पता चलता है । बहुत-सी कविताओं में ऊपर से समष्टिपरकता दिखाई देती है, जबकि वास्तव में ये व्यक्तिवादी होती हैं । इससे उल्टी बात भी सच है । इसलिए ऐसी रचनाओं का वास्तविक मूल्याँकन कठिन होता है । प्रायः व्यक्तिवादी रचनाओं के भीतर एक निजी अनुभूतिप्रवण एकांत रहता है, यह कवि द्वारा व्यक्त होकर पाठक के भीतर भी निजी अस्मिता का बोध भले पैदा करता हो, शेष सृष्टि के साथ उसके संबंधों को विस्तृत नहीं करता; जबकि समष्टिपरक कवि में आने वाला मैं व्यक्तिपरक कवि के मैं से अलग स्तर का होता है । एक समाज के भीतर अपनी पहचान को सार्थक करता है, तो दूसरा मैं के भीतर अपनी पहचानों को ।
इसका मतलब यह नहीं कि व्यक्ति का अपना राग-जीवन, उसका एकांत, अपनी अस्मिता का भोग वगैरह बेमानी हैं और समष्टि-जीवन से उसका विरोध है । व्यक्ति-जीवन के प्रति गलत दृष्टिकोण ने प्रगतिशील रचनाओं को शुष्क बना दिया, और राग-जीवन को उससे निष्काषित कर दिया । क्या जीवन में भी ऐसा हुआ है ? या क्या यह कोई सामाजिक कोढ़ है ? मेरे विचार से यदि व्यक्तिवाद अहम् को पोसता है या समूह जीवन का प्रतिकार करता है या सामाजिक विकृति और घोर एकांत को अपनपाता है तो वह निश्चय ही मनुष्य और कविता, दोनों के लिए अवांछनीय है । मसलन अस्तित्ववादी दौर की ऐसी रचनाएः
एक भी ऐसा अँधेरा नहीं
तुम जहाँ सो सको
चीख भाषा की हुल्लड़ हो गई है
संभव नहीं रहा
रो सको
कैलाश बाजपेयी
या
पंक्तिबद्ध चींटियों का अनुशासनपूर्वक
एक के बाद एक बिलों में प्रवेश....
सब कुछ संतुष्ट, एक मैं ही असंतुष्ट
अँधेरा झेलने को बाहर हूँ शेष
श्रीकांत वर्मा
ऐसी कविताएं मनुष्य के सामूहिक व्यक्तित्व और उसके भीतर छिपी संभावनाओं को व्यापक इनकार से सरलीकृत करती हैं और अकेले घमंड को पोसती हैं । इन जैसी कविताओं के लिबास बहुत आदर्शवादी और समष्टि की चिंता से ग्रस्त मालूम होते हैं, लेकिन वास्तव में वे सिरे से एकांतग्रस्त हैं ।
यह सच है कि जिस संसार में हम रहते हैं उसमें आलोक, आनंद, उत्कंठा, प्रेम और विश्वास ही नहीं है, इनके विपरीत तनावों से भरी हुई असह्य स्थितियां भी हैं । यदि आज का कवि उनसे कतराकर निकल जाता है तो इसका अर्थ होगा कि वह किसी काल्पनिक सुखवाद के भीतर जी रहा है । अगर ये हमारे युग की सचाइयां हैं और उन्हें हम भोग रहे हैं, तो उनका साहित्य में व्यक्त होना भी अपरिहार्य है । परंतु कलाकार का य नागरिक दायित्व भी है कि वह अंधेरे में छिपी किसी अदृश्य चिंगारी या अमूर्त्त सत्य को भी उपलब्ध करे, जो उसे अपनी आत्मा के चैतन्य में मिलता है । क्योंकि (जैसा ल्युइस ने कहा है) ‘अंधेरे का चित्रण करने के लिए कोई कलाकार अपने चित्रफलक को ही काला करके नहीं धर देता ।’ एक सापेक्ष समझ और अंधेरे के भीतर छिपे प्रकाश के अदृश्य अणुओं का संधान कलाकार की विशिष्ट नागरिकता होती है, जो उसे प्रमाणित भी करनी होती है । यह संभावनाओं का सत्य ही नहीं, कलाकार की सच्ची सृसृक्षा और छटपटाहट भी है । क्योंकि कला-कर्म एक प्रज्ञात्मक चैतन्य कर्म भी है और एक अन्वेषण कर्म भी ।
प्रभाकर श्रोत्रिय
