
सृजनगाथा
रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन
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E-mail:Srijangatha@gmail.com
अंक-2. जुलाई 2006


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कविता का कथ्यः अंतदृष्टि और जगत-दृष्टि
*प्रभाकर श्रोत्रिय
शिल्प, कविता का औपचारिक माध्यम नहीं है, अंतर्वस्तु का प्रतिरूप है । कविता इसी के ज़रिये मूर्त और व्यक्त होती है । वस्तु या विचार जब तीव्र अनुभूति में तरंगित होते हैं तो वे तत्काल सौंदर्य-प्रतिरूपों में ढल जाते हैं । इसलिए कविता के कथ्य को उसके शिल्प से या शिल्प को कथ्य से जुदा नहीं किया जा सकता । फिर भी अगर उनका अलग-अलग विश्लेषण किया जाता है तो केवल उनके संबंधों की पूर्णता पहचानने के लिए ही । काव्यालोचन के लिए विश्लेषण एक ज़रूरी प्रक्रिया है- ठीक वैसे ही जैसे रचना के लिए संश्लेषण ज़रूरी होता है ।
लेकिन जो लोग केवल शिल्प को कविता समझते हैं, वे शायद यह कहना चाहते हैं कि कविता न तो जीवन का मामला है और न सौंदर्य का । क्योंकि सौंदर्य का आधार वस्तु-जगत है । संसार को भुलाकर आप किस सौंदर्य की बात करेंगे ? और कविता केवल विचार भी नहीं है । क्योंकि मात्र विचारक होना कवि होना नहीं है, न केवल भुक्तभोगी होना । कविता हमेशा भाषा में हुआ करती है । कविता ‘भाषा में आदमी होने की तमीज़’ है (धूमिल)- ‘सिर्फ आदमी होने की तमीज़’ नहीं । विचार और जीवनानुभव जब तक कविता के शब्द नहीं बनते तब तक वे केवल विचार और अनुभव हैं, कविता नहीं । कविता के उपादान ही कविता को रूपवान बनाते हैं और वे ही संप्रेषण के माध्यम भी हैं । इसलिए वस्तु पर, शिल्प को नज़रअंदाज़ करके कोई बात करना कविता की बुनियादी शर्त से ही इनकार करना है ।
यहाँ सवाल पैदा होता है कि अगर कथ्य़ को अर्थवान भाषा और श्रेष्ठ विन्यास मिल जाए तो क्या कवि-कर्म पूरा हो जाता है ? अगर रचना की प्रामाणिकता भोगे हुए यथार्थ की सच्ची अभिव्यक्ति है, तो भोगे हुए यथार्थ की प्रामाणिकता क्या है ? क्या लोग अट्टालिकाओं में बैठकर वासना की पीड़ा नहीं भोगते ? क्या एक सुख –सुविधा के बाद दूसरी सुख-सुविधा के लिए तड़पते नहीं हैं ? इन्हीं अनुभूतियों को अगर कविता में उत्कृष्ट कलात्मक सामंजस्य में रख दिया जाए तो क्या ये प्रामाणिक अनुभूतियाँ कहीं जाएंगी ?
असल में कविता के सामने अभिव्यक्ति का ही संकट नहीं, सच्ची जीवनानुभूति का संकट भी है । क्योंकि जीवन ‘कोई खिलवाड़ नही है।’ तमाम अनुभवों, विचारों और प्रसंगों के बीच से अर्थवान का चुनाव कोई आसान काम नहीं है । रचनाकार अगर आजीवन सही दृष्टि की खोज में अनवरत लगा रहे तब कहीं जाकर सही जीवन –दृष्टि मिलती है और नीर-क्षीर-विवेक पैदा होता है । आजीवन खोज में लगे रहने के बाद ही प्रेमचंद को वह दृष्टि मिली जिससे ‘गोदान’ रचा जा सका । डा.देवराज ने कथ्य के विकास के बारे बहुत मार्मिक बात कही हैः ‘कथ्य के विकास का अर्थ है- लेखक का लगातार जीवन की एक समन्वित दृष्टि’(vision) की ओर अग्रसर होना । इस कोटि की अग्रगति या प्रगति उसी लेखक की चेतना में घटित हो सकती है, जो जीवन की समग्रता में अर्थपूर्ण संघटन देखने और पाने के लिए उत्सुक है । जीवन कोई खिलवाड़ नहीं है- विशेषतः इस युग में, जबकि चारों ओर से स्वीकृत मूल्यों पर आघात और आस्थाओं का विघटन हो रहा है । ऐसी स्थिति में जीवन का स्वीकृत, अर्थपूर्ण परिप्रक्ष्य प्राप्त करना अपने में एक बड़ी साधना है । जाहिर है कि इस साधना में भीतर और बाहर के लंबे संघर्ष की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है । जिसकी बाहर की आँख खुली नहीं होती है उसकी अंतर्दृष्टि या तो अध्यात्म-साधना है, या छल । वह काव्य के काम की नहीं । इसी तरह अंतर्दृष्टि के बिना रहस्य उद्घाटित नहीं होते । दोनों के रिश्ते शब्द और अर्थ के होते हैं ।
आनंदवर्धन ने लिखा है कि कवि के पास शब्द होते हैं और सहृदय अर्थ चाहते हैं(सहृदयश्लाघ्यः काव्यात्मेति व्यवस्थितः........ध्वनिविज्ञान...1/2) यानी कवि के पास आत्मानुभूत शब्द और सहृदय शलाघ्य अर्थ दोनों होने होते हैं । दोनों का होना दो संसारों की एक में उपस्थिति है-यही रचनाकार की प्रतिभा है जो वस्तु भी देती है और अपूर्व भी । यह किसी आंदोलन, वाद या संप्रदाय की हिदायत से पैदा नहीं होती- अनवरत साधना से ज्वलित और प्रखर होती है । कोई कह दे कि कला में कथ्य वगैरह के कोई मायने नहीं, वह महज़ दृश्यमान आकारों का संयोजन है (सूसन लेंगर) –और कवि नए-नए अनुभूत रूप जोड़ने लगे ! कोई कह दे कि कवि, तुम सर्वहारा के नेता बन जाओ और आर्थिक कविता करो (काडवेल) और कवि नारे लगाने लगे ! न तो यह कवि का मार्ग है न सच्ची साधना । जब कविता में परोक्ष अनुभूति का हल्ला मचा हुआ था, तब आचार्य शुक्ल ने बड़े मार्के की लताड़ दी थी कि
‘जिस तथ्य का हमें ज्ञान नहीं, जिसकी अनुभूति से वास्तव में कभी हमारे हृदय में स्पंदन नहीं हुआ, उसकी व्यंजना का आडंबर रच कर दूसरों का समय नष्ट करने का हमें कोई अधिकार नहीं है ।’ (चिंतामणि-2 पृष्ठ 69)
कविता लौकिक हो या अलौकिक- उसमें व्यक्त विचार, अनुभूति और अभिप्राय के गुणावगुण की परीक्षा तभी होती होगी, जब यह तय हो जाए कि वे कितने सच्चे और प्रामाणिक हैं ?
यथार्थ जगत प्रामाणिकता का आधार है जैसे समस्त व्यंजनाओं का आधार अमिधा होती है । कविता का यथार्थ और जीवन का यथार्थ दो भिन्न वस्तु नहीं है भले ही वह कविता में चाहे जितना व्यापक और सर्जनात्मक हो उठे । इसलिए जीवन से साक्षात्कार, जीवन का प्रेक्षण भर नहीं, उसमें शामिल होना, उसे समझना और उसका विवेकसंगत विश्लेषण करना भी है । तमाम समयों में विविध ज्ञान-क्षेत्र और मर्म-क्षेत्र यह काम करते रहे हैं । रचनाकार का इनके बीच से गुज़रना और लाभान्वित होना स्वाभाविक है, शायद इसी प्रक्रिया में नाना पुराणों और शास्त्रों से तुलसी गुज़रे होंगे; और निराला, प्रसाद, मुक्तिबोध और अज्ञेय को भी गुज़रना पड़ा होगा । लेकिन इस ज्ञान-यात्रा और कर्म-यात्रा के साथ कवि की अंतर्यात्रा भी जारी रहती है और लोक-यात्रा भी । इस तरह ज्ञान, प्रेक्षण, अनुभव और विवेचना के ज़रिए लेखक ज्ञात या अज्ञात रूप से सृजन के मुद्दे तय करता है ।
अगर हम कवि के सामाजिक न्याय को उदाहरण के लिए चुनें, तो पाएंगे कि वह यहाँ किस ज़मीन को पहचानने की कोशिश करेगा- यानी जहाँ वह इंसान और कवि के रूप में एक साथ खड़ा हो सके । ऐसे में कवि क्या निर्णय लेगा ? अगर वह संसार को विषमताओं से भरा देखता है तो उसे दो छोर दिखाई देते हैं, वह किस छोर को पकड़े कि उसके कवि और मनुष्य की संवेदना को सार्थकता मिले ? ज़ाहिर है यह कमज़ोर का पक्ष होगा- वह पक्ष जो लांछित, अपमानित, शोषित पस्त और बेसहारा है । वह निर्णय लेता है कि यही उसका पक्ष है । यहीं वह बंधा हुआ है, इन्हीं के वास्ते वह कटिबद्ध है । यह प्रतिबद्धता उसके ‘काव्य न्याय’ की नई परिभाषा होगी । क्योंकि जिसे हम न्याय कहते हैं वह भी सत्य का पक्षधर होता है, तभी वह अपराधी झूठे को सज़ा देता है । एक न्यायसंगत कविता का काम यही है- ऐसी पक्षधरता जो एक और संवेदना हो, और दूसरी ओर उस तमाम व्यवस्था, व्यक्तियों, समूहों, विचारों आदि के विरोध में खड़ी हो, जो मनुष्य के बुनियादी और न्यायसंगत अधिकारों को कुचलती और उसे चूसती है । मेरा विचार है कि प्रक्रिया, शैली, स्त्रोत, पृष्ठभूमि आदि के अलग-अलग- होने के बावजूद सामाजिक अवधारणा से लिखी गई दुनिया भर की श्रेष्ठ कविता सताए हुए कमज़ोर इंसान की तरफदारी करती है और अपने-अपने युग में, अपनी-अपनी स्थितियों और समस्याओं के बरक्स वह अपने ढ़ंग से यही पक्ष-विपक्ष कूतती है । अगर वह ऐसा करती है तो इसलिए नहीं कि वह ‘राजनीतिक’ या आर्थिक है, बल्कि इसलिए कि वह कविता है । यथार्थ का पुनर्सृजन करना और इस प्रक्रिया में बाहर की दुनिया को भीतर के संसार में बदलना कविता के मौलिक स्वभाव में शामिल है । वह सामाजिक परिवर्तन का उस तरह अस्त्र भी नहीं है जिस तरह का राजनीति या अर्थशास्त्र है । वह मनुष्य के रूपांतरण की नहीं, व्यक्तित्वांतरण की विधा है । उसकी खूबी यह है कि वह विषय नहीं, वस्तु प्रेषित करती है और कई बार कटाक्ष से अपनी बात कहती है ।....
क्रमशः
