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अंक-2. जुलाई 2006

 

सृजनगाथा  

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

 

 

 

 

 

 

        

           

 

 

 

 

 

 

 

 

 

बाजार में मीडिया शिक्षा

संजय द्विवेदी

       ए शिक्षा सत्र की दस्तक होते ही अखबार और प्रचार माध्यम ढ़ाई के विविध अनुशासनों के विज्ञापनों से भर जाते हैं । तेजी से बदलती दुनिया, नए विषयों के उदय के बीच मीडिया के विविध क्षेत्रों की डिग्रियाँ लेकर भी तमाम संस्थान बाजार में हाजिर हैं । डिप्लोमा और डिग्रियों के सरकारी संस्थानों के अलावा ढेरों प्राइवेट संस्थान भी सामने आए हैं। साथ ही साथ विभिन्न समाचार पत्र समूहों तथा समाचार चैनलों ने भी मिडिया शिक्षण के संस्थान खोले हैं ।

 

       मीडिया की दिनोंदिन चमकीली होती दुनिया के प्रति युवक-युवतियों का आकर्षण स्वाभाविक है । टी.वी. पर दिखने का आकर्षण इस जोश को उफान में बदल रहा है । शायद इसीलिए मेट्रों के कुछ अखबारों में ऐसे भी विज्ञापन छपने लगे हैं- एक हफ़्ते में न्यूज एंकर । जाहिर है पत्रकारिता शिक्षा के ये परचूनिए भी सफल हैं और उन्हें भी कुछ युवा मिल ही जाते हैं ।

      

        हाल के वर्षों में समाज जीवन में जिस तरह के तेज परिवर्तन देखे गए, उससे यह सदी आक्रांत है । नई तकनीक और संचार के साधनों ने जिस तरह हमारे समय को प्रभावित किया है वह अद्भूत है  हमारे आचार, व्यवहार सबमें ये चीजें देखी जा सकती हैं । इसे प्रभावित करने में सबसे सशक्त माध्यम के रूप में उभरा है मीडिया । अखबार, टी.वी.चैनल्स, विज्ञापन, इंटरनेट, फिल्मों, विपणन रणनीतियों और जनसंपर्क की नई प्रविधियों के समुच्चय से जो दुनिया बनती है वह बेहद सपनीली है । जहाँ पावर है, पैसा है, सौंदर्य है, सारा कुछ फीलगुड । मीडिया का यह व्यापक होता फलक अब समाज को सर्वाधिक प्रभावित करने की मुद्रा में है । मीडिया के किसी भी माध्यम के साथ जुड़ी पूंजी ने इसे बहुत व्यवहारिक बना दिया है । शायद इसीलिए यह क्षेत्र आज भारी संख्या में प्रशिक्षितजनों की माँग और इंतजार में खड़ा है । फैशन वर्ल्ड से लेकर इवंट मैनेजमेंट के रोज खुलते क्षितिज उन पेशेवरों के इंतजार में है जो व्यवसाय में लगी पूँजी को एक बड़े उद्यम में बदल सकें । इसके साथ ही देश के विकास तथा समाज के सभी हिस्से तक मीडिया के पहुँच की बात की जाती है । रेडियो की नए परिवेश में वापसी ने श्रव्य माध्यम के लिए भी लोगों की माँग पैदा की है ।

 

        मीडिया के बढ़ते महत्व ने मीडिया की शिक्षा के महत्व को स्वतः बढ़ा दिया  है । ऐसे में छोटे-छोटे शहरों, कस्बों में खुल रहे मीडिया शिक्षा के संस्थानों की भीड़ को देखा जा सकता है । मुक्त विश्वविद्यालयों तथा कई अन्य विश्वविद्यालयों ने मीडिया के पत्राचार पाठ्यक्रमों की शुरुआत कर अपनी आर्थिक स्थिति तो सुधार ली लेकिन वहाँ से निकलने वाले डिग्रीधारियों की स्थिति समझी जा सकती है । इसी तरह कई विश्वविद्यालयो में हिन्दी, राजनीत या समाज शास्त्र के प्राध्यापकों के प्रभार में मीडिया शिक्षा तड़प रही है । वे मीडिया की नैतिकता, भाषाई नैतिकता और मूल्यबोध से आगे नहीं बढ़ पाते । 1947 के पूर्व की पत्रकारिता का यशोगान करती यह प्राध्यापकों की ज़मात आज की पत्रकारिता की चुनौतियों से नई पीढ़ी को रूबरू कराने के बजाए सिर्फ वर्तमान मीडिया को कोसती नज़र आती है । प्रशिक्षण और तकनीक से जुड़ी इस विधा में आज तमाम ऐसे प्राध्यापकों की घुसपैठ है जो कभी किसी रूप में किसी मीडिया संस्थान में नहीं रहे  शिक्षण-प्रशिक्षण की ऐसी गंभीर विधा के प्रति ऐसा मजा़क सालों से जारी है ।

      

        शोध और अनुसंधान के प्रति हिन्दी क्षेत्र की उदासीनता के किस्से मशहूर हैं । हिन्दी पत्रकारिता के गंभीर इतिहास लेखन के महत्वपूर्ण कार्य की तरफ लंबे समय बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्विविद्यालय, भोपाल ने ध्यान दिया है    निश्चय ही इसका श्रेय विश्विविद्यालय के महानिदेशक पं. अच्युतानंद मिश्र को ही जाता है । इसी तरह भोपाल में ही माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय की स्थापना कर वरिष्ठ पत्रकार विजयदत्त श्रीधर ने जो ऐतिहासिक कार्य किया है वह लंबे समय तक शोधार्थियों के लिए उपयोगी रहेगा । ऐसे अंधेरे में कुछ ऐसे प्रयास रोशनी की किरण बिखेरते हैं ।

      

        मीडिया शिक्षा  के लिए आगे आए तमाम पत्र संस्थान एवं मीडिया समूह शायद इसीलिए इस क्षेत्र में आए क्योंकि वे परंपरागत संस्थानों व विश्वविद्यालयों की सीमाएं जान चुके थे । अपनी संस्था के लिए सही पेशेवरों को तैयार करने की चुनौती मीडिया समूहों के सामने थी । प्रभात ख़बर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, द हिन्दू, आजतक जैसे समूहों के मीडिया प्रशिक्षण संस्थान इसी पीडा़ की उपज हैं । यह उन परंपरागत संस्थानों को चुनौती भी हैं जो ख़ुद को मीडिया शिक्षा का रहबर समझते हैं ।

 

       मीडिया शिक्षा के क्षेत्र में उच्चस्तरीय मानव संसाधन की उपलब्धता जरूरी है, क्योंकि यह सर्वाधिक रोजगार सृजन करने वाला क्षेत्र साबित होने जा रहा है । चौथे स्तंभ की सैद्धांतिक भूमिका से परे मीडिया का आकार और क्षेत्र बहुत बड़ा है । एक-एक शिक्षकों के सहारे चल रहे विश्वविद्यालयों के पत्रकारिता विभाग नए समय की चुनौतियों का मुकाबला करने वाली पीढ़ी तैयार कर पाएंगे इसमें संदेह है । मीडिया संस्थानों तथा मीडिया शिक्षा के परिसरों को संवाद बहाल होना भी जरूरी है । यह आवाज़ाही बढ़ेगी तो यह शिक्षा क्षेत्र उपयोगी बनेगा ।

 

 अन्यथा उसकी अकादमिक व्याख्या से आगे हम कुछ हासिल नहीं कर पाएंगे  ।