सृजनगाथा  

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

 

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अंक-2. जुलाई 2006

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

बचपन

इस अंक में- 

माह के बालकवि- चंपा मावले  

लोककथा- सिन्धु रथ

कविता - हेमंत कुमार चावड़ा

विनोद-प्रसंग- प.महावीर प्रसाद द्विवेदी

पठनीय किताब- हरिप्रकाश वत्स

 

 

 

 

 

 

 

 लोककथा

लोभी बेटे

 

     गंगाराम के दो बेटे थे-सोहन और मोहन । उस पत्नी बहुत पहले चल बसी थी । किन्तु गंगाराम ने अपने बेटों को माँ की कमी कभी महसूस नहीं होने दी । वह अपने बेटों को पिता के साथ-साथ माँ का भी प्यार देता था । उनकी सभी इच्छाओं का हरदम ध्यान रखता ।

 

      समय का पहिया घूमता गया । धीरे-धीरे गंगाराम बुढ़ापे की ओर बढ़ने लगा । बुढ़ापा सौ बीमारियों की जड़ जो होती है सो गंगाराम ने भी जल्द ही खाट पकड़ ली । वह सारी रात खाँसता ।  अपने बेटों को पानी पिलाने के लिए आवाज़ देता, मगर कोई भी उसके पास न आता ।

 

      अशक्त गंगाराम खाट पर लेटे-लेटे सोचता रहता- जिस औलाद के लिए उसने अपनी सारी जिंदगी खून-पसीना एक कर कड़ी मेहनत की, वही  आज उसे एक गिलास पानी देने में भी कोताही कर रहे हैं । कई बार वह देखता कि उसके दोनों बेटे उसकी नसीहतों का मजा़क उड़ाते हैं । वह मन मार कर रह जाता था ।

 

      गंगाराम सयाना था, उसने दुनिया देखी थी, था तो वह अनुभवी । अतः उसने एक युक्ति सोची और एक दिन बड़े बेटे सोहन को बड़े प्यार से अपने पास बुलाया । जरा सुनना तो बेटे ! ”

क्या है ?” रूखे स्वर में सोहन ने पूछा । गंगाराम ने कहा, बेटा मैं अब कुछ दिनों का मेहमान हूँ । तुम मेसे बसे बड़े और प्रिय हो । एक राज की बात तुम्हें बताये देता हूँ । मैंने अनपी खाककट के नीचे अपनी सारी कमाई गाड़ रखी है । मेरे मरने के बाद इसे खोद कर निकाल लेना..... और हाँ, इसका जिक्र किसी और से भूले से भी मत करना ।

      दूसरे दिन गंगाराम ने मोहन को भी अकेला पाकर खाकट के नीचे धन गड़े होने का राज बतला दिया और यह सचेत भी कर दिया कि वह इसका जिक्र और किसी से न करे ।

 

गंगाराम की युक्ति काम कर गई । अब दोनों बेटे उसकी एक छींक पर दौडे़-दौड़े आते । पानी माँगने पर दूध पिलाते । एक सिर दबाता तो एक पैरों की मालिश करता । सोहन फल खरीद कर लाता तो मोहन खीर-मालपुआ बना कर पेश करता । किन्तु दोनों बेटों की नज़रे सदा गंगाराम की खाट के नीचे गड़ी रहती । वे पलभर को भी गंगाराम के कमरे से दूर नहीं जाते ।

 

मंगाराम मन ही मन गुनता- कैसा स्वार्थी और लोभी दुनिया है । आखिरकार गंगाराम एक दिन चल बसा । पिता के मरने भर की देर थी, दोनों बेटों ने मरे हुए गंगाराम की खाट को किनारे सरकाया और ज़मीन खोदने लगे ।

वे दिन भर खोदते रहे । वहाँ क्या था जो उन्हें मिलता ।

 सिन्धु रथ