सृजनगाथा  

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

 

 

 

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अंक-2. जुलाई 2006

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

    कहानी                                                                                           

 

 

 

 हँसते-खेलते

शशांक

 

 

 

दो भाग में बँटा है शहर । नदी बीच में है । नदी है इसलिए शहर लंबाई में बसा है । नदी से सटी सड़कें उसकी परछाई लगतीं । परछाइयाँ पतली होकर घरों में गुम हो जाती । सड़क पर गुजरते हुए लोगों को खयाल ही नहीं रहता, सड़क किनारे कोई नदी है । नदी आठ माह से अधिक गोद में रेत ही रेत भरे रहती । ब़ाकी माह वर्षा के कारण गोद हरी हो जाती । दूर से आता मटमैला पानी अपने साथ टूटी टहनियाँ लेते आता । आदत कुछ ऐसी बनी कि हमेशा याद रहता कि नदी में लगातार रेत बहती है । चौड़ा समतल रेत का सीना । सूरज की किरनों को सोखता । ठंड के दिनों में पानी की पतली तह दोनों किनारों पर बनी रहती । रात के अँधेरे में जब शहर के दोनों ओर उजाला और शोर रहता है, काली-टेढ़ी डगाल-सी नदी निःशब्द पड़ी रहती । शोर और उजाले से विमुख । फिर पता नहीं, कहाँ से धीरे-धीरे रोशनी के पीले गोले उसके किनारों पर उतरने लगते ।

 

लबालब होती तो घाट होते, सीढ़ियां होतीं । सीढ़ियाँ से सटकर दुबके कछुए होते । जिन्हें नदी की शाम और उसके बाद रात की ठंडक  भुलाए नहीं भूलती है वे रोशनी के इन गोलों के नीचे हरे पत्तों के दोने या आटे के दियों के होने का अचंभा करते । अरहर बहती रेत पर सरकते सांध्य दीप । पर रेत बहती रहती । वहीं है । रोशनी ठिठक-ठिठककर चलने लगती । जालदार सूप और मशाल लिए गिनी-चुनी मछलियों को टटोलते लोग नदी की छाती पर टहलते हैं । बूढ़े और औरतें । वे जो नदी का सिरा पकड़कर बहुत दूर नही जा सकते और जिन्हें नल के पानी मे चौकाबासन करने के लालच में बीच शहर में रहना पड़ता है । पीछे प्रवाह से चली आई चपटी बीमार और छोटी मछलियाँ उनके रात के जश्न में नदी पर लोकगीत के ए हो ए हो पर बलिदान हो जाती हैं । वे थोड़ी मछली और भात खाकर नदी में बाढ़ के सपने देखते हैं ।

 

       नदी पर जीवित चलते सांध्यदीप गरमी की रातों में मछली के सपने देखते । नदी का सीना चौड़ा हो जाता । पूरी लंबाई में रेत का विस्तार । नदी पर पानी की स्मृति मे दो पूल बने है । आमदरफ्त के लिए अँगरेज़ों के जमाने का बनाया गया सँकला पुल । पुल के नटबोल्ट कुछ इस ढब से लगे हैं कि वे खुले ही नहीं । पुल बना रहा । दूसरा पुल बनाया गया । चौड़ा और हर किसी के लिए खुलनेवाले दिलकश नटबोल्ट । गरमी में लोग अधिक चलनेवाले सँकरे और कम चलनेवाले चौड़े पुल पर बहुत तेजी से गुजर जाते हैं । रेत से गरम हवा खौलती हुई निकलती । अदेखे पानी का गुस्सा । सँकरे पुल पर गाँव से आती बैलगाड़ी अपने भोले बैलों की गति से दोनों ओर ट्रैफिक जाम कर देती । लोग और अधिक जल्दी करते हैं । जल्दी और अधिक लोगों को इकट्ठा करती है । पुल पर फँसे हुए लोग रेत पर भुनती धूप को चुपचाप देखते हैं । वे अपने आराम और धीमेपन का तोड़ जल्दी में देखते हैं ।

 

       इसी समय वे पाते है कि रेत के सीने पर कतार से क्यारियाँ बन रही हैं । क्यारियाँ कुछ दिनों में हरी हो जाती हैं । बाड़ खिंच जाती है । फूँस की झोपड़ी बन जाती है । झोपड़ी में औरत और मर्द भर दिखलाई पड़ते हैं । एक दिन फूटे तरबूज से काले बीज गिराते हुए औरत जोर-जोर से चीखते हुए दिखलाई पड़ती है । आदमी सुनता है । उसे फूटे लाल मसूढ़े दिखाते तरबूज नहीं, भगाकर लाई दूसरी औरत की कैफियत देनी है । वह तपती रेत मे गुजारे सारे दिन की सफाई नहीं देता । बस, डंडा लेकर औरत पर पिल पड़ता है । यह सब ट्रैफिक जाम हो तो दिखलाई देता है । बाड़, तरबूज, पिटती हुई औरत । तपती रेत । पिघली हवा के हिलते परदे के पीछे ।

 

       दूसरी ओर पूरा का पूरा ट्रक रेत के बीचोबीच खड़ा होता है । मजदूर कूदकर रेत से ट्रक भर देते हैं । रेत कम नहीं पड़ती । सूखी झरती रेत । ठेकेदार दाँत पीसता हुआ कर रहा है, पूरा ट्रक भर डालो । उसे खुद नहीं मालूम पूरा की ऊँचाई कहाँ तक है । वह हडबड़ी में है । सारी रेत गायब हो जाएगी और कहीं साफ-सुथरी नदी प्रकट न होने लगे । रेत कम नहीं पड़ती । उसने कभी महसूस ही नहीं किया कि रेत के हट जाने के बाद फिर रेत चली आती है । चौड़ा होता रेत का पाट उसे कभी नापा नहीं । ट्रक किसी तरह कराहकर आगे बढ़ता है । रेत के बने मजदूर उस पर बैठे अपना पसीना सूँघते हैं । पसीना नहीं है । रेत है । जो सूखते ही झर जाएगी ।

 

       शाम की पहली किश्त में लोग रेत पर झिझकते हुए पाँव रखते हैं । फिर सधे कदमों से इधर-उधर चलने लगते हैं । जैसे नदी पर न हो किसी उपवन में चहलकदमी कर रहे हों । अदृश्य गुलाब, मोगरा, चाँदनी । अनजानी खुशबू । ठंड के विविध पेड़ । एक बच्चा नदी की सतह पर सिर रखे है । कान नदी की छाती पर है । चूतड़ ऊपर उठी हुई है । वह नदी के स्तन पर नन्हें छेद में आराम कर रहे कीड़े का गाना सुन रहा है । उसकी मुट्ठियाँ सीपी और गोल पत्थरों से भरी हुई हैं । बहुत अमीर । होंठ पर चिपकी रेत दूध के बुलबुलों-सी फूट रही है । वह मगन उस धून को याद कर रहा है । पहाड़े की आदत है ।

 

       रात होते ही आसपास खाटें चलती चली आती हैं । खाट के नीचे झुका हुआ सिर है । बहुत सारी खाट । उमस भरे शहर में एक खुली हुई शरणगाह । इस नदी पर सोने के पहले लोग बुदबुदाते हैं । बड़बड़ाते हैं । स्वप्न देखने को पहले । फिर मौन चलचित्र आते हैं । नदी धीरे-धीरे खर्राटे लेने लगती है । रोशनी और तेज वाहनों की चीखपुकार का कोई असर नहीं होता ।

 

       वर्षा के आते ही नदी अपना रूप छोड़ देती है । काया । जैसे नदी ही न हो । शहर के बाहर बसे गाँवों के पास नदी पर दरवाजे लगे हैं । भारी-भरकम । वर्षा बहुत दूर जब गाँवों में पानी भरने लगता है तब किसान दौड़कर शहर आते हैं । अर्जी लेकर । दरवाजे खोल दिए जाते हैं । मटमैला पानी नदी के ऊपर बहने लगता है । नदी के ऊपर एक और नदी दौड़ने लगती है । यहाँ वर्षा नहीं होती फिर भी उफान है । आसमान पर बादल बँधे हैं पर नदी अथाह पानी बहा नही है । आगे को । पानी यहाँ रुकता नहीं । वह आगे के शहर में सरक जाता है । लोग अपने आसपास की सूखी धरती कुरेदते हुए बतलाते हैं, उस शहर में बाढ़ आ गई होगी । अपनी नदी में भरपूर रेत को याद करते हुए वे एक अद्भूत लोककथा का बखान करते हैं । इसमें रेत का माहात्म्य है और छिपी हुई कोई कसक है । जैसे-जैसे छाती बज्जर होगी, कसक गाढ़ी होगी, लोककथा निखर जाएगी । नदी कहीं नहीं दिखलाई पड़ती । उसके ऊपर दूसरे शहर की नदी रगड़ खाकर बहती है । पुल पर खड़े लोग बहते हुए मवेशी देखते हैं । झाड़-झंखाड़ । टोकनियाँ । कभी-कभी नन्हें शिशु । सभी निश्चिंत हैं ये किसी और ने नहीं बहाए हैं । कुलटा माँ है जिसने फेंका है । शिशु का रुदन नहीं है । वे नदी पर बल खाते हुए बहते चले जाते हैं ।

 

       धीरे-धीरे पानी का मटमैलापन खत्म होने को होता है ।

       गीली रेत उठने लगती है ।

       विलुप्त होती नदी हाथ पकड़कर बाहर आ रही है ।

लोग चैन की साँस लेते हैं । अब हमारी रेत की नदी दिखलाई पड़ेगी । वे जानते हैं रेत पर ही उनके जीवन की गुजरती है । आदत है । इस पर वे नींद में भी चल लेते हैं । वे मुख खोलकर दिखाते हैं । रेत भरी होती है । कान । रेत । आँख । रेत ।

 

       नदी के दोनों ओर शहर है । वे रेत पर पैदल आना-जाना करते हैं । वे परंपरा के अनुसार सिखाते हैं अपने बच्चों को, कैसे हँसते-खेलते रहा जाता है रेत नदी पर । कुछ लोकगीत, कुछ लोककथाएँ और कुछ झनझनाते फिल्मी गीत ।

 

       शहर के बाहरी इलाके नए नमूने की भव्य इमारतों की बड़ी प्रदर्शनी है । दूर से वे मोम और पलास्टर आफ पैरिस के बने सैट-से दिखते हैं । बड़े-बड़े लोहे के गेट । असली गुलाब । मोगरे । गुलदाउदी । वे बतलाते हैं, उन्हें तो कुछ ही दिन हुए हैं इस शहर में आए हुए । उनके पुरखे दूसरे शहरों में रहते हैं । वे आखिरकार क्या बता सकते हैं इस नदी के बारे में ! हमने तो ऐसी कोई नदी देखी तक नहीं ।