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द्विवेदी युगीन साहित्य सेवियों का पुनर्गाथा |
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डॉ. ओम प्रकाश अवस्थी |
द्विवेदी
युगीन साहित्यकारों की साहित्य सेवा और हिन्दी आराधना का
परिणाम है कि आज हिन्दी साहित्य अपनी स्थायी पहचान बनाये
हुए है और हिन्दी राष्ट्रभाषा के गौरवशाली पद पर
प्रतिष्ठित है। द्विवेदी युग का साहित्य मात्र लोकरंजन और
साहित्य के माध्यम से आत्म प्रकाशन का साहित्य नहीं है
बल्कि द्विवेदी युगीन साहित्य भारत की देश-भक्ति प्रकाशन,
पराधीनता से मुक्ति के प्रयास तथा हिन्दी भाषा के
प्रामाणिक स्वरूप के निर्माण का साहित्य है। हिन्दी भाषा
और हिन्दी साहित्य का जो विशाल भवन प्रत्यक्ष दिखाई पड़
रहा है। द्विवेदी युगीन साहित्यकार उस की नीव के पत्थर
हैं।
महावीर प्रसाद
द्विवेदी के अतिरिक्त
अयोध्या सिंह उपाध्याय, मैथिली शरण
गुप्त, लाला भगवान दीन
‘दीन’,
कामता प्रसाद गुरु, मंशी प्रेमचन्द्र, चन्द्रधर शर्मा
गुलेरी, श्रीधर पाठक, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और डॉ.श्याम
सुन्दर दास ऐसे नाम हैं जो आज भी कविता, कहानी,
उपन्यास,व्याकरण, भाषा और आलोचना के दिशा सूचक यंत्र की
भाँति द्विवेदी युगीन होकर भी परवर्ती युगों में अपनी
स्थायी पहचान रखते हैं। इन लेखकों की परम्परा का अनुसरण
करके और इन लेखकों की परम्परा का विरोध करके द्विवेदी युग
के वाद का साहित्य विकसित, पल्लवित और पुष्पित हुआ है। यदि
द्विवेदी युग की आधारभूत प्रक्रिया हिन्दी से हटा ली जाय
तो हिन्दी साहित्य और हिन्दी भाषा दोनों को ही अपने पैरों
खडे़ होने में कठिनाई होगी। द्विवेदी युग के बाद के
साहित्य-परिवार का वल्दियत द्विवेदी युग में ही मिलेगा
वह कोई भी विधा हो, कोई भी स्वरूप हो । इसी द्विवेदी युग की
साहित्यसेवी
मण्डली में छत्तीसगढ़ का एक पाण्डेय परिवार था
जिसमें मुकुटधर पाण्डेय और लोचन प्रसाद पाण्डेय ऐसे
बहुमुखी प्रतिभा के धनी और साहित्य की अनेक विधाओं में
अपनी रचनाशीलता से
‘सरस्वती’
भण्डार को
भरने वाले थे। मिश्र बंधु विनोद
तथा आचार्य
रामचन्द्र शुक्ल के हिन्दी साहित्य का इतिहास में
कृतज्ञता पूर्वक इनकी
गरिमा का उल्लेख किया गया है।
डॉ.बलदेव
पाण्डेय परिवार के श्रद्धालु अनुसंधानकर्ता
हैं । डॉ. बलदेव ने कुछ वर्ष पूर्व मुकुटधर पाण्डेय जी के उन लेखों
का सम्पादन किया था जो हिन्दी साहित्य में श्री शारदा
पत्रिका के सूच्य व्यापार माने जाते थे लेकिन मूल रूप में
वे निबंध प्राप्त नहीं थे। हिन्दी साहित्य के पाठकों के
समक्ष यह कठिनाई थी कि जब
वे छायावाद के उद्भव को जानना
जाहते तो आचार्य शुक्ल के मात्र संकेतों पर ही उन्हें
संतोष करना पड़ता था। 920 ई.के लिखे हुए यह चार स्तम्भ लेख
दुर्लभ थे। डॉ. बलदेव ने इन लेखों का संपादन
"छायावाद एवं अन्य श्रेष्ठ निबंध" शीर्षक से वर्ष 1984 में किया
था। स्वतंत्रता के बाद की हिन्दी साहित्यसेवी पीढ़ी को इस
संकलन से न केवल लाभ हुआ बल्कि मुकुटधर पाण्डेय की लुप्त
प्राय होती जा रही सामग्री को स्थायित्व मिल गया
और छायावाद की आलोचना के लिए जो संकेत स्थली मात्र थे उन निबंधों
का पट पूर्ण मौलिक रूप में, पाण्डेय जी ने भी उसे देखा।
डॉ. बलदेव पाण्डेय जी के आशीषी हुए और हिन्दी पाठकों के
धन्यवादी। उन्होंने पाण्डेयजी की कविताओं का भी संकलन
संपादन
‘विश्वबोध’
शीर्षक से पुस्तककार रूप में किया । इस प्रकार छायावाद के
प्रवर्तक के लक्षण-लक्ष्य दोनों ही आधारों कासं पादन करके
उन्होंने हिन्दी साहित्य की सराहनीय सेवा की।
डॉ. बलदेव ने
इधर मुकुटधर पाण्डेय के अग्रज
‘साहित्य
वाचस्पति पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय’
के साहित्य पर कार्य करना प्रारम्भ किया और द्विवेदी युग
के इस महान साहित्य सेवी की कविताओं, ऐतिहासिक और
पुरातात्विक अनुसंधान से जुडे़ उनके लेखों का एक समवेत
संकलन प्रस्तुत किया । इस संकलन का लेखकीय दायित्व उठाने
वाले डॉ. बलदेव ही हैं लेकिन इसका संपादन भी आशीष सिंह ने
किया है जो हरिठाकुर संस्थान, रायपुर से 2006 में प्रकाशित
किया गया है। संपादन कला की निपुणता इस 80 पृष्ठों की
पुस्तक में दिखाई पड़ती है।
‘साहित्य
वाचस्पति पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय’
नामक कृति का
‘प्रकाशकीय’
आभार, डॉ. बलदेव, व्यक्तित्व, और पाण्डेय जी के साहित्य
कर्म कौशल की आलोचनात्मक पुष्पांजलि अर्द्धभाग में है और
परवर्ती आधे भाग में परिशिष्ट के रूप में पाण्डेय जी की
कविताओं और उनके पुरातात्विक गवेषणा व्यक्त लेखों की भी
बानगी प्रस्तुत की गई है। पाण्डेय जी भाषाविद और कई भाषाओं
के जानकार थे। उस युग के साहित्यकारों पर नागरी
प्रचारिणी सभा ही दृष्टिपात करती रही और उस युग के
साहित्य का प्रकाशन संवर्धन करती रही । उसी तरह का बड़ा
पुनीत कार्य भी आशीष सिंह ने यह संकलन प्रकाशित करके
किया है। उन्होंने लोचन प्रसाद पाण्डेय के मूल साहित्य से
जो दुर्लभ ही है हिन्दी पाठकों को परिचित कराया और उसी के
साथ ही डॉ. बलदेव के पाण्डेय प्रेम से अधिक अपनी
आलोचना-शैली का भी परिचय दिया जो एक महान आशा जीवी
उपलब्धि है। डॉ. बलदेव और आशीष सिहं की इस जोड़ी ने लोचन
प्रसाद पाण्डेय के मूल साहित्य को समालोचना के साथ
प्रकाशित किया
। मैं उनके कृतित्व को हिन्दी साहित्य की
स्थायी सेवा मानता हूँ और साहित्य के इस कल्याणकारी कार्य
के लिए उनको अपनी प्रशंसा से
मंडित करता हूँ। आशा करता हूँ कि इस प्रकार के कर्म कौशल
से वे अपने अतीत और भविष्य के
दोनो सोपानों से साधुवाद के अधिकारी होंगे तथा
ऋषिऋण और
देवऋण से मुक्ति पा सकेंगे । हमारे ऐसे पाठकों की
पीढियाँ उनके इस कृतियों के प्रति भली बनी रहेंगी।
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समीक्षक:
डॉ.ओम प्रकाश अवस्थी
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कृति:
साहित्य
वाचस्पति पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय
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लेखक:
डॉ. बल्देव
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प्रकाशक:
हरि ठाकुर स्मारक संस्थान, रायपुर
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मूल्य:
100 रुपए